औद्योगिक विकास की दौड़ में मज़दूरों की सुरक्षा खतरे में
देवानंद सिंह
तेलंगाना के संगारेड्डी ज़िले के पासामईलरम औद्योगिक क्षेत्र में स्थित एक फार्मा कंपनी में हुए भीषण विस्फोट ने न केवल 36 निर्दोष जिंदगियों को लील लिया, बल्कि भारत के औद्योगिक विकास की बुनियाद पर खड़े मज़दूरों की सुरक्षा और श्रम कानूनों की वास्तविकता पर भी गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। यह घटना अपने आप में एक त्रासदी नहीं, बल्कि वर्षों से चल रही उदासीन सरकारी निगरानी, कॉर्पोरेट लालच और श्रमिकों की सुरक्षा की अनदेखी का प्रत्यक्ष परिणाम है।
सोमवार सुबह 9 से 9:30 बजे के बीच जब पासामईलरम स्थित इस फार्मा इकाई में एक रिएक्टर फटा, उस समय वहां 143 से अधिक कर्मचारी काम कर रहे थे। अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, 36 लोगों की मौत हो चुकी है, 58 को बचा लिया गया है और शेष लापता हैं। बचाव कार्य अभी भी जारी है और मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका बनी हुई है। विस्फोट इतना भयानक था कि रासायनिक प्यूरिफ़िकेशन प्लांट की पूरी इमारत ध्वस्त हो गई, और आसपास की इमारतें भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं।
प्लांट से घंटों तक धुआं निकलता रहा, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि अंदर भारी मात्रा में रासायनिक कच्चा माल मौजूद था। राहत और बचाव कार्यों में बाधा पहुंचा रही यह रासायनिक जटिलता, दर्शाती है कि सुरक्षा मानकों का किस हद तक उल्लंघन किया गया था।
जिस किसी ने इस दुर्घटना के बाद फैक्ट्री गेट पर परिजनों की चीख-पुकार और एंबुलेंस के पीछे दौड़ते लोगों के दृश्य देखे हैं, वह यह समझ सकता है कि यह हादसा केवल एक औद्योगिक असफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का अपमान भी है। ओडिशा की एक महिला अपने पति प्रशांत महापात्रा की तलाश में फूट-फूट कर रोती रहीं। बिहार से आए लक्ष्मी मुखिया के परिवार वाले फैक्ट्री के बाहर किसी खबर की उम्मीद में खड़े रहे, पर हर गुज़रती एंबुलेंस उनके मन में एक अनिश्चित डर छोड़ जाती। न तो कंपनी के पास आपदा प्रबंधन की कोई पारदर्शी व्यवस्था थी, न ही मज़दूरों के रिकॉर्ड को लेकर स्थिति स्पष्ट थी।
यह दृश्य बताता है कि किस तरह भारत के औद्योगिक ढांचे में काम कर रहे हज़ारों प्रवासी मज़दूरों की ज़िंदगी और मौत आंकड़ों तक ही सीमित रह जाती है। प्रशासन और मीडिया की भाषा में इसे एक ‘दुर्घटना’ कहा जा रहा है, लेकिन क्या इसे केवल एक हादसे के तौर पर देखा जाना चाहिए? शुरुआती जांच से यह संकेत मिलते हैं कि विस्फोट की वजह रासायनिक पदार्थों से नमी हटाने की प्रक्रिया के दौरान एयर प्रेशर में अचानक आए बदलाव हो सकता है।

लेकिन क्या यह तकनीकी विफलता मात्र है? विशेषज्ञों का मानना है कि केमिकल रिएक्टर संचालन के दौरान तापमान, दबाव और वेंटिलेशन की नियमित निगरानी अनिवार्य होती है। यदि, इस तरह का विस्फोट हुआ, तो यह सुरक्षा प्रोटोकॉल की घोर अनदेखी को दर्शाता है। इससे स्पष्ट होता है कि फैक्ट्री प्रबंधन ने सुरक्षा उपायों की अनदेखी की और मज़दूरों की जान को जोखिम में डाल दिया।
भारत में फार्मा और केमिकल इंडस्ट्री का तेज़ी से बढ़ता दायरा, मुनाफे की होड़ में सुरक्षा को अक्सर पीछे छोड़ देता है। ऐसे हादसे इस प्रवृत्ति का परिणाम हैं। इस त्रासदी में मारे गए और घायल हुए अधिकांश मज़दूर ओडिशा, बिहार, झारखंड, और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आए प्रवासी श्रमिक थे। बेहतर जीवन और रोज़गार की तलाश में वे दूर-दराज़ के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने आते हैं। लेकिन यहां उन्हें न तो स्थायी नौकरी मिलती है, न कोई सामाजिक सुरक्षा।

मज़दूर न केवल काम के दौरान खतरनाक हालातों का सामना करते हैं, बल्कि दुर्घटना के बाद भी उनकी पहचान, मुआवज़ा और शवों की वापसी को लेकर सरकारी व्यवस्था असमंजस में रहती है। बिहार सरकार ने इस त्रासदी में मारे गए दो मज़दूरों के परिजनों को 4 लाख रुपये और घायलों को 50 हज़ार रुपये देने की घोषणा की है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे उनके भविष्य का पुनर्निर्माण संभव है?
मजदूरों की सुरक्षा की यह स्थिति उस स्याह हकीकत को उजागर करती है, जहां राष्ट्र निर्माण में सबसे बड़ा योगदान देने वाले लोग सबसे कम सुरक्षा पाते हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने मृतकों के परिजनों को 1 करोड़ रुपये, गंभीर रूप से घायल लोगों को 10 लाख और अन्य घायलों को 5 लाख रुपये देने की घोषणा की है। साथ ही, तुरंत खर्च के लिए मृतकों के परिजनों को 1 लाख और घायलों के परिजनों को 50 हज़ार रुपये दिए जाएंगे।

राज्य सरकार ने इस हादसे की जांच के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है। साथ ही दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और भविष्य में ऐसे हादसे न हों, इसके लिए नए नियमों की घोषणा की बात भी कही गई है। हालांकि, यह घोषणाएं राहत तो देती हैं, पर क्या यह न्याय है? क्यों हमेशा हादसों के बाद ही जांच और नियमों की बात होती है? क्यों पूर्व-नियोजन, पूर्व-सावधानी और सतत निगरानी नहीं होती?
यहां पर राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सतर्कता की कमी उजागर होती है, जो ऐसे हादसों की मूल वजहों में से एक है। भारत में औद्योगिक सुरक्षा और श्रम कानूनों का ढांचा व्यापक और परिष्कृत प्रतीत होता है, लेकिन इसका क्रियान्वयन बुरी तरह से विफल है।

2020 में भोपाल गैस त्रासदी की 36वीं वर्षगांठ पर एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि भारत में औद्योगिक दुर्घटनाओं की संख्या में साल दर साल वृद्धि हो रही है। नैशनल डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी और फैक्ट्रीज़ ऐक्ट जैसे कानूनों का प्रभाव तभी होता है, जब उन्हें ईमानदारी और सख्ती से लागू किया जाए। दुर्भाग्यवश, ‘इंस्पेक्टर राज’ के डर से बचने और ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ के नाम पर कई सुरक्षा निरीक्षणों को कम कर दिया गया है, जिससे कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिए तो राह आसान हो गई, लेकिन मज़दूरों के लिए काम की जगहें और अधिक खतरनाक बन गईं। भारत में औद्योगिक दुर्घटनाओं की खबरें एक-दो दिन चलती हैं, फिर मीडिया और समाज का ध्यान कहीं और चला जाता है, लेकिन उन परिवारों के लिए यह घटना एक जीवन भर का दुख बन जाती है।

ज़रूरत है कि मीडिया ऐसी घटनाओं पर गहराई से रिपोर्टिंग करे और सरकार तथा कंपनियों की जवाबदेही तय करने के लिए सतत दबाव बनाए रखे। वहीं, नागरिक समाज को भी मज़दूरों की सुरक्षा और अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। इस त्रासदी के बाद जो जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए, वे केवल राहत राशि तक सीमित नहीं रह सकते। फैक्ट्रियों की सुरक्षा जांच के लिए एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और तकनीकी रूप से सक्षम एजेंसी बनाई जानी चाहिए, जो नियमित रूप से निरीक्षण करे। हर औद्योगिक इकाई में कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए नियमित आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण अनिवार्य हो।
केंद्र और राज्य सरकारें एकीकृत डिजिटल पोर्टल पर हर फैक्ट्री में कार्यरत मज़दूरों का डेटा एकत्र करें ताकि किसी भी आपदा में त्वरित प्रतिक्रिया दी जा सके। मज़दूरों के लिए कम-से-कम ₹10 लाख की अनिवार्य जीवन बीमा योजना लागू की जाए, जिसमें प्रीमियम का अधिकांश हिस्सा फैक्ट्री मालिक वहन करें। सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाले कंपनियों और अधिकारियों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा चलाया जाए।

कुल मिलाकर, पासामईलरम की यह भयावह दुर्घटना सिर्फ एक स्थान की घटना नहीं है, यह उस पूरे ढांचे की विफलता है, जो भारत में तेज़ औद्योगिक विकास को मज़दूरों की जान की कीमत पर खड़ा कर रहा है। यदि, भारत को एक सशक्त, न्यायसंगत और मानवीय औद्योगिक राष्ट्र बनना है, तो मज़दूरों की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों को प्राथमिकता देनी होगी। यह केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज, मीडिया, न्यायपालिका और कॉर्पोरेट जगत – सभी की सामूहिक जवाबदेही है, जो जीवन खो गए, उन्हें वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन उनके नाम पर एक नई औद्योगिक चेतना जरूर खड़ी की जा सकती है। एक ऐसी चेतना, जिसमें सुरक्षा नियमों को कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर लागू किया जाए और जहां हर मज़दूर की ज़िंदगी को उतनी ही अहमियत दी जाए जितनी मुनाफे को दी जाती है।

