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    Home » विश्व पर्यावरण दिवस विशेष : क्या सिर्फ पौधारोपण के सहारे बच पाएगा पर्यावरण
    झारखंड सरायकेला-खरसावां

    विश्व पर्यावरण दिवस विशेष : क्या सिर्फ पौधारोपण के सहारे बच पाएगा पर्यावरण

    Aman OjhaBy Aman OjhaJune 4, 2026No Comments2 Mins Read
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    राष्ट्र संवाद संवाददाता संजय शर्मा

    5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जिले भर में पौधारोपण, जागरूकता रैली और पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा होंगी, पर्यावरण बचाने के संकल्प लिए जाएंगे और हरियाली बढ़ाने के संदेश दिए जाएंगे। लेकिन चांडिल अनुमंडल और ईचागढ़ क्षेत्र की जमीनी हकीकत कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। सवाल यह है कि क्या पर्यावरण संरक्षण अब केवल औपचारिक कार्यक्रमों और फोटो सेशन तक सीमित होकर रह गया है?

    पहाड़, जंगल और नदियों से घिरा चांडिल क्षेत्र प्राकृतिक संपदा से समृद्ध माना जाता है। क्षेत्र में स्थित दलमा वन्यजीव अभयारण्य जंगली हाथियों की प्रमुख शरणस्थली है, जबकि सुवर्णरेखा नदी स्थानीय आबादी और वन्यजीवों के लिए जीवनरेखा का काम करती है। इसके बावजूद जंगलों की कटाई,भारी मशीनों से अवैध पत्थर एवं बालू खनन, पत्थर क्रशर, ईंट भट्ठों तथा अन्य औद्योगिक गतिविधियों के धुएं से होने वाले प्रदूषण को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

    स्थानीय बुद्धिजीवियों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि विकास और औद्योगिकीकरण की दौड़ में जल, जंगल और जमीन का लगातार दोहन हो रहा है। उनका आरोप है कि करोड़ों रुपये खर्च कर विभिन्न पर्यावरणीय योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है।

    ईचागढ़ क्षेत्र के खोखरो, सोरो, जारागोडीह, खीरी बामुंडीह , में अवैध बालू खनन में मशहूर है ,वही आसनबनी, कदरबेड़ा, चिल्गू, हारुडीह, धातकीडीह, चाकुलिया, तुलिन, हुमीद, खोखरो, कटिया और भादुडीह समेत कई इलाकों में जंगली हाथियों के कोरिडोर इको-सेंसिटिव जोन के भीतर बढ़ती अवैध गतिविधियां चिंता का विषय बनी हुई हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वन्यजीव गलियारों के आसपास होटल, रेस्टोरेंट, खनन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन को लेकर समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन कार्रवाई प्रशासनिक करवाई अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखती।

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