क्या बिहार की वैकल्पिक राजनीति का अधूरा प्रयोग है
प्रशांत किशोर और जनसुराज
देवानंद सिंह
प्रशांत किशोर ने खुद को एक समय देश के सबसे सफल राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में स्थापित किया, अब बिहार में अपनी ही बनाई पार्टी जन सुराज के नेतृत्व में हैं। उनका दावा था कि बिहार की राजनीति जाति, परिवारवाद और अपराध के बोझ से मुक्त होकर एक नई दिशा ले सकती है, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आए, जन सुराज का यह प्रयोग उसी सियासी दलदल में उतरता दिखने लगा, जिससे वह खुद को अलग बताने निकला था।
प्रशांत किशोर ने तीन साल पहले बिहार की सड़कों पर जन संवाद यात्रा के रूप में एक आंदोलन शुरू किया था। उन्होंने गांव-गांव जाकर कहा कि राजनीति का लक्ष्य सत्ता नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना होना चाहिए।
उनकी सभाओं में अक्सर यह वाक्य दोहराया जाता था—कि आप अपने लिए नहीं, अपने बच्चों के लिए वोट दीजिए। इस नारे ने युवा वर्ग, पेशेवरों और एक्टिविस्टों को आकर्षित किया। हज़ारों लोगों ने नौकरी छोड़ दी, आंदोलन से जुड़े, और गांवों में परिवार लाभ कार्ड बांटने लगे, एक तरह का जन सुराज सदस्यता कार्ड, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के वायदे से जुड़ा था। पार्टी का दावा है कि दो करोड़ से अधिक कार्ड बांटे जा चुके हैं, एक अद्भुत आंकड़ा, जो दिखाता है कि जन सुराज की जड़ें बिहार के गांवों तक पहुंची थीं, लेकिन राजनीति केवल विचार या वायदे से नहीं चलती। यह संगठन, संसाधन और रणनीति की परीक्षा भी मांगती है, और यहीं जन सुराज की कहानी बिखरने लगी।
बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर जन सुराज ने चुनाव लड़ने का एलान किया। पार्टी ने उम्मीदवारी के लिए आवेदन शुल्क 21,000 रुपये रखा, बिहार के सियासी इतिहास में यह पहला ऐसा प्रयोग था। क़रीब 12,000 लोगों ने ऑनलाइन आवेदन किया, लेकिन केवल 1,500 लोगों ने शुल्क जमा किया। यानी हर विधानसभा क्षेत्र से औसतन छह उम्मीदवारों ने आवेदन किया।
यह संख्या, भले जन उत्साह दिखाती हो, लेकिन संगठनात्मक भ्रम व आदर्श और वास्तविकता के बीच की खाई भी उजागर करती है। 9 और 13 अक्टूबर को जब पार्टी ने पटना में 116 उम्मीदवारों की सूची जारी की, तो हंगामा मच गया, जिन्हें टिकट नहीं मिला, उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुला ली, सोशल मीडिया पर भड़ास निकाली, और शेखपुरा हाउस (पार्टी मुख्यालय) के बाहर प्रदर्शन किया।
सबसे बड़ा सवाल तब उठा, जब प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी। पहले उन्होंने कहा था कि वे राघोपुर या करहगर से मैदान में उतरेंगे, लेकिन अब पार्टी की ओर से बयान आया कि प्रशांत किशोर को एक सीट में बांधना उचित नहीं। वे 243 विधानसभा क्षेत्रों में स्टार कैंपेनर रहेंगे। पार्टी के चुनाव अभियान समिति प्रमुख सुधीर शर्मा का तर्क था कि वो किसी पद की राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि विज़न की राजनीति कर रहे हैं, लेकिन बिहार की ज़मीन पर राजनीति केवल विज़न से नहीं चलती।
लोगों को नेता में प्रतिबद्धता दिखनी चाहिए, वो जोखिम लेने की हिम्मत जो जनता के भरोसे को जन्म देती है।
किशोर का चुनाव न लड़ना यही संदेश दे गया कि शायद वे अभी भी सियासत में रणनीतिकार की भूमिका से आगे बढ़ने को तैयार नहीं। प्रशांत किशोर की अब तक की पहचान एक राजनीतिक सलाहकार की रही है, वो व्यक्ति जो मंच के पीछे रहकर चुनावी समीकरणों को साधता है।
चाहे नरेंद्र मोदी का 2014 अभियान हो या नीतीश कुमार की 2015 की वापसी, हर बार उन्होंने तकनीक और डेटा का कमाल दिखाया, लेकिन जब मंच के सामने आने की बारी आई, तो वही तकनीक बिहार की जमीनी राजनीति के सामने फीकी पड़ने लगी। विशेषज्ञों का कहना है कि किशोर को अब यह एहसास हो गया है कि संगठन और जनाधार बनाना रणनीति बनाने से कहीं कठिन है, इसीलिए वे चुनाव नहीं लड़ रहे। उनके मुताबिक, प्रशांत किशोर अब स्पॉयलर पॉलिटिक्स की दिशा में बढ़ सकते हैं, यानी अपने वोट प्रतिशत के ज़रिए किसी दल के समीकरण को प्रभावित करना, जैसा चिराग पासवान ने किया था।
जन सुराज का दावा रहा है कि यह पार्टी जाति-धर्म से परे मूलभूत मुद्दों की राजनीति करेगी, लेकिन बिहार जैसे राज्य में जहां राजनीति अब भी जातीय पहचान पर टिकी है, वहां यह विचार ज़मीनी स्तर पर टिक नहीं पाया।
तेजस्वी यादव का गढ़ राघोपुर का उदाहरण ही देखिए,
यहां विकल्प का विचार तभी सफल हो सकता है, जब सामाजिक आधार बने, जब यादव, कुशवाहा, पासवान, भूमिहार जैसी जातियों के वोट बैंक में सेंध लगे।
प्रशांत किशोर ने इस पर ज्यादा काम नहीं किया। उन्होंने समान मुद्दों की बात तो की, पर समान प्रतिनिधित्व की ठोस रणनीति नहीं बनाई। यही वजह है कि टिकट वितरण में भी जातीय और क्षेत्रीय असंतुलन की शिकायतें सामने आईं। राजनीतिक रूप से परिपक्व राज्य में जहां हर वोट गठबंधन समीकरण के तराजू पर तौला जाता है, वहां विचारधारा का प्रभाव सीमित रहता है। किशोर इस सच्चाई से भले असहज हों, लेकिन बिहार की राजनीति में यह सत्य अटल है।
जन सुराज में बड़ी संख्या में ऐसे लोग आए, जो पहले कभी सक्रिय राजनीति में नहीं थे। इनकी ऊर्जा नई थी, पर जमीनी पकड़ कमजोर थी। इसी वजह से पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता और बाहरी पेशेवरों के बीच दूरी बढ़ी।
फुलपरास से आए एक कार्यकर्ता ने कहा कि हम महीनों तक गांव-गांव घूमते रहे, लेकिन जिन लोगों को टिकट मिला, वे तो पटना में बैठे रहे। यह बयान उस सांस्कृतिक खाई की ओर इशारा करता है जो नए राजनीति के प्रयोग और पुराने ढांचे की वास्तविकता के बीच मौजूद है। प्रशांत किशोर ने राजनीति को स्टार्टअप की तरह चलाने की कोशिश की यानी डेटा, मैनेजमेंट और प्रोफेशनलिज़्म के भरोसे, लेकिन राजनीति, खासकर बिहार जैसी भूमि पर, भावनाओं, जातीय निष्ठाओं और व्यक्तिगत भरोसे का खेल है। यहां डेटा से ज़्यादा असर दलित टोला की चाय या पंचायत सभा का संवाद डालता है, और यही वह जगह है जहां जन सुराज की रणनीति ठहर गई।
किशोर की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वे आंदोलन को संगठन में बदल सकें। जन संवाद यात्रा ने उन्हें भीड़ दी, लेकिन संगठन नहीं। लोगों ने पार्टी का नाम लिया, पर गांवों में बूथ स्तर तक ढांचा खड़ा नहीं हो सका। कई जिलों में जन सुराज कमिटी बनी ही नहीं या बनी तो निष्क्रिय रही। परिणामस्वरूप, जब टिकट वितरण शुरू हुआ, तो स्थानीय प्रभाव वाले वही चेहरे आगे आए, जिनसे पार्टी खुद को अलग बताना चाहती थी। जन सुराज का यह संक्रमण अधूरा रह गया, न पूरी तरह आंदोलन, न पूरी तरह पार्टी, और यही अधूरापन उसे वैचारिक ताकत से अधिक अवसरवादी दल के रूप में स्थापित कर रहा है।
अब सवाल उठता है कि क्या जन सुराज बिहार की राजनीति में कोई स्थायी प्रभाव छोड़ पाएगा?
संभावनाएं हैं, लेकिन सीमाएं भी स्पष्ट हैं।
पार्टी का वोट शेयर शायद बहुत बड़ा न हो, लेकिन वह कुछ सीटों पर समीकरण बिगाड़ सकती है।
अगर जन सुराज 5-7 प्रतिशत वोट भी खींच लेती है, तो यह RJD, JDU और BJP तीनों के लिए सिरदर्द बन सकता है। ख़ासकर, उन सीटों पर जहां मुकाबला त्रिकोणीय है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किशोर इस वोट प्रतिशत को भविष्य में सौदेबाज़ी की पूंजी में बदलना चाहेंगे,वोजैसे चिराग पासवान ने किया।
यह रणनीतिकार की सोच है, नेता की नहीं, और यही प्रशांत किशोर के भविष्य का निर्णायक मोड़ होगा। क्या वे नेता बन पाएंगे या हमेशा किंगमेकर ही रहेंगे।
प्रशांत किशोर खुद को गांधी और आंबेडकर की विचारधारा का वाहक बताते हैं। वे कहते हैं कि राजनीति को सेवा बनाना होगा, न कि व्यवसाय, लेकिन बिहार के मतदाता अब वादों से ज़्यादा विकल्प की विश्वसनीयता देखते हैं। जब कोई नेता खुद मैदान से पीछे हटता है, तो उसका वैचारिक नैतिक बल कमज़ोर पड़ता है।
किशोर का चुनाव न लड़ना इस नैतिक प्रतीक को कमजोर करता है, भले यह रणनीति के नाम पर जायज़ ठहराया जाए। जन सुराज की यात्रा अभी खत्म नहीं हुई, लेकिन उसका पहला अध्याय निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है।
यह बिहार की राजनीति में वैकल्पिकता के विचार को सामने लाया, उसे बहस का हिस्सा बनाया, यह उसकी उपलब्धि है,वोलेकिन यह विचार संगठन, नेतृत्व और ज़मीनी संतुलन के बिना आगे नहीं बढ़ सकता।
प्रशांत किशोर के सामने अब दो रास्ते हैं, या तो वे अपने आंदोलन को लोकल लीडरशिप के हवाले कर राजनीतिक जोखिम उठाएं, या फिर खुद को रणनीतिकार के रूप में सीमित रखकर राजनीति के सलाहकार बने रहें।
बिहार का इतिहास बताता है कि यहां विचार तब तक नहीं टिकते जब तक वे जातीय और सामाजिक संरचना में जड़ न जमा लें। किशोर के पास वैचारिक ऊंचाई है, लेकिन सामाजिक गहराई नहीं। अगर, वे इस दूरी को पाटने में सफल हुए, तो जन सुराज भविष्य में सचमुच ‘जन का सुराज’ बन सकता है।
अन्यथा, यह भी बिहार की राजनीतिक प्रयोगशाला में जोड़ दिया जाएगा, जहां कई विचार पैदा हुए, पर ज़मीन पर टिक न सके। प्रशांत किशोर का प्रयोग एक ऐसे समय में हुआ जब जनता बदलाव चाहती थी, पर भरोसा करने से डरती थी। जन सुराज उस भरोसे की परीक्षा है, और प्रशांत किशोर उस राजनीति के विद्यार्थी, जो पहली बार खुद अपने सिद्धांतों पर खड़े होकर परीक्षा दे रहे हैं।
परिणाम चाहे जो भी हो, बिहार की सियासी किताब में यह अध्याय लिखा जा चुका है, एक ऐसे व्यक्ति का, जिसने राजनीति को डेटा से आगे, और विचार से परे जाकर ‘जन भागीदारी’ के रूप में परिभाषित करने की कोशिश की।
वो सफल हों या असफल, पर उन्होंने यह साबित किया कि बिहार में अब जनता सिर्फ़ नेता नहीं, विकल्प भी देखना चाहती है।

