बिहार चुनाव में नया एमवाई समीकरण, बदलता जनादेश और आयोग की अग्निपरीक्षा
देवानंद सिंह
बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को मतदान होगा, जबकि नतीजे 14 नवंबर को आएंगे। राजनीतिक दल अपने-अपने जिताऊ उम्मीदवारों के चयन में व्यस्त हैं और विश्लेषक इस बार के चुनाव को कई मायनों में ऐतिहासिक मान रहे हैं। कारण केवल यह नहीं कि राज्य में सत्ता परिवर्तन की संभावना टटोलने का वक्त है, बल्कि इसलिए भी कि इस बार के चुनाव का मैदान पुराने जातीय समीकरणों से हटकर नए सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ों पर टिका दिख रहा है।
दरअसल, बिहार में जब-जब चुनाव की बात होती है, तो सबसे पहले एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण की चर्चा होती है। लेकिन इस बार का चुनाव पुराने एमवाई से अलग है। अब एम का अर्थ महिला और वाई का मतलब युवा बताया जा रहा है। यही नया एमवाई समीकरण इस चुनाव की दिशा और दशा तय करेगा। विश्लेषकों का मानना है कि इस बार महिला मतदाता और नौजवान वर्ग ही बिहार के भविष्य की सियासत का फैसला करेंगे।
नीतीश कुमार ने पिछले दो दशकों में महिलाओं को केंद्र में रखकर योजनाओं की जो बुनियाद रखी थी, वह अब उनके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सहारा बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब उन्होंने स्कूली बच्चियों को साइकिल, पोशाक और छात्रवृत्तियां दीं, तब यह केवल एक सामाजिक कल्याण कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक दीर्घकालिक राजनीतिक निवेश था। अब वही बच्चियां सक्रिय मतदाता हैं, और उनके खातों में सीधे पैसे आने से नीतीश कुमार के प्रति एक भावनात्मक जुड़ाव कायम हुआ है। यही कारण है कि महिलाओं का झुकाव आज भी नीतीश की ओर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
इसके उलट, विपक्ष यानी महागठबंधन इस बार युवाओं के भरोसे मैदान में है। तेजस्वी यादव ने सरकारी नौकरी की गारंटी देने का वादा किया है, एक ऐसा वादा जिसने पिछली बार के चुनाव में उन्हें अचानक राजनीतिक केंद्र में ला दिया था। बेरोज़गारी का मुद्दा पांच साल पहले भी सबसे बड़ा चुनावी हथियार था और इस बार भी वही भावनात्मक असर पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इस लिहाज़ से बिहार का यह चुनाव महिला बनाम युवा एजेंडे की लड़ाई बन गया है।
जातिगत समीकरणों की भूमिका बिहार की राजनीति में हमेशा निर्णायक रही है। परंतु इस बार समीकरणों में हलचल है। विशेषज्ञों का कहना है कि नीतीश कुमार के अति पिछड़ा वर्ग पर पकड़ पहले जैसी नहीं रही, आंशिक रूप से उनकी सेहत और बढ़ती उम्र के कारण। वहीं कुशवाहा और कुछ दलित समुदायों में भी एनडीए के प्रति असंतोष बढ़ा है। इसके विपरीत, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के साथ आने से मुस्लिम-यादव समीकरण एक बार फिर मजबूत हुआ है। अगर, जनसुराज पार्टी या एआईएमआईएम इस गठबंधन के वोट को नहीं तोड़ पाती हैं, तो एनडीए के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
गठबंधनों की अपनी-अपनी उलझनें भी कम नहीं हैं। एनडीए के भीतर सीट बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है। बीजेपी को लोजपा, उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी जैसे सहयोगियों को साथ लेकर चलना पड़ रहा है। जेडीयू ने साफ़ कहा है कि तालमेल बनाए रखना बीजेपी की जिम्मेदारी है। उधर, महागठबंधन में भी असहमति है। मुकेश सहनी की सीटों की मांग घटकर 60 से 20 के बीच आ गई है, जबकि वामपंथी दल अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की ज़िद पर अड़े हैं। कांग्रेस भी इस बार पिछली बार से कम सीटों पर लड़ने की तैयारी में है, लेकिन उसकी प्राथमिकता अपने उम्मीदवारों की घोषणा समय पर करने की है।
इन राजनीतिक समीकरणों के बीच सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि विपक्ष लगातार इसे नीतीश कुमार का अंतिम चुनाव बता रहा है। तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर दोनों ही इस नैरेटिव को प्रचारित कर रहे हैं, हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कहना असामान्य नहीं होगा कि उम्र और सेहत को देखते हुए नीतीश का यह आखिरी चुनाव हो सकता है, लेकिन इससे उनके मतदाता आधार पर कोई बड़ा असर नहीं दिख रहा।
लंबे शासनकाल के कारण एक ऊब तो ज़रूर है, मगर नाराज़गी नहीं। 20 साल से अधिक समय से सत्ता में रहने वाले नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी की भावना अपेक्षाकृत कमजोर है। उनके प्रति सम्मान और विश्वास अब भी बरकरार है, खासकर महिलाओं और बुज़ुर्ग मतदाताओं में। जंगलराज का भय अब युवा पीढ़ी में अप्रासंगिक हो चुका है, लेकिन जिन लोगों ने वह दौर देखा है, वे अब भी उसे याद करते हैं और उसी तुलना में नीतीश को स्थिरता का प्रतीक मानते हैं।
प्रशांत किशोर का उदय भी इस चुनाव का एक नया आयाम है। जनसुराज यात्रा के माध्यम से उन्होंने एक वैकल्पिक राजनीतिक विमर्श खड़ा करने की कोशिश की है। विशेषज्ञों के अनुसार, उन्होंने युवाओं और प्रवासी बिहारी वोटरों के बीच खास प्रभाव डाला है। वह उन 25-30 प्रतिशत मतदाताओं को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं जो जातीय या पारंपरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण से ऊपर उठकर मतदान करते हैं। हालांकि, वे कितने वोटों में इसे तब्दील कर पाएंगे, यह देखना बाकी है, लेकिन अगर वह लगातार सक्रिय रहे, तो 2030 का चुनाव उनके लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
दूसरी ओर, बीजेपी बिहार में मोदी फैक्टर पर पूरी तरह निर्भर दिख रही है। पार्टी के पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं है जो राज्य स्तर पर चुनावी नेतृत्व दे सके। सम्राट चौधरी, दिलीप जायसवाल और मंगल पांडे जैसे नामों के बावजूद पार्टी के भीतर करिश्माई नेतृत्व का अभाव है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बीजेपी की पारंपरिक बढ़त भी कमजोर पड़ी है, क्योंकि विपक्ष ने अब उसी हथियार से पलटवार शुरू कर दिया है। प्रशांत किशोर ने खुले तौर पर कई बीजेपी नेताओं पर करप्शन के आरोप लगाए हैं, जिससे पार्टी को नैतिक बढ़त बनाए रखने में मुश्किलें आई हैं।
तेजस्वी यादव की स्थिति फिलहाल विपक्ष के चेहरे के तौर पर मजबूत हुई है। राहुल गांधी के साथ उनकी रैलियों ने एमवाई समीकरण को पुनर्जीवित किया है। हालांकि, लोकप्रियता में वे अभी नीतीश कुमार से पीछे हैं। जनता उन्हें स्वीकार तो करती है, पर उन्हें एक परिपक्व नेता के रूप में पूरी तरह नहीं देखती। उनका फायदा यह है कि बीजेपी के पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं है और नीतीश के नेतृत्व पर कुछ संदेह हैं। ऐसे में उन्हें स्वाभाविक लाभ मिलता दिखाई देता है।
इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य के बीच, स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (एसआईआर) का मामला चुनावी विमर्श का नया मोड़ बन गया है। यह वही प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूची की समीक्षा की गई और लगभग 69 लाख नाम सूची से हटाए गए। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल प्रभावित मतदाताओं को चुनाव आयोग में अपील करने का निर्देश दिया है, लेकिन विपक्ष ने इसे वोट चोरी का मामला बनाकर प्रचार में भुनाने की कोशिश की। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने इसी मुद्दे पर वोटर अधिकार यात्रा निकाली, जिसे जमीनी स्तर पर आंशिक समर्थन तो मिला, लेकिन यह चुनावी हवा नहीं बना सकी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा कांग्रेस और आरजेडी के कार्यकर्ताओं में जोश भरने का माध्यम तो बन सकती है, लेकिन इससे नया वोट बैंक नहीं जुड़ेगा। हां, अगर सचमुच बड़ी संख्या में वैध नाम हटाए गए हैं और यह बात जमीन पर चर्चा में आई, तो यह मामला बिहार से निकलकर राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है, जिससे बीजेपी और चुनाव आयोग दोनों को नुकसान झेलना पड़ सकता है। फिलहाल, ऐसा होता नहीं दिख रहा।
फिर भी इस मुद्दे ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर उठे संदेहों से खुद को मुक्त कर पाएगा? इस बार आयोग की साख दांव पर है। पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों ने एसआईआर प्रक्रिया का विरोध किया है, जबकि असम ने कहा है कि वहां पहले ही एनआरसी हो चुका है। बिहार चुनाव में ज़रा-सी भी गड़बड़ी आयोग के लिए भारी पड़ सकती है, क्योंकि देशभर की निगाहें अब उस पर टिकी हैं।
बिहार के इस चुनाव को कई स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। यह केवल नीतीश कुमार के राजनीतिक भविष्य या तेजस्वी यादव के उदय की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह राज्य के सामाजिक मानस में हो रहे परिवर्तन की कहानी भी है। महिला मतदाताओं की निर्णायक भूमिका, युवा वर्ग की बेचैनी, जातीय राजनीति का धीमा क्षरण और नए राजनीतिक प्रयोगों की शुरुआत, इन सभी के बीच यह चुनाव बिहार के लिए एक नए सामाजिक समीकरण का नक्शा तैयार कर सकता है।
अंततः, यह चुनाव न केवल सत्ता परिवर्तन का बल्कि बिहार की राजनीति के स्वरूप परिवर्तन का भी इम्तिहान है। महिला और युवा, दोनों की आकांक्षाओं को जो समझेगा, वही इस बार पटना की गद्दी तक पहुंचेगा। और शायद यही बिहार के बदलते जनादेश की नई कहानी होगी, जहां जाति से आगे बढ़कर विकास, पहचान और अवसर की राजनीति निर्णायक होगी।

