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    जकात इस्लाम के 5 बुनियादों में से एक है – हाफिज जलालुद्दीन

    Nizam KhanBy Nizam KhanApril 16, 2022No Comments3 Mins Read
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    जकात इस्लाम के 5 बुनियादों में से एक है – हाफिज जलालुद्दीन

    संवाददाता/जामताड़ा

    जामताड़ा : जमीयत उलेमा जिला महासचिव हाफिज जलालुद्दीन अंसारी कहते हैं कि रमजान के महीने में ईद की नमाज से पहले सदका ए फितर और जकात देना हर हैसियतमंद मुसलमान पर फर्ज होता है रमजान इस्लामिक कैलेंडर का नौवां महीना है इस साल रमजान का पवित्र महीना 3 अप्रैल 2022 से शुरू हुआ है रमजान को ‘कुरआन का महीना’ भी कहते है, क्योंकि इसी महीने में पैगंबर सल्लल्लाहू अलेही व सल्लम के जरिए कुरआन उतारा गया। रमजान में रोजा-नमाज और कुरआन की तिलावत के साथ जकात और सदका ए फितर देने का भी बहुत पुरानी रिवायत है। इस्लाम के मुताबिक, जिस मुसलमान के पास भी इतना पैसा या संपत्ति हो कि वो उसके अपने खर्च पूरे हो रहे हों और वो किसी की मदद करने की स्थिति में हो तो वह दान करने का पात्र बन जाता है रमजान में इस दान को दो रूप में दिया जाता है, सदका ए फितर और जकात ।

    जकात क्या है

    आमदनी से पूरे साल में जो बचत होती है, उसका 2.5 फीसदी हिस्सा किसी गरीब या जरूरतमंद को दिया जाता है, जिसे जकात कहते हैं । यानी अगर किसी मुसलमान के पास तमाम खर्च करने के बाद 100 रुपये बचते हैं तो उसमें से 2.5 रुपये किसी गरीब को देना जरूरी होता है। यूं तो जकात पूरे साल में कभी भी दी जा सकती है, लेकिन वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर रिटर्न फाइल करने की तरह ज्यादातर लोग रमजान के पूरे महीने में ही जकात निकालते हैं। मुसलमान इस महीने में अपनी पूरे साल की कमाई का आकलन करते हैं और उसमें से 2.5 फीसदी दान करते हैं। असल में ईद से पहले यानी रमजान में जकात अदा करने की परंपरा है यह जकात खासकर गरीबों, विधवा महिलाओं, अनाथ बच्चों या किसी बीमार व कमजोर व्यक्ति को दी जाती है। महिलाओं या पुरुषों के पास अगर ज्वैलरी के रूप में भी कोई संपत्ति होती है तो उसकी कीमत के हिसाब से भी जकात दी जाती है लेकिन जो लोग हैसियतमंद होते हुए भी अल्लाह की रजा में जकात नहीं देते हैं, वो गुनाहगारों में शुमार हैं ।

    सदका ए फितर क्या है

    सदका ए फितर वो रकम होती है जो खाते-पीते, साधन संपन्न घरानों के लोग आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को देते हैं ईद की नमाज से पहले इसका अदा करना जरूरी होता है। इस तरह अमीर के साथ ही गरीब की साधन संपन्न के साथ ईद भी मना ली जाती है फितरे की रकम भी गरीबों, बेवाओं व यतीमों और सभी जरूरतमंदों को दी जाती है इस सबके पीछे सोंच यही है कि ईद के दिन कोई खाली हाथ न रहे, क्योंकि यह खुशी का दिन है। जकात और फितरे में बड़ा फर्क ये है कि जकात देना रोजे रखने और नमाज पढ़ने जैसा ही जरूरी होता है, बल्कि फितरा देना इस्लाम के तहत जरूरी नहीं है फितरे के बारे में बताया गया कि जकात में 2.5 फीसदी देना तय होता है जबकि फितरे की कोई सीमा नहीं होती इंसान अपनी हैसियत के हिसाब से कितना भी फितरा दे सकता है।अल्लाह तआला ने ईद का त्योहार गरीब और अमीर सभी के लिए बनाया है गरीबी की वजह से लोगों की खुशी में कमी ना आए इसलिए अल्लाह तआला ने हर संपन्न मुसलमान पर जकात और फितरा देना फर्ज कर दिया है !

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