जल-जंगल-जमीन का सबसे बड़ा लड़ाका
राष्ट्र संवाद नेटवर्क
शिबू सोरेन अलग झारखंड राज्य के लिए लड़ी गई लड़ाई के सबसे बड़े लड़ाका ही नहीं थे वरन वह बहुत बड़े समाज सुधारक भी थे। उन्होंने महाजनी प्रथा को खत्म करने के लिए जो लड़ाई छेड़ी, आज उसी का नतीजा है कि चीजें ट्रैक पर आ गई हैं। यह सही है कि महाजन आज भी झारखंड में हैं लेकिन वह उन क्रूर गुणों से भरपूर महाजन नहीं हैं, जिनका मुकाबला दिशोम गुरुजी ने किया था। इसलिए, आज जब गुरुजी को याद किया जा रहा है तो हमें उन्हें संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में याद करना चाहिए।

प्रारंभ के दिनों को याद करें तो गुरुजी महाजनी प्रथा के सख्त खिलाफ थे। आपको पता ही होगा कि शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन भी सामाजिक कार्यकर्ता थे और आदिवासियों के हित के लिए काम करते थे। इससे कुछ सूदखोर उनसे नाराज हो गए और उनकी बड़ी निर्ममता से हत्या करवा दी। इस घटना के वक्त शिबू सोरेन सिर्फ 13 साल के थे। पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन ने महाजनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और महजनों के खेतों से धान की फसल काटकर ले आते थे। महाजनी प्रथा के विरोध में उनके इस कदम को ‘धनकटनी आंदोलन’ का नाम मिला। धनकटनी आंदोलन ने शिबू सोरेन को आदिवासियों का नेता बना दिया और बाद में इसी के चलते आदिवासियों ने उन्हें दिशोम गुरु का नाम मिला। झारखंड को अलग राज्य बनाने के लिए शिबू सोरेन ने सियासत में कदम रखा और बिनोद बिहारी महतो और कॉमरेड एके राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। जल, जंगल और जमीन की लड़ाई और अलग झारखंड राज्य के लिए इन्होंने 40 साल तक संघर्ष किया।

पुराने लोग बताते हैं कि आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन का अधिकांश समय जंगलों और पहाड़ों पर गुजरता था। आंदोलन के दौर में हत्या समेत कई संगीन मामलों में आरोपित बनाए गए थे। कानूनी दांव-पेंच में फंसे भी और जेल भी गए, लेकिन न्याय प्रक्रिया में गहरी आस्था रखने वाले शिबू सोरेन को चाहे चीरुडीह हत्याकांड हो, शशिनाथ झा की हत्या से जुड़ा मामला हो या फिर पीवी नरसिम्हा राव के दौरान सांसद रिश्वत प्रकरण हो, हरेक मामले में न्याय मिला। चार दशक के आंदोलन व संघर्ष के दम पर 15 नवंबर 2000 में जब अलग झारखंड राज्य गठन का सेहरा इनके सिर बंधा तो पूरा झारखंड ही नहीं देश ने दिशोम गुरु यानी देश का गुरु के आंदोलन व संघर्ष को सैल्यूट किया था।

धुन के पक्के शिबू सोरेन को झारखंड आंदोलन के दौरान गिरफ्तार करने या देखते ही गोली मारने तक का आदेश दिया गया था। इसके बावजूद शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन को कमजोर नहीं होने दिया। वह इस लड़ाई को लड़ते चले गए। आंदोलन के दौर में उनकी एक आवाज पर पूरा झारखंड बंद हो जाता था। हजारों लोग सड़कों पर उतर जाते थे। तब अविभाजित बिहार के झारखंड (या वनांचल) के विभिन्न हिस्सों में आर्थिक नाकेबंदी से लेकर दिल्ली तक अलग राज्य के लिए आंदोलन की गूंज से केंद्र व बिहार राज्य की सरकारें भी सकते में पड़ जाती थीं। समय व जनता के नब्ज को समझने वाले शिबू सोरेन ने आंदोलन के साथ हक व अधिकारों को हासिल करने के लिए राजनीति के क्षेत्र में कदम रखने का ठोस निर्णय विनोद बिहारी महतो और एके राय जैसे मंझे हुए नेताओं से मुलाकात के बाद लिए थे।

शिबू सोरेन ने 4 फरवरी 1973 को झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया। इससे ठीक पहले वर्ष 1969 में शिबू सोरेन की पहचान एक सशक्त आंदोलनकारी के अलावा समाज सुधारक के तौर पर जन-जन में बन चुकी थी। इसी कालखंड में शिबू सोरेन सोनत संताली समाज नामक एक संगठन बनाकर आदिवासी समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए जागरूक अभियान चला रहे थे। शराब सेवन पर पाबंदी व शिक्षा को हथियार बनाने के लिए समाज को जागृत कर रहे थे। जदयू के विधायक सरयू राय ने ठीक ही लिखा कि शिबू सोरेन के निधन से झारखंड की राजनीति में संघर्षशील युग का अंत हो गया। श्री राय ने उन्हें दृढ़प्रतिज्ञ जननेता माना।

शिबू सोरेन ने 70 के दशक में भूमिगत रहकर टुंडी में आदिवासियों को गोलबंद किया था। इसके बाद वहां महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ लंबा संघर्ष छेड़ा था। यह संघर्ष धनकटनी आंदोलन के नाम से चर्चित हुआ था। इस आंदोलन में ही आदिवासियों ने उन्हें दिशोम गुरु की उपाधि से नवाजा था। इस ऐतिहासिक आंदोलन के बावजूद शिबू टुंडी में विधानसभा चुनाव हार गए। संताल में भी धनकटनी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। शिबू अपने संघर्ष के बल पर आदिवासियों के सर्वमान्य नेता बन चुके थे। इसके बाद वह 1980 के लोकसभा चुनाव में दुमका से लड़े। तब तक झामुमो को राजनीतिक पार्टी की मान्यता नहीं मिली थी। 1980 में दुमका में कांग्रेस के दिग्गज नेता पृथ्वीचंद किस्कू को हराकर वह पहली बार लोकसभा पहुंचे थे।

1976 में शिबू सोरेन ने सरेंडर कर दिया। उन्हें धनबाद जेल में रखा गया। यहां एक घटना घटी जो यह बताती है कि शिबू सोरेन राजनीति और सामाजिक जीवन में कितने भावुक थे। शिबू सोरेन जेल में बंद थे। अक्टूबर-नवंबर का वक्त था। इस दौरान बिहार-झारखंड में छठ पर्व मनाया जाता है। जेल में एक महिला कैदी करुण स्वर में छठ के गीत गा रही थी। शिबू सोरेन से इस घटना का वर्णन सुन चुके वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा कहते हैं, ” शिबू सोरेन जेल में महिला कैदी का गीत सुन कुछ समझ नहीं पाए। उन्होंने झारखंड आंदोलन के एक दूसरे कार्यकर्ता और जेल में बंद झगड़ू पंडित से इस बारे में पूछा। झगडू ने उन्हें बताया कि महिला हर बात छठ करती है, लेकिन इस बार एक अपराध के जुर्म में जेल में है। इसलिए वो छठ नहीं कर पा रही है। लिहाजा वो बहुत पीड़ा में छठ के गीत गा रही है। शिबू सोरेन इस समय तक आदिवासी नेता के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे। उन्होंने एक गैर आदिवासी महिला की पीड़ा सुनी तो वे बेहद दुखी हुए। उन्होंने जेल में ही महिला के लिए छठ व्रत कराने का इंतजाम किया।” अपना नेतृत्व कौशल दिखा चुके शिबू सोरेन ने जेल में भी अपनी लीडरशिप क्वालिटी दिखाई। शिबू सोरेन सभी कैदियों से अपील की कि वे एक सांझ का खाना नहीं खाएंगे और उस पैसे से छठ पूजा के लिए सामान खरीदा जाएगा। हुआ भी ऐसा ही। सभी कैदियों ने एक टाइम का खाना त्याग दिया और महिला ने पारंपरिक आस्था के साथ छठ पूजा की।
शराब न छोड़ने पर चाचा से झगड़ बैठे
आदिवासियों की जीवन शैली ऐसी रही है कि शराब का सेवन उनके समाज में सहज है। यहां शराब, हंडिया का प्रचलन आम है। शिबू सोरेन भले ही आदिवासी समाज के नेता रहे लेकिन वे हमेशा नशे से दूर रहे। शराबबंदी को लेकर उनकी जिद इस तरह थी कि एक बार वे अपने चाचा पर नाराज हो गए और उन्हें पीटने पर उतारू हो गए। शिबू सोरेन महिला सम्मान के प्रति काफी सजग रहते थे और इसे बर्दाश्त नहीं करते थे। एक घटना का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग कहते हैं कि शिबू सोरेन एक बार दुमका में एक कार्यक्रम का समापन कर धनबाद लौट रहे थे। इस समय शिबू इतनी जल्दी में थे कि उन्होंने रास्ते में रुककर ना तो खाना खाया और ना चाय पी, लेकिन एक बात हुई और अचानक बीच रास्ते में उनकी गाड़ी रुक गई। शिबू सोरेन एक गांव के अंदर पहुंचे। उनके लिए खाट बिछाई गई। पता चला कि लड़की के साथ छेड़खानी का मामला है। उन्होंने वहीं पर कचहरी लगा दी और फैसला सुनाकर ही वहां से रवाना हुए, हालांकि इस पंचायती की वजह से उन्हें धनबाद पहुंचने में 5-6 घंटे की देरी हो गई।

