300-350 रुपए क्विंटल आलू बेचने की मजबूरी, कर्ज में डूबे किसान: बाजार में 12 रुपए किलो भाव
बेगूसराय/ राष्ट्र संवाद ब्यूरो
जिस आलू को उपजाने में किसान अपनी पूरी पूंजी और मेहनत लगा देता है, आज उसी आलू को बेचने के लिए उसे खरीदारों की राह देखनी पड़ रही है। बरौनी सहकारी शीत भंडार में किसान 300 से 350 रुपए प्रति क्विंटल आलू बेचने को मजबूर हैं, जबकि खुले बाजार में उपभोक्ता यही आलू करीब 12 रुपए प्रति किलो खरीद रहे हैं। उत्पादन, भंडारण, धुलाई और ढुलाई मिलाकर एक क्विंटल आलू पर 950 से 1000 रुपए खर्च करने वाले किसानों को लागत का आधा भी नहीं मिल रहा। थोक व्यापारी खरीदारी से कतरा रहे हैं और किसानों की जमा पूंजी शीत भंडार में फंसी है। कर्ज लेकर खेती करने वाले किसानों के सामने अब कर्ज चुकाने और अगली फसल लगाने का संकट है। किसान और उपभोक्ता के बीच कीमतों का यह भारी अंतर बाजार व्यवस्था और बिचौलियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।
कर्ज में डूबी खेती, अगली फसल पर संकट:
प्रबंध समिति सदस्य बरौनी एक निवासी आसो सिंह के 1100 क्विंटल, मंतोष चौधरी के 500 क्विंटल और अजय कुमार के 2000 बोरे आलू का खरीदार नहीं मिल रहा है। पंकज सिंह ने सात बीघा में खेती पर 2.80 लाख रुपए खर्च किए थे। किसानों का कहना है कि इस घाटे के बाद अगली खेती के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल है।
शीत भंडार में 40 प्रतिशत आलू अब भी फंसा:
प्रबंधक मदन मोहन सिंह और कैशियर गुलशन कुमार के अनुसार 6000 मीट्रिक टन क्षमता वाले भंडार में 5600 मीट्रिक टन आलू रखा गया था। निकासी का अंतिम समय नजदीक है, फिर भी करीब 40 प्रतिशत आलू भंडारित है। अच्छी गुणवत्ता के बावजूद व्यापारी खरीदारी नहीं कर रहे हैं।
किसानों की सरकार से मांग:
आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित हो, सरकारी खरीद केंद्र खुलें और पारदर्शी व्यवस्था लागू हो। किसानों ने बिचौलियों की मनमानी पर रोक लगाने की भी मांग की है।
सबसे बड़ा सवाल: जब आलू पैदा करने वाला किसान लागत निकालने के लिए तरस रहा है और उपभोक्ता महंगे दाम चुका रहा है, तो किसान की मेहनत का मुनाफा आखिर किसकी जेब में जा रहा है।

