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    नीतीश कुमार के कृत्य से समाज, संस्कृति, सत्ता और मानसिकता पर उठते सवाल चिंताजनक

    News DeskBy News DeskDecember 18, 2025No Comments6 Mins Read
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    नीतीश कुमार के कृत्य से समाज, संस्कृति, सत्ता और मानसिकता पर उठते सवाल चिंताजनक
    देवानंद सिंह
    भारतीय राजनीति में कई बार कोई छोटा-सा दृश्य, कोई एक पल या कोई एक वाक्य ऐसा तूफान खड़ा कर देता है, जो केवल उस घटना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज, संस्कृति, सत्ता और मानसिकता तक के सवाल खड़े कर देता है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा नियुक्ति पत्र वितरण समारोह के दौरान एक मुस्लिम महिला के चेहरे से हिजाब हटाने की कोशिश और उस पर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री एवं निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद की विवादित टिप्पणी इसी तरह का मामला बन चुकी है। यह विवाद अब केवल हिजाब या एक महिला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में संवेदनशीलता, सत्ता की मर्यादा, धार्मिक पहचान और बयानबाजी की गिरती भाषा का प्रतीक बन गया है। घटना अपने आप में बेहद संक्षिप्त थी। आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी पद्धति के चिकित्सकों को नियुक्ति पत्र सौंपने के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नुसरत परवीन नाम की एक महिला के चेहरे पर पड़े हिजाब को मुस्कुराते हुए हटाने की कोशिश की और कहा कि ये क्या है? कैमरे ने उस क्षण को कैद कर लिया और वही क्षण सोशल मीडिया व राजनीतिक गलियारों में तूफान बन गया।

     

     

    कुछ लोगों ने इसे एक बुजुर्ग नेता की सहज, अभिभावकीय प्रतिक्रिया बताया। मानो वे चाहते हों कि नियुक्ति पत्र लेते समय महिला का चेहरा स्पष्ट दिखे, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों, खासकर मुस्लिम समुदाय के नेताओं और संगठनों ने इसे महिला की निजी आस्था और मर्यादा में दखल करार दिया। सवाल यही है कि क्या सत्ता के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक मंच पर किसी महिला की धार्मिक पहचान से जुड़े वस्त्र को हटाने की कोशिश करे? इस विवाद को और हवा तब मिली जब उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री डॉ. संजय निषाद ने टिप्पणी करते हुए कहा कि नकाब छू दिया तो इतना हो गया, कहीं और छूते तो क्या हो जाता।

    यह वाक्य राजनीति में संवेदनशीलता के अभाव और भाषा की गिरावट का भयावह उदाहरण बन गया। भले ही संजय निषाद बाद में सफाई देते फिरें, बयान वापस लेने की बात कहें और यह तर्क दें कि उनके शब्दों को गलत संदर्भ में पेश किया गया, लेकिन सच यही है कि सार्वजनिक जीवन में बोले गए शब्द केवल इरादे से नहीं, असर से भी आंके जाते हैं। एक मंत्री का ऐसा कथन न केवल महिलाओं के सम्मान पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि सत्ता की उस मानसिकता को भी उजागर करता है, जो आलोचना को हल्के में लेने की आदी हो चुकी है।

     

     

    बिहार सरकार में मंत्री जमा खान द्वारा नीतीश कुमार का बचाव करते हुए यह कहना कि मुख्यमंत्री ने मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत काम किए हैं, अपने आप में एक अलग ही बहस को जन्म देता है। सवाल यह नहीं है कि किसी नेता ने किसी समुदाय के लिए अतीत में क्या किया, बल्कि सवाल यह है कि क्या वर्तमान में किया गया कृत्य सही था या नहीं। लोकतंत्र में पिछले कामों की आड़ में किसी गलत कदम को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
    उधर, संजय निषाद का बैकफुट पर आना भी बताता है कि राजनीतिक बयानबाजी अक्सर बिना सोचे-समझे की जाती है और जब उसका सामाजिक असर सामने आता है, तब सफाइयों का दौर शुरू होता है। लेकिन तब तक नुकसान हो चुका होता है, न केवल छवि का, बल्कि सामाजिक ताने-बाने का भी।

     

     

    इस पूरे प्रकरण पर ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी, इमारत-ए-शरिया के सचिव मौलाना मुफ्ती मोहम्मद सईदउर रहमान कासमी जैसे धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि मामला अब केवल राजनीतिक नहीं रहा। उनके लिए यह महिला की इज्जत, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सम्मान से जुड़ा प्रश्न है।
    मौलाना कासमी का यह कहना कि पर्दा औरतों और समाज की इज्जत है, यह बताता है कि हिजाब को केवल एक कपड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक के रूप में देखा जाता है। ऐसे में, किसी मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच पर इसे हटाने की कोशिश स्वाभाविक रूप से आक्रोश को जन्म देती है।

     

    राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने इस घटना को नीतीश कुमार की अस्थिर मानसिक स्थिति से जोड़कर हमला बोला। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो और टिप्पणियों ने विवाद को और तीखा कर दिया। यह हमला केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि राजनीतिक था। नीतीश कुमार की छवि, उनकी उम्र, उनकी वैचारिक दिशा सब कुछ निशाने पर आ गया। इल्तिजा मुफ्ती द्वारा नीतीश कुमार की उम्र पर तंज कसना और यह कहना कि मुख्यमंत्री को ऐसा पावर नहीं है कि वे मुस्लिम महिलाओं का अपमान करें, इस बात का संकेत है कि अब यह विवाद राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बयानबाजी का हथियार बन चुका है।

    इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल कहीं पीछे छूटता जा रहा है—क्या सत्ता में बैठे लोग सार्वजनिक मंच पर नागरिकों की व्यक्तिगत और धार्मिक सीमाओं का सम्मान करना भूलते जा रहे हैं? क्या महिलाओं के शरीर, पहनावे और आस्था पर टिप्पणी करना या हस्तक्षेप करना राजनीति के लिए एक सामान्य बात बनती जा रही है?

    यह भी सवाल उठता है कि क्या हर संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से ही देखा जाएगा? अगर यही प्रवृत्ति जारी रही, तो सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास का क्षरण तय है।

    हिजाब विवाद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में शब्दों और इशारों की जिम्मेदारी कितनी बड़ी होती है। मुख्यमंत्री हों या मंत्री, उनके हर कृत्य और बयान का असर समाज के गहरे हिस्सों तक जाता है। यह मामला केवल नीतीश कुमार या संजय निषाद का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जो सत्ता को संवेदनशीलता से ऊपर मानने लगी है। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक नेतृत्व आत्ममंथन करे, न कि सफाइयों और आरोप-प्रत्यारोप में उलझे। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि नागरिकों की गरिमा, आस्था और सम्मान की रक्षा करने की भी जिम्मेदारी है। हिजाब पर उठा यह विवाद अगर, हमें यह याद दिला सके, तो शायद यह संकट किसी सकारात्मक सीख में बदल सके।

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