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    Home » ऐतिहासिक फैसले की उम्मीद
    Breaking News Headlines राष्ट्रीय संपादकीय

    ऐतिहासिक फैसले की उम्मीद

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 16, 2019No Comments4 Mins Read
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    रश्मि सिंह
    अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में हिंदू पक्ष की तरफ से दलीलें पूरी होने के बाद 2 सितंबर से सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पक्षकारों की बहस सुन रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी हिंदू पक्षों की बहस की सुनवाई 16 दिनों में पूरी कर ली थी, जिसमें निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान शामिल रहे। सितंबर महीने में मुस्लिम पक्ष की दलील सुनने की प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है। यहां बता दें कि यह मामला सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों की संवैधानिक पीठ के पास है। सीजेआई आगामी 17 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। लिहाजा, इससे पहले इस प्रकरण में ऐतिहासिक फैसला आने की उम्मीद है। अयोध्या विवाद को दशकों बीत चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की दलील सुनने की प्रक्रिया शुरू होने से एक उम्मीद बढ़ गई है कि इस प्रकरण में अब अंतिम फैसला आ जाएगा। जाहिर-सी बात है कि प्रकरण में अब अंतिम फैसला आने की जरूरत भी है।
    लगभग सभी लोग जानते हैं कि यह विवाद किस प्रकरण पर है और कितना संवेदनशील है। देश के हिंदुओं की मान्यता के अनुसार अयोध्या की विवादित जमीन भगवान राम की जन्मभूमि है, जबकि देश के मुसलमानों की पाक बाबरी मस्जिद भी विवादित स्थल पर स्थित है। इतिहास पर जाएं तो मुस्लिम सम्राट बाबर ने फतेहपुर सीकरी के राजा राणा संग्राम सिंह को वर्ष 1527 में हराने के बाद इस स्थान पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था। बाबर ने अपने जनरल मीर बांकी को क्षेत्र का वायसराय नियुक्त किया। मीर बांकी ने अयोध्या में वर्ष 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया, लेकिन इस के तथ्य सामने आए हैं कि जब मस्जिद का निर्माण हुआ तो मंदिर को नष्ट कर दिया गया था या बड़े पैमाने पर उसमें बदलाव किए गए। कई वर्षों बाद आधुनिक भारत में हिंदुओं ने फिर से राम जन्मभूमि पर दावे करने शुरू किए, जबकि देश के मुसलमानों ने विवादित स्थल पर स्थित बाबरी मस्जिद का बचाव करना शुरू किया।
    प्रमाणिक किताबों के अनुसार पुन: इस विवाद की शुरूआत सालों बाद वर्ष 1987 में हुई। वर्ष 1940 से पहले मुसलमान इस मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान कहते थे, इस बात के भी प्रमाण मिले हैं।
    विवाद की परिस्थितियों को देखते हुए वर्ष 1947 में भारत सरकार ने मुसलमानों के विवादित स्थल से दूर रहने के आदेश दिए और मस्जिद के मुख्य द्वार पर ताला डाल दिया गया, जबकि हिंदू श्रद्धालुओं को एक अलग जगह से प्रवेश दिया जाता रहा। वर्ष 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने हिंदुओं का एक अभियान शुरू किया कि हमें दोबारा इस जगह पर मंदिर बनाने के लिए जमीन वापस चाहिए। इसके पांच साल बाद यानि 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने आदेश दिया कि विवादित स्थल के मुख्य द्वारों को खोल देना चाहिए और इस जगह को हमेशा के लिए हिंदुओं को दे देना चाहिए।
    इस प्रकरण पर सांप्रदायिक ज्वाला तब भड़की, जब विवादित स्थल पर स्थित मस्जिद को नुकसान पहुंचाया गया। जब भारत सरकार के आदेश के अनुसार इस स्थल पर नए मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, तब मुसलमानों के विरोध ने साम्प्रदायिक गुस्से का रूप लेना शुरू किया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही, यह मुद्दा सांप्रदायिक हिंसा और नफरत का रूप लेकर पूरे देश में संक्रामक रोग की तरह फैलने लगा। इन दंगों में 2000 से ऊपर लोग मारे गए। मस्जिद विध्वंस के 10 दिन बाद मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।
    वर्ष 2003 में उच्च न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरात्तव विभाग ने विवादित स्थल पर 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 तक खुदाई की, जिसमें एक प्राचीन मंदिर के प्रमाण मिले। वर्ष 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में 574 पेज की नक्शों और समस्त साक्ष्यों सहित एक रिपोर्ट पेश की गई। भारतीय पुरात्तव विभाग के अनुसार खुदाई में मिले भग्वशेषों के मुताबिक विवादित स्थल पर एक प्रचीन उत्तर भारतीय मंदिर के प्रचुर प्रमाण मिले हैं। विवादित स्थल पर 50७30 के ढांचे का मंदिर के प्रमाण मिले हैं। 5 जुलाई 2005 को 5 आतंकियों ने अयोध्या के रामलला मंदिर पर हमला किया। इस हमले का मौके पर मौजूद सीआरपीएफ जवानों ने वीरतापूर्वक जवाब दिया और पांचों आतंकियों को मार गिराया। वहीं, 24 सितंबर 2010 को दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने फैसले की तारीख मुकर्रर की थी। फैसले के एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को टालने के लिए की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे 28 सितंबर तक के लिए टाल दिया था। उसके बाद भी इस प्रकरण को सुलझाने के प्रयास होते रहे, लेकिन हर प्रयास विफल होता रहा।

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