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    Home » सत्तर साल में पहली बारी, डरे हुए हैं अत्याचारी:कैलाश खेर
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    सत्तर साल में पहली बारी, डरे हुए हैं अत्याचारी:कैलाश खेर

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 13, 2019No Comments3 Mins Read
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    जमशेदपुर : हर हर महादेव के भजन संध्या कार्यक्रम में सूफी गायक कैलाश खेर शामिल होने आये. वे मीडिया से भी रू-ब-रू हुए. पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश…

    कैलाश खेर ने कहा कि हमारे पूर्वज कश्मीर के हैं. बहुत पहले वे विस्थापित हो गये थे. जो वहां बचे उनमें से कई को धर्म परिवर्तन करना पड़ा. आज जम्मू-कश्मीर में धारा 370 खत्म करने की बात सुनकर अच्छा लग रहा है. मैंने उसी दिन कविता लिख डाली. सत्तर साल में पहली बारी/ डरे हुए हैं अत्याचारी/ कांप रहे हैं दुष्ट संहारी/ आंख तीसरी, दिन सोमवारी…उन्होंने कहा कि सही मायने में अब देश जागा है. सत्तर साल से लोग सत्ता संभाल नहीं पा रहे थे. अब कोई जिंदा इंसान गद्दी पर बैठा है.
    जो घर जारे आपनो, चले हमारे साथ
    आज व्यक्ति गायक कम, स्टार ज्यादा बनाना चाहता है. यह धैर्य नहीं रहने के कारण होता है. हमारी तलाश सच्चे लोगों की रहती है, जो घर जारे आपनो/ चले हमारे साथ. मेरे साथ धनबाद के अभिषेक मुखर्जी और रचित अग्रवाल जुड़े हैं. दो साल पहले उनसे मिला. दोनों गुणी हैं. सात लोगों का बैंड है. मैं अपने जन्मदिन (सात जुलाई) पर हर साल नये बैंड को लॉन्च करता हूं.

    कश्मीर में खोलना चाहता हूं कलाधाम
    मैं कश्मीर में कलाधाम बनना चाहता हूं. इसकी शाखा कश्मीर में खुले ऐसा चाहता हूं. कश्मीर कश्यप ऋषि की धरती है. सूफियों की धरती है.

    ऐसा लग रहा है मानो मैं जमशेदपुर का ही हूं
    मैं झारखंड में रांची, देवघर कई बार आ चुका हूं. जमशेदपुर पहली बार आया हूं. आकर ऐसा लग रहा है जैसे मैं यहीं का हूं. झारखंड लालों की धरती है. कुबेर की धरती है. कहीं भी कुदाल चला लो, धातु निकल आती है. जमशेदपुर तो लौह नगरी है. लोहे से ही तो त्रिशूल बना है. यह मार्तंडों, योगियों की धरती है. यहां आया तो चारों तरफ पेड़ ही पेड़ नजर आये. पेड़ को मैं परमात्मा मानता हूं. यहां धरती से जितना लौह अयस्क लिये जाते हैं, उतने पेड़ भी लगा दिये जाते हैं.

    अगले साल अंटार्कटिका जा रहा हूं
    संगीत में चौदह साल का करियर पूरा हो गया है. आधे विश्व की सैर कर चुका हूं. अगले साल अंटार्कटिका जा रहा हूं. मैं जब भी सफर में फ्लाइट पर होता हूं हिंदी अखबार जरूर देखने की कोशिश करता हूं. मैं मानता हूं कि लिखावट में व्यक्तित्व झलकता है.

    बाजारवाद के कारण धैर्य खो रहे लोग
    बाजारवाद के कारण लोग धैर्य खो रहे हैं. हमें जो परोसा जाता है उसमें बह जाते हैं. हमें अपने बच्चों को ऐसे टीवी शो देखने से रोकना होगा जो बच्चों को बच्चों की चीजें नहीं दिखाता है. तभी हम बाजारवाद से लड़ पायेंगे. मैं जमीन से जुड़ा हूं. धार्मिक चीजों को सुनते हुए बड़ा हुआ हूं. बचपन से कबीर, नानक, रैदास, गोरखदास, आमिर खुसरो को सुन रहा हूं. संस्कार यहां से आये हैं. पोयेट्री सुनकर संगीत में आया. मैंने संगीत की प्रॉपर शिक्षा नहीं ली है.

    गांव से ही आता है बड़ा आदमी
    आप नजर उठाकर देख लीजिए दुनिया का कोई भी बड़ा आदमी गांव से ही आया है. कोई भी बड़ा ऑफिसर या कलाकार गांव में ही जन्मा है. शहर में तो भीड़ है. भगवान दूर-दराज में ही अच्छे इंसान को गढ़ते हैं. मैं युवाओं को संदेश देना चाहता हूं कि वे माता-पिता को सम्मान दें. रिश्ते को बचायें.

     

     

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