झाविमो के संघर्ष के साथ है राज्य की जनता: बाबूलाल मरांडी
देवानंद सिंह
झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी राज्य की राजनीति की महत्वपूर्ण धूरी हैं। इसीलिए झारखंड में होने जा रहे चुनावों में उनकी पार्टी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहने वाली है। राजनीति का लंबा अनुभव रखने वाले बाबूलाल मरांडी प्रदेश की नब्ज को बहुत अच्छी तरह जानते हैं, इसीलिए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी बड़े उम्मीद के साथ चुनावी दंगल में शामिल है। शुरूआत में वह बीजेपी में ही थे , लेकिन उन्होंने लगभग 13 साल पहले बीजेपी से अलग होकर झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) का गठन किया था। राजनीति का दिग्गज खिलाड़ी होने की वजह से उन्हें हर परिस्थिति का सामना करना बखूबी आता है। यही वजह है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी उन्होंने राज्य में अपनी पार्टी का वजूद बचाए रखा है। इस चुनाव को लेकर भी वह बहुत उत्साहित हैं और सभी 81 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतार दिए हैं। राज्य के राजनीतिक मुद्दों व आगामी चुनाव के संबंध में उन्होंने राष्ट्र संवाद के साथ खुलकर बात की।
उन्होंने चुनाव में झाविमो की तैयारी के संबंध में कहा कि उनकी पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में है। बाबूलाल को भरोसा है कि राज्य की जनता झाविमो के संघर्ष के साथ है। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं के जुनून से वह चुनाव जीतेंगे।

उन्होंने राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि राज्य के लोगों में सरकार के काम से गुस्सा हैं वहीं, झामुमो जैसी पार्टियां कुछ खास इलाके में हैं। कांग्रेस का जहां लीडर है, वहीं भर है, लेकिन झाविमो पूरे राज्य में है। उन्होंने अपने चुनावी एजेंडे के संबंध में खुलकर बात करते हुए कहा कि चुनाव के संबंध में झाविमो का एजेंडा बिल्कुल साफ है। उन्होंने कहा कि हम लगातार झारखंड के सवालों पर संघर्ष कर रहे हैं। लोगों की ताकत हमारे पास है। पिछले 19 सालों में 28 महीने यानि मेरे मुख्यमंत्रित्व काल को छोड़ कर देखें, तो बीजेपी ने कभी झारखंड के इश्यू को एड्रेस नहीं किया। बीजेपी की नीतियों और रघुवर दास के काम से लोग नाराज हैं। लोगों ने हमारे 28 महीने के काम को भी देखा है, इसीलिए ये नाराज लोग कहां जाएंगे।
उन्होंने कहा कि अर्जुन मुंडा से लेकर रघुवर दास की सरकार में झारखंड में केवल एमओयू साइन हुए। लोगों की दिक्कत क्या है ? किसान क्या चाहता है ? नौजवान क्या चाहता है? यहां के आदिवासी-मूलवासी क्या चाहते हैं ? इसको समझने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। उन्होंने कहा कि राज्य में जब मेरी सरकार बनी, तो मैंने जो दु:ख-दर्द महसूस किया था, उससे जनता को निजात दिलाने की कोशिश की। गांव तक पहुंचने के लिए सड़कें नहीं थीं, पुल-पुलिया नहीं थे, लोगों का गांव से निकलना मुश्किल था। मैंने गांवों को सड़कों से जोड़ने का काम शुरू किया। पहले दिन ही अधिकारियों को कह दिया कि प्राथमिकता पर पहले ये काम करें, पुल-पुलिया बने। बाद में, मुझे मौका नहीं मिला। मेरी सरकार बनती है, तो खेती फोकस में रहेगी, लेकिन रघुवर सरकार में ख्ोती किसानी की पूरी तरह अनदेखी होती रही। पांच हजार रुपए देने से किसानों का दु:ख दूर नहीं होगा। मेरी सरकार बनी, तो बिजली के काम को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। 19 वर्षों में हम एक मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं कर पाए। बड़े-बड़े पावर प्लांट लगाने की योजना कारगर नहीं है। यह समय पर पूरा नहीं होता। छोटे-छोटे पावर प्लांट लगाने की जरूरत है, इसमें बहुत जमीन की जरूरत भी नहीं है और कमिशनिग भी जल्द होता है।
श्री मंराडी ने एक सवाल के जबाव में कहा कि 1999 में मैंने अटल जी के साथ चंदवा पावर प्लांट का शिलान्यास किया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। उन्होंने शिक्षा पर काम करने पर भी जोर दिया। तकनीकी शिक्षा के लिए बच्चे बाहर जाते थ्ो। मेरी सरकार बनी थी, तो बाहर पढ़ाई करने वालों का शुल्क सरकार देती थी, जिसे रघुवर दास की सरकार ने रोक दिया था। हम झारखंड में ही विभिन्न तकनीकी शिक्षा के संस्थान खोलेंगे। कम-से-कम हम 1० हजार नर्स तो बना सकते हैं। डिप्लोमा कोर्स के छोटे-छोटे संस्थान तो बना सकते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति खराब है। पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य कर्मी रखे जाने चाहिए, ये लोग गांवों में जा कर सर्वे करें। मैं मानता हूं कि ब्लॉक स्तर पर स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था होनी चाहिए।
छोटी-छोटी बीमारियों के लिए लोगों को खर्च कर शहर ना आना पड़े। जिला स्तर पर जांच की व्यवस्था हो। यह सब तभी संभव होगा, जब राज्य में दोबारा हमारी सरकार बनेगी। उन्होंने कहा कि 28 महीने के मेरे कार्यकाल का काम लोगों के जेहन में है। मैं 12-14 साल से अपने रास्ते पर चल रहा हूं, इसीलिए लोगों को मेरी ईमानदारी पर पूरा भरोसा है। मैं भी चाहता तो राज्यसभा में सीटें बेच सकता था। मेरे पास भी 11 विधायक थ्ो। इनको दांव पर लगा देता, तो 2० करोड़ आ जाते। 2००9 में मेरे साथ के विधायक भाग गए। सौदेबाजी कर सकते थ्ो।
श्री मरांडी ने चुनाव के लिए बने गठबंधन पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि झारखंड नामधारी पार्टियों को देखें, तो जयपाल सिह मुंडा के समय से लेकर झामुमो तक आदिवासी बाहुल्य सीटों पर इनका दबदबा रहा है। कभी समय था कि झारखंड पार्टी 3० सीटें तक ले आई। आज झामुमो 2० में सिमट रहा है। झारखंड नामधारी पार्टी और झामुमो का क्षरण हुआ है। महतो, मांझी, मुस्लिम का फॉर्मूला था। शहरी इलाके में भाजपा है। कांग्रेस वहीं है, जहां उसके लीडर हैं। बाकी जगहों पर कांग्रेस को लीडर खोजना पड़ रहा है। हम सब जगह हैं। हमारे कार्यकताã हर जगह हैं। कहीं हमारे लीडर हैं, तो कहीं मैं हूं, लेकिन हम लोगों की उपस्थिति हर जगह है। हम बढ़िया फाइट देने की स्थिति में हैं।
जमश्ोदपुर पूर्वी सीट पर सरयू राय का समर्थन नहीं किए जाने के संबंध में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि रघुवर दास को हराना था, तो सरयू राय को हमें समर्थन कर देना चाहिए था। उस सीट से हमारे पार्टी के अभय सिह ने संघर्ष करते हुए विपरित परिस्थितियों में पहचान बनाई है। सरयू राय को जमशेदपुर पश्चिम से चुनाव लड़ना चाहिए था। अभय सिह वहां वर्षों से तैयारी कर रहे हैं। उनकी तैयारी अच्छी है। ऐसे भी सरयू राय निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। निर्दलीय को लोग कितना पसंद करते हैं, जानते ही हैं। कुल मिलाकर अच्छी छवि नहीं रही है। निर्दलियों पर अब लोगों को भरोसा नहीं है। गठबंधन के संबंध में श्री मरांडी ने कहा कि मैंने गठबंधन की पहल की थी। ये लोग टालमटोल करते रहे। 2009 में क्या हुआ था। 20 सीटें हमें दी। पांच पर फ्रेंडली हुआ। हमने इसके बाद भी गठबंधन किया। 2014 में क्या हुआ। प्रदीप यादव और प्रवीण सिह कांग्रेस से बात करने गए थ्ो। रात में सहमति बनी कि हमें 25 सीटें दे रहे हैं। गठबंधन फाइनल है। केवल घोषणा होनी बाकी है। अगले दिन सुबह मुझे बताया गया कि गठबंधन नहीं होगा। हम सड़क पर आ गए। हमारे कुछ लीडर भाजपा में चले गए। 2०19 में भी हमने गठबंधन की कोशिश की। मेरा कहना था कि बातचीत कर तय कर लिया जाए। मई, जून, जुलाई बीत गया। उधर, राहुल गांधी त्यागपत्र दे चुके थ्ो। कांग्रेस अपने में फंसी हुई थी। 2014 वाली मेरी स्थिति ना बने, इसीलिए मैंने तैयारी शुरू कर दी। सितंबर में जनादेश समागम किया। हर विधानसभा क्षेत्र में कार्यकताã चुनावी तैयारी में लग गए। विरोधियों द्बारा बीजेपी को समर्थन करने के आरोप के संबंध में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पहली बार अकेले नहीं लड़ रहे हैं। 2०14 में भी अकेले चुनाव लड़े थ्ो। 2009 में कांग्रेस के साथ लड़े। लोग बहुत कुछ बोलते हैं। जो लोग बीजेपी का समर्थन करने की बात कर रहे हैं, वह सरासर गलत है। हम ऐसी बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं। भाजपा के लोगों ने संविधान के खिलाफ काम किया, लेकिन तब विपक्ष ने भी तो साथ नहीं दिया। केवल बाबूलाल मरांडी का मामला नहीं था, केवल विधायकों के जाने का मामला नहीं था। यह संविधान-कानून की बात थी। कांग्रेस चाहती तो संसद को जाम कर देती, संसद में सवाल उठते, लेकिन क्या हुआ। हम अपनी लड़ाई लड़ते रहे। सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के संबंध में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि संवेदनशील विषयों पर सरकार को सोच-समझ कर काम करना चाहिए। मुझे नहीं पता कि रघुवर दास की सरकार को कौन लोग सलाह दे रहा है। गैर मजरुआ जमीन की जमाबंदी रद्द कर दी। गैर मजरुआ जमीन पर लोगों ने घर बना लिया, उसे बेच कर अपनी जरूरत पूरी कर ली। सरकार ने कोई सर्वे नहीं कराया। अब 27 लाख एकड़ भूमि लैंड बैंक में दिखा रहे हैं। इनको हेमंत सोरेन का केवल सोहराय भवन दिख रहा है। अनावश्यक बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं। आज आदिवासी मकान के लिए भी जमीन नहीं खरीद पा रहा है। सीएनटी-एसपीटी में संशोधन करना था, तो न्यूनतम मानक तय कर आदिवासियों के बीच खरीद-बिक्री की सहूलियत दे सकते थे, लेकिन इन लोगों ने कॉरपोरेट के लिए नियम बनाना शुरू कर दिया था। सरकार को चाहिए कि आयोग बना कर सीएनटी-एसपीटी में संशोधन पर सहमति बनाए। चुनाव के मरांडी के किंगमकेर बनने के संबंध में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि मैं चुनाव लड़ रहा हूं। आगे क्या होगा नहीं जानता। मैं राजनीतिक सौदेबाजी नहीं कर रहा हूं। हां इतनाा अवश्य की जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट की जनता इस बार जेवीएम को अपना बहुमूल्य वोट देकर जिताने का काम करेगी, उन्होंने कहा कि मैं राजनीतिक सौदेबाजी नहीं कर रहा हूं 2009 में भी नहीं किया, आगे भी नहीं करूंगा।

