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    Home » रामकृष्ण परमहंस ब्रह्मर्षि और देवर्षि थे
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    रामकृष्ण परमहंस ब्रह्मर्षि और देवर्षि थे

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 16, 2023No Comments8 Mins Read
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    रामकृष्ण परमहंस जन्म जयन्ती-18 फरवरी 2023
    रामकृष्ण परमहंस ब्रह्मर्षि और देवर्षि थे
    ललित गर्ग
    भारत का जन-जन एवं कण-कण रामकृष्ण परमहंस की परमहंसी साधना का साक्षी है, उनकी गहन तपस्या के परमाणुओं से अभिषिक्त है। यहां की माटी और हवाएं धन्य हैं जो इस भक्ति और साधना के शिखरपुरुष के योग से आप्लावित है। वे संसार के पूर्णत्व को जो प्राप्त हैं, उनका जीवन ज्ञानयोग, कर्मयोग एवं भक्तियोग का समन्वय था। वे एक महान संत, शक्ति साधक तथा समाज सुधारक थे। इन्होंने अपना सारा जीवन निःस्वार्थ मानव सेवा के लिये व्यतीत किया, इनके विचारों का न केवल बंगाल के बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के बुद्धिजीवियों पर गहरा सकारात्मक असर पड़ा तथा वे सभी इन्हीं की राह पर चल पड़े। उन्होंने भाग्य की रेखाएं स्वयं निर्मित करने की जागृत प्रेरणा दी। स्वयं की अनन्त शक्तियों पर भरोसा और आस्था जागृत की। अध्यात्म और संस्कृति के वे प्रतीकपुरुष हैं। जिन्होंने एक नया जीवन-दर्शन दिया, जीने की कला सिखलाई।

     

     

     

    श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल प्रांत के हुगली जिले के कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके पिताजी का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय तथा माता का नाम चंद्रमणि देवी था। गदाधर के जन्म के पहले ही उनके माता-पिता को कुछ अलौकिक लक्षणों का अनुभव होने लगा था, जिसके अनुसार वे यह समझ गए थे कि कुछ शुभ होने वाला हैं। इनके पिता ने सपने में भगवान विष्णु को अपने घर में जन्म लेते हुए देखा तथा माता को शिव मंदिर में ऐसा प्रतीत हुआ कि एक तीव्र प्रकाश इनके गर्भ में प्रवेश कर रहा हैं। बाल्यकाल, यानी 7 वर्ष की अल्पायु में इनके पिता का देहांत हो गया तथा परिवार के सम्मुख आर्थिक संकट प्रकट हुआ, परन्तु इन्होंने कभी हार नहीं मानी। श्री रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों और जातियों की एकता तथा समानता हेतु जीवनभर कार्य किया, परिणामस्वरूप इन्हें राम-कृष्ण नाम सर्व साधारण द्वारा दिया गया एवं इनके उदार विचार एवं व्यापक सोच, जो सभी के प्रति समभाव रखते थे, इसी कारण उन्हें परमहंस की उपाधि प्राप्त हुई।

     

     

     

     

    श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल प्रांत के हुगली जिले के कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके पिताजी का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय तथा माता का नाम चंद्रमणि देवी था। गदाधर के जन्म के पहले ही उनके माता-पिता को कुछ अलौकिक लक्षणों का अनुभव होने लगा था, जिसके अनुसार वे यह समझ गए थे कि कुछ शुभ होने वाला हैं। इनके पिता ने सपने में भगवान विष्णु को अपने घर में जन्म लेते हुए देखा तथा माता को शिव मंदिर में ऐसा प्रतीत हुआ कि एक तीव्र प्रकाश इनके गर्भ में प्रवेश कर रहा हैं। बाल्यकाल, यानी 7 वर्ष की अल्पायु में इनके पिता का देहांत हो गया तथा परिवार के सम्मुख आर्थिक संकट प्रकट हुआ, परन्तु इन्होंने कभी हार नहीं मानी। श्री रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों और जातियों की एकता तथा समानता हेतु जीवनभर कार्य किया, परिणामस्वरूप इन्हें राम-कृष्ण नाम सर्व साधारण द्वारा दिया गया एवं इनके उदार विचार एवं व्यापक सोच, जो सभी के प्रति समभाव रखते थे, इसी कारण उन्हें परमहंस की उपाधि प्राप्त हुई।

    श्री रामकृष्ण परमहंस की बचपन से ही ईश्वर पर अडिग आस्था थी, ईश्वर के अस्तित्व को समस्त तत्वों में मानते थे तथा ईश्वर के प्राप्ति हेतु इन्होंने कठोर साधना भी की, ईश्वर प्राप्ति को ही सबसे बड़ा धन मानते थे। अंततः इन्होंने सभी धर्मों को एक माना तथा ईश्वर प्राप्ति हेतु केवल अलग-अलग मार्ग सिद्ध किया। अपने विचारों से सर्वदा, सभी धर्मों के मेल या भिन्न-भिन्न धर्मों को मानने वालों की एकता में इन्होंने अपना अहम योगदान दिया। वे माँ काली के परम भक्त थे, अपने दो गुरुओं योगेश्वरी भैरवी तथा तोतापुरी के सान्निध्य में इन्होंने सिद्धि प्राप्त की, ईश्वर के साक्षात् दर्शन हेतु कठिन तप किया एवं सफल हुए। इन्होंने मुस्लिम तथा ईसाई धर्म की भी साधनाएँ की और सभी में एक ही ईश्वर को देखा। उनकी भक्ति एवं साधना ने हजारों-लाखों को भक्ति-साधना के मार्ग पर अग्रसर किया। उनके जादुई हाथों के स्पर्श ने न जाने कितने व्यक्तियों में नयी चेतना का संचार हुआ, उन जैसे आत्मद्रष्टा ऋषि के उपदेशों का अचिन्त्य प्रभाव असंख्य व्यक्तियों के जीवन पर पड़ा। उनके प्रेरक जीवन ने अनेकों की दिशा का रूपान्तरण किया। उनकी पावन सन्निधि भक्ति, साधना एवं परोपकार की नयी किरणें बिखेरती रही अतः वे साधक ही नहीं, साधकों के महानायक थे। वे ब्रह्मर्षि और देवर्षि थे- साधना-भक्ति के नये-नये प्रयोगों का आविष्कार किया इसलिये ब्रह्मर्षि और ज्ञान का प्रकाश बांटते रहे इसलिये देवर्षि।

     

     

     

     

     

    रामकृष्ण परमहंस ने अपना ज्यादातर जीवन एक परम भक्त की तरह बिताया। वे काली के परम भक्त थे। उनके लिए काली कोई देवी नहीं थीं, वह एक जीवित हकीकत थी। काली उनके सामने नाचती थीं, उनके हाथों से खाती थीं, उनके बुलाने पर आती थीं और उन्हें आनंदविभोर छोड़ जाती थीं। ऐसी चमत्कारी एवं अविस्मरणीय घटनाएं उनके साथ अक्सर घटित होती थी। जब उनके भीतर भक्ति प्रबल होतीं, तो वे आनंदविभोर हो जाते और नाचना-गाना शुरू कर देते। जब वह थोड़े मंद होते और काली से उनका संपर्क टूट जाता, तो वह किसी शिशु की तरह रोना शुरू कर देते। उनकी चेतना इतनी ठोस थी कि वह जिस रूप की इच्छा करते थे, वह उनके लिए एक हकीकत बन जाती थी। इस स्थिति में होना किसी भी इंसान के लिए बहुत ही सुखद होता है। हालांकि उनका शरीर, मन और भावनाएं परमानंद से सराबोर थे, मगर उनका अस्तित्व इस परमानंद से परे जाने के लिए बेकरार था। उनके अंदर कहीं-न -कहीं एक जागरूकता थी कि यह परमानंद अपने आप में एक बंधन है।
    अत्यधिक भक्ति एवं मंदिर में हर समय ध्यान मग्न रहने के कारण, कुछ लोगों ने यह भ्रम फैला दिया कि गदाधर पागल हो गए या उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया हैं। परिणामस्वरूप, इनकी माता तथा बड़े भाई ने इनका विवाह करने का निश्चय किया, उनकी धारना थी कि विवाह पश्चात के कर्तव्य के पालन हेतु इनका मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा। सन् 1859 में 23 वर्ष की आयु में 5 वर्ष की आयु वाली कन्या शारदामनि मुखर्जी से गदाधर का विवाह सम्पन्न हुआ, वे दोनों ही संन्यासी जीवन व्यतीत करते थे। मायके से कोलकाता आने के पश्चात शारदा देवी ने अपने पति गदाधर से पूछा- आपकी कोई संतान नहीं होगी क्या? गदाधर ने उत्तर दिया इस संसार के सभी प्राणी तुम्हारे और मेरे संतान हैं, तुम तो अनगिनत संतानों की माता हो।
    एक दिन उनके गुरु तोतापुरी रामकृष्ण के पास आए और उन्हें समझाने की कोशिश की, ‘आप क्यों सिर्फ अपनी भक्ति में ही इतने लीन हैं? आपके अंदर इतनी क्षमता है कि चरम को छू सकते हैं।’ रामकृष्ण बोले, ‘मैं सिर्फ काली को चाहता हूं, बस।’ वह एक बच्चे की तरह थे जो सिर्फ अपनी मां को चाहता था। इससे बहस करना संभव नहीं था। यह बिल्कुल भिन्न अवस्था होती है। रामकृष्ण काली को समर्पित थे और उनकी दिलचस्पी सिर्फ काली में थी। वे दक्षिणेश्वर के मंदिर में विद्यमान काली-प्रतिमा या विग्रह में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखते थे। वे योग तथा तंत्र पद्धति में पारंगत साधक तो थे ही, साथ ही उन्होंने श्रद्धा भाव-भक्ति युक्त साधना, भक्ति पर विशेष बल दिया तथा प्रचार भी किया।
    रामकृष्ण परमहंस सिद्ध संतपुरुष थे, सिद्धि प्राप्ति के पश्चात, उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा बहुत से बुद्धिजीवी, संन्यासी एवं सामान्य वर्ग के लोग उनके संसर्ग हेतु दक्षिणेश्वर काली मंदिर आने लगे। सभी के प्रति उनका स्वभाव बड़ा ही कोमल था, सभी वर्गों तथा धर्मों के लोगों को वे एक सामान ही समझते थे। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं होता था जो परमहंसजी नहीं जान पाते थे, माँ काली की कृपा से वे त्रिकालदर्शी महापुरुष बन गए थे। रूढ़िवादी परम्पराओं का त्याग कर, उन्होंने समाज सुधार में अपना अमूल्य योगदान दिया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर, विजयकृष्ण गोस्वामी, केशवचन्द्र सेन जैसे बंगाल के शीर्ष विचारक उनसे प्रेरणा प्राप्त करते थे। इसी श्रेणी में स्वामी विवेकानंद उनके प्रमुख शिष्य थे, उनके विचारों तथा भावनाओं का स्वामीजी ने सम्पूर्ण विश्व में प्रचार किया तथा हिन्दू सभ्यता तथा संस्कृति की अतुलनीय परम्परा को प्रस्तुत किया। स्वामीजी ने परमहंस जी के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो सम्पूर्ण विश्व में समाज सेवा, शिक्षा, योग, हिन्दू दर्शन पर आधारित कार्यों में संलग्न रहती हैं तथा प्रचार करती हैं, इनका मुख्यालय बेलूर, पश्चिम बंगाल में हैं। रामकृष्ण परमहंस, ठाकुर नाम से जाने जाने लगे थे, बंगाली में ठाकुर शब्द का अभिप्राय ईश्वर होता हैं, सभी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे थे। सचमुच रामकृष्ण परमहंस ने अपने प्रत्येक क्षण को जिस चैतन्य, प्रकाश एवं अलौकिकता के साथ जीया, वह भारतीय ऋषि परम्परा के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने स्वयं ही प्रेरक जीवन नहीं जीया, लोकजीवन को ऊंचा उठाने का जो हिमालयी प्रयत्न किया है, वह भी अद्भुत एवं विस्मयकारी है। ऐसे दिव्य संतपुरुष को उनके जन्म दिवस पर श्रद्धासुमन समर्पित है।

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