Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » होली आनंदोल्लास का पर्व 
    मेहमान का पन्ना

    होली आनंदोल्लास का पर्व 

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 18, 2019No Comments7 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    ललित गर्ग 
    होली प्रेम, आपसी सद्भाव और मस्ती के रंगों में सराबोर हो जाने का अनूठा त्यौहार है। यद्यपि आज के समय की गहमागहमी, मेरेे-तेरे की भावना, भागदौड़ से होली की परम्परा में बदलाव आया है। परिस्थितियों के थपेड़ों ने होली की खुशी को प्रभावित भी किया है, फिर भी जिन्दगी जब मस्ती एवं खुशी को स्वयं में समेटकर प्रस्तुति का बहाना मांगती है तक प्रकृति हमें होली जैसा रंगारंग त्योहार देती है। होली ही एक ऐसा त्योहार है, जिसके लिये मन ही नहीं, माहौल भी तत्पर रहता है।  होली का धार्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस त्योहार की गौरवमय परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए हम एक सचेतन माहौल बनाएं, जहां हम सब एक हो और मन की गन्दी परतों को उतार फेंके ताकि अविभक्त मन के आईने में प्रतिबिम्बित सभी चेहरे हमें अपने लगें। प्रदूषित माहौल के बावजूद जीवन के सारे रंग फीके न पड़ पाए।
    पौराणिक मान्यताओं की रोशनी में होली के त्योहार का विराट् समायोजन बदलते परिवेश में विविधताओं का संगम बन गया है, इस त्योहार को मनाते हुए यूं लगता है सब कुछ खोकर विभक्त मन अकेला खड़ा है फिर से सब कुछ पाने की आशा में। क्योंकि इस अवसर पर रंग, गुलाल डालकर अपने इष्ट मित्रों, प्रियजनों को रंगीन माहौल से सराबोर करने की परम्परा है, जो वर्षों से चली आ रही है। एक तरह से देखा जाए तो यह उत्सव प्रसन्नता को मिल-बांटने का एक अपूर्व अवसर होता है। होली की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसको मनाते हुए हम समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम, एकता एवं सद्भावना को बढ़ाते हैं। इस त्योहार को मनाने के पीछे की भावना है मानवीय गरिमा को समृद्धि प्रदान करना, जीवनमूल्यों की पहचान को नया आयाम प्रदत्त करना। हम कितने भोले हैं कि अपनी संस्कृति एवं आदर्श परम्पराओं को हमीं मिटा रहे हैं। स्वयं अपना घर जला कर स्वयं तमाशा बन रहे हैं। आखिर हमीं तो वे लोग हैं जिन्होंने देश की पवित्र जमीं के नीचे हिंसा, अन्याय, शोषण, आतंक, असुरक्षा, अपहरण, भ्रष्टाचार, अराजकता, अत्याचार जैसे घिनौने तत्वों की गहरी और लम्बी सुरंगें बिछाकर उन पर अपने स्वार्थों का बारूद फैला दिया बिना कोई परिणाम सोचे, बिना भविष्य की संभावनाओं को देखे। फिर भला कैसे सुरक्षित रह पाएगा आम आदमी का आदर्श। आम आदमी का जीवन। इन अंधेरों एवं जटिल हालातों के बीच होली जैसे त्योहार हमारी रोशनी की इंजतार एवं उजालों की कामना को पूरा करने के लिये हमें तत्पर करते हैं।
    होली शब्द का अंग्रेजी भाषा में अर्थ होता है पवित्रता। पवित्रता प्रत्येक व्यक्ति को काम्य होती है और इस त्योहार के साथ यदि पवित्रता की विरासत का जुड़ाव होता है तो इस पर्व की महत्ता शतगुणित हो जाती है। प्रश्न है कि प्रसन्नता का यह आलम जो होली के दिनों में जुनून बन जाता है, कितना स्थायी है? डफली की धुन एवं डांडिया रास की झंकार में मदमस्त मानसिकता ने होली जैसे त्योहार की उपादेयता को मात्र इसी दायरे तक सीमित कर दिया, जिसे तात्कालिक खुशी कह सकते हैं, जबकि अपेक्षा है कि रंगों की इस परम्परा को दीर्घजीविता प्रदान की जाए। स्नेह और सम्मान का, प्यार और मुहब्बत का, मैत्री और समरसता का ऐसा शमां बांधना चाहिए कि जिसकी बिसात पर मानव कुछ नया भी करने को प्रेरित हो सके।
    वस्तुतः होली आनंदोल्लास का पर्व है। होली के त्यौहार में विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएँ होती हैंें, बालक गाँव के बाहर से लकड़ी तथा कंडे लाकर ढेर लगाते हैं। होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत् पूजन किया जाता है, अट्टहास, किलकारियों तथा मंत्रोच्चारण से पापात्मा राक्षसों का नाश हो जाता है। होलिका-दहन से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं। इस पर्व के विषय में सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा प्रह्लाद तथा होलिका के संबंध में भी है। नारदपुराण में बताया गया है कि हिरण्यकशिपु नामक राक्षस का पुत्र प्रह्लाद अनन्य हरि-भक्त था, जबकि स्वयं हिरण्यकशिपु नारायण को अपना परम-शत्रु मानता था। उसके राज्य में नारायण अथवा श्रीहरि नाम के उच्चारण पर भी कठोर दंड की व्यवस्था थी। अपने पुत्र को ही हरि-भक्त देखकर उसने कई बार चेतावनी दी, किंतु प्रह्लाद जैसा परम भक्त नित्य प्रभु-भक्ति में लीन रहता था। हारकर उसके पिता ने कई बार विभिन्न प्रकार के उपाय करके उसे मार डालना चाहा। किंतु, हर बार नारायण की कृपा से वह जीवित बच गया। हिरण्यकशिपु की बहिन होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। अतः वह अपने भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश कर गई। किंतु प्रभु-कृपा से प्रह्लाद सकुशल जीवित निकल आया और होलिका जलकर भस्म हो गई। होली का त्योहार ‘असत्य पर सत्य की विजय’ और ‘दुराचार पर सदाचार की विजय’ का प्रतीक है। इस प्रकार होली का पर्व सत्य, न्याय, भक्ति और विश्वास की विजय तथा अन्याय, पाप तथा राक्षसी वृत्तियों के विनाश का भी प्रतीक है।
    होली के पर्व को मनाने के लिये और भी बहुत ही पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। उत्तर पूर्व भारत में होलिकादहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस के रूप में जोड़कर, पूतना दहने के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात् कामदेव की पत्नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर देवताओं ने रंगों की वर्षा की।
    होली के उपलक्ष्य में अनेक सांस्कृतिक एवं लोक चेतना से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। महानगरीय संस्कृति में होली मिलन के आयोजनों ने होली को एक नया उल्लास एवं उमंग का रूप दिया है। इन आयोजनों में बहुत शालीन तरीके से गाने बजाने के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। घूमर जो होली से जुड़ा एक राजस्थानी कार्यक्रम है उसमें लोग मस्त हो जाते हैं। चंदन का तिलक और ठंडाई के साथ सामूहिक भोज इस त्यौहार को गरिमामय छबि प्रदान करते हैं। देर रात तक चंग की धुंकार, घूमर, डांडिया नृत्य और विभिन्न क्षेत्रों की गायन मंडलियाँ अपने प्रदर्शन से रात बढ़ने के साथ-साथ अपनी मस्ती और खुशी को बढ़ाते हैं। आज का सारा माहौल प्रदूषित हो चुका है, जीवन के सारे रंग फिके पड़ गए हैं। न कहीं आपसी विश्वास रहा, न किसी का परस्पर प्यार, न सहयोग की उदात्त भावना रही, न संघर्ष में एकता का स्वर उठा। बिखराव की भीड़ में न किसी ने हाथ थामा, न किसी ने आग्रह की पकड़ छोड़ी।
    होली का सबसे पवित्र एवं आध्यात्मिक माहौल मथुरा और वृन्दावन में देखने को मिलता है। बसन्तोत्सव के आगमन के साथ ही वृन्दावन के वातावरण में एक अद्भुत मस्ती का समावेश होने लगता है, बसन्त का भी उत्सव यहाँ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है । इस उत्सव की आनन्द लहरी धीमी भी नहीं हो पाती कि प्रारम्भ हो जाता है, फाल्गुन का मस्त महीना। फाल्गुन मास और होली की परम्पराएँ श्रीकृष्ण की लीलाओं से सम्बद्ध हैं और भक्त हृदय में विशेष महत्व रखती हैं। श्रीकृष्ण की भक्ति में सराबोर होकर होली का रंगभरा और रंगीनीभरा त्यौहार मनाना एक विलक्षण अनुभव है। मंदिरों की नगरी वृन्दावन में फाल्गुन शुक्ल एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन यहाँ होली के रंग खेलना परम्परागत रूप में प्रारम्भ हो जाता है। मंदिरों में होली की मस्ती और भक्ति दोनों ही अपनी अनुपम छटा बिखेरती है। यह परम्परा इतनी जीवन्त है कि इसके आकर्षण में देश-विदेश के लाखों पर्यटक ब्रज वृन्दावन की दिव्य होली के दर्शन करने और उसके रंगों में भीगने का आनन्द लेने प्रतिवर्ष यहाँ आते हैं ।
    होली जैसे त्यौहार में जब अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, ब्राह्मण-शूद्र आदि सब का भेद मिट जाता है, तब ऐसी भावना करनी चाहिए कि होली की अग्नि में हमारी समस्त पीड़ाएँ, दुःख, चिंताएँ, द्वेष-भाव आदि जल जाएँ तथा जीवन में प्रसन्नता, हर्षोल्लास तथा आनंद का रंग बिखर जाए। होली का कोई-न-कोई संकल्प हो और यह संकल्प हो सकता है कि हम स्वयं शांतिपूर्ण जीवन जीये और सभी के लिये शांतिपूर्ण जीवन की कामना करें। ऐसा संकल्प और ऐसा जीवन सचमुच होली को सार्थक बना सकते हैं।
    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleउत्तर प्रदेश में कांग्रेस काे समर्थन देने का कोई कारण नहीं:भीम आर्मी प्रमुख
    Next Article भारत की वर्तमान राजनीति का सबसे बड़ा चाणक्य कौन है?

    Related Posts

    भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता: आशा का सेतु | राष्ट्र संवाद

    April 30, 2026

    छात्रों का आत्मघात: सपनों का बोझ या सिस्टम की नाकामी | राष्ट्र संवाद

    April 27, 2026

    विश्व इच्छा दिवस 2026: आशा और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव | राष्ट्र संवाद

    April 27, 2026
    Leave A Reply Cancel Reply

    अभी-अभी

    वाराणसी में प्रधानमंत्री: नीतियों के केंद्र में बहन-बेटियां | राष्ट्र संवाद

    नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप: असम के रितेश शर्मा ने जीता कांस्य पदक | राष्ट्र संवाद

    समाजसेवी धर्मबीर नांदल का निधन: सामाजिक जीवन में बड़ी क्षति | राष्ट्र संवाद

    बंगाल चुनाव: भांगर का तनाव और लोकतंत्र की साख | राष्ट्र संवाद

    डोंबिवली रेप केस: अनाथ लड़की से पहले मारपीट, फिर दोस्त ने की दरिंदगी | राष्ट्र संवाद

    भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता: आशा का सेतु | राष्ट्र संवाद

    नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप: रितेश शर्मा ने जीता कांस्य पदक | राष्ट्र संवाद

    नगर निकायों की समीक्षा बैठक में नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर जोर

    जमशेदपुर में मौसम का बदला मिजाज, तेज हवा-बारिश के साथ गिरे ओले

    परसुडीह समेत कई क्षेत्रों में JNAC से सफाई व्यवस्था लागू करने की मांग

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.