आदिवासी अस्मिता पर प्रहार, झारखंड की आत्मा पर चोट
देवानंद सिंह
भोगनाडीह की भूमि, जहाँ से शहीद सिदो-कान्हू ने हूल क्रांति का उद्घोष किया था, मंगलवार को उसी भूमि पर श्रद्धांजलि देने एकत्र हुए उनके वंशजों और आदिवासी समाज पर जिस प्रकार पुलिस लाठियों और आंसू गैस से टूट पड़ी, वह झारखंड के आत्मसम्मान पर सीधा आघात है। यह केवल एक कार्यक्रम में बाधा नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक चेतना का अपमान है, जो झारखंड को अन्य राज्यों से अलग पहचान देती है।

एक शांतिपूर्ण आयोजन में शामिल निर्दोष लोगों पर बल प्रयोग यह दर्शाता है कि राज्य शासन अब जनभावनाओं के प्रति असंवेदनशील ही नहीं, बल्कि प्रतिशोध की मानसिकता से भी ग्रस्त होता जा रहा है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जो सरकार खुद को ‘अबुआ सरकार’ — यानी अपनी सरकार — कहती है, उसी सरकार में आदिवासियों को अपनी विरासत का सम्मान करने से भी रोका जा रहा है?

जमशेदपुर महानगर भाजपा द्वारा साकची में किया गया पुतला दहन केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस जनाक्रोश की प्रतिध्वनि है जो अब उबाल पर है। पूर्व जिलाध्यक्ष दिनेश कुमार द्वारा की गई यह टिप्पणी कि “यह घटना झारखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज होगी,” पूर्णतः यथार्थ प्रतीत होती है।
झारखंड की आत्मा उसकी आदिवासी संस्कृति, इतिहास और शहीदों की विरासत में बसती है। जब यही आत्मा आहत होती है, तो केवल नीतियों की नहीं, नीयत की भी समीक्षा आवश्यक हो जाती है। हूल दिवस पर हुए इस घटनाक्रम ने राज्य सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा कर दिया है। क्या प्रशासनिक नियंत्रण की कीमत पर संवैधानिक अधिकारों की बलि दी जाएगी?

राज्य सरकार को चाहिए कि वह न केवल दोषी अधिकारियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करे, बल्कि आदिवासी समाज से सार्वजनिक रूप से क्षमा भी मांगे। लोकतंत्र में सत्ता जनभावनाओं के अनुरूप चलती है, उनके विरुद्ध नहीं।

अन्यथा, इतिहास गवाह है — जब भी जनता की आवाज को दबाने की कोशिश हुई है, एक नई क्रांति ने जन्म लिया है। और झारखंड की धरती क्रांतियों की जन्मभूमि रही है।

