नारी
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तुम त्रेता युग की वैदेही (सीता) हो,
तुम द्वापर की द्रौपदी हो,
तुम माँ शक्ति, तुम अभया,
तुम चंडी, चंड-मुंड का संहार करने वाली मालिनी,
तुम ही सेवादायिनी हो।
तुम सिंहवाहिनी दुर्गा,
तुम माँ असुरनाशिनी,
समय आ गया है अब अस्त्र उठाने का,
समय आ गया है असुरों के वध का,
समय आ गया है विजय यात्रा का,
पुराने नियमों की नीति को तोड़ने का।
महाभारत की कहानी सुनी है तुमने,
पर आँखों से युद्ध नहीं देखा,
अब जनता सड़कों और मैदानों में उतर आई है,
तुमने सबकी साँसों को थाम दिया है।
वज्र की वाणी आकाश और हवाओं में गूँज रही है,
बोधन (जागृति) का दिन अब आ गया है,
जन-आक्रोश ने वज्र सा प्रहार किया है,
सारे रास्ते अब तितर-बितर हो चुके हैं।
माँ का बोधन अब प्राप्त हो गया है,
उस ‘अभया’ के आर्तनाद (दुख भरी पुकार) में,
आकाश और हवाओं में शंख गूँज उठा है,
न्याय की उस गूँज और कोलाहल में।
न्याय की वाणी को मौन कर दिया गया है,
पर क्या वह स्फुलिंग (चिंगारी) चुप रहेगी?
क्या वह चिंगारी अब शांत होगी?
लेखिका: वर्णली खारा
