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    बिहार चुनाव में दो कार्यसंस्कृतियों का अंतर भाजपा की जमीनी रणनीति बनाम विपक्ष की कमजोर पकड़ – अशोक ठाकुर

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarNovember 15, 2025Updated:November 15, 2025No Comments2 Mins Read
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    बिहार चुनाव में दो कार्यसंस्कृतियों का अंतर भाजपा की जमीनी रणनीति बनाम विपक्ष की कमजोर पकड़ – अशोक ठाकुर

    उप ब्यूरो राष्ट्र संवाद

    बिहार चुनाव ने दो राजनीतिक कार्यसंस्कृतियों के बीच गहरा फर्क उजागर कर दिया। एक ओर भाजपा के चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान जैसे शांत, मेहनती और पर्दे के पीछे काम करने वाले नेता थे, जिन्होंने गठबंधन, सीट साझेदारी और बागी समीकरणों को बिना शोर-शराबे के सुलझाया। यूपी, बंगाल, महाराष्ट्र और झारखंड के सांसदों सहित भाजपा के कार्यकर्ता मोहल्लों में घर–घर पर्ची बाँटते, बूथ स्तर की बैठकों में जुटे रहे—यही जमीनी मेहनत उनकी जीत की नींव बनी।

    इसके उलट कांग्रेस और महागठबंधन की रणनीति बिखरी रही। राहुल गांधी चुनाव के पहले और बाद विदेश गए, शीर्ष नेतृत्व पटना में होटल-बंदी तक सीमित रहा, और बीच चुनाव में प्रभारी बदले गए। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की यात्राओं में भीड़ स्थानीय से अधिक बाहरी कार्यकर्ताओं पर निर्भर दिखी, जिसमें ईबीसी–ओबीसी वर्गों की व्यापक भागीदारी नदारद थी।

    ‘वोट चोरी’ का मुद्दा जनभावना से जुड़ नहीं पाया। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और नाम जुड़ने की प्रक्रिया सरल होने से यह मामला मतदाताओं के लिए निर्णायक नहीं रहा। जमीनी स्तर पर लोगों के वोट कटने की शिकायतें भी न्यूनतम रहीं।

     

    अंततः, व्यापक संगठन, बूथ प्रबंधन, हर समाज तक पहुँच और शांत ढंग से काम करने वाली टीम भाजपा की जीत का आधार बनी, जबकि विपक्ष मुद्दों और जमीन दोनों पर कमजोर साबित हुआ।

    बिहार चुनाव में दो कार्यसंस्कृतियों का अंतर भाजपा की जमीनी रणनीति बनाम विपक्ष की कमजोर पकड़ - अशोक ठाकुर
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