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    विद्वान होकर भी आदमी रावण बन सकता है: ज्ञान और अहंकार का कड़वा सच

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 26, 2026No Comments3 Mins Read
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    विद्वान होकर भी आदमी रावण बन सकता है
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    लेखक: इंद्र यादव

    महत्वपूर्ण ये नहीं कि रावण कितना बड़ा विद्वान था, विद्वान होकर भी आदमी रावण बन सकता है यह बात आज के दौर में सबसे बड़ा सबक है। हम सदियों से रावण की विद्वता के गुण गाते आए हैं—चारों वेदों का ज्ञाता, ज्योतिष का प्रकांड पंडित और महादेव का अनन्य भक्त। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां मुंबई की लोकल ट्रेन की तरह हर कोई बस आगे निकलने की होड़ में लगा है, असली मुद्दा उसकी विद्वता नहीं, बल्कि उसका पतन है।

    विद्वान होकर भी आदमी रावण बन सकता है: आधुनिक परिप्रेक्ष्य

    आजकल चारों तरफ ऐसे ‘तेज़ दिमाग’ लोगों की भरमार है। किसी के पास लंदन की डिग्री है, तो कोई बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में CEO की कुर्सी पर विराजमान है। इनके भाषण इतने प्रभावी होते हैं कि बड़े-बड़े ज्ञानी भी पानी मांग लें। मगर असली लोच कहाँ है? लोच इनकी नीयत और अक्कल के इस्तेमाल में है। जब दिमाग में ज्ञान भर जाता है और दिल में अहंकार घर कर लेता है, तब इंसान भूल जाता है कि जमीन पर पैर कैसे रखे जाते हैं।

    उसे लगने लगता है कि ‘मुझसे ज़्यादा समझदार इस दुनिया में कोई पैदा ही नहीं हुआ।’ बस, यहीं से उस इंसान के भीतर का ‘रावण’ जाग जाता है। फिर वह अपने ज्ञान का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को कुचलने, उन्हें छोटा दिखाने और अपना उल्लू सीधा करने के लिए करता है। त्रेतायुग का रावण तो इतिहास बन गया, लेकिन आज का रावण हमारे बीच सूट-बूट पहनकर घूम रहा है।

    पुराना रावण बनाम नया रावण: फर्क सिर्फ लिबास का

    पुराना रावण: दस सिर और बीस हाथ लेकर घूमता था, माता सीता का हरण करके ले गया था। उसके पास सोने की लंका थी।
    आज का रावण: ब्रांडेड सूट पहनता है, एसी केबिन में बैठकर फाइलें चलाता है, और दूसरों की मेहनत, उनका हक़ और उनका भरोसा चुरा लेता है। इसके पास बैंक बैलेंस, पावर और पोजीशन का घमंड है।

    अक्कल दोनों के पास कूट-कूट कर भरी थी, लेकिन दोनों का पतन अहंकार की वजह से ही हुआ। यह समझना जरूरी है कि सिर्फ बड़ी डिग्रियां या भारी-भरकम ज्ञान इंसान को ‘महान’ नहीं बनाते। महान इंसान बनता है अपने संस्कारों से, अपनी इंसानियत से और अपनी विनम्रता से।

    ज्ञान: हथियार या ढाल?

    ज्ञान और डिग्रियां तो महज़ एक हथियार जैसी हैं। अब ये आपके ऊपर है कि आप उस हथियार से किसी का घर बसाते हो या किसी की छाती पर मूंग दलते हो। मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि बौद्धिक श्रेष्ठता का बोध जब नैतिक श्रेष्ठता के भ्रम में बदल जाता है, तो व्यक्ति ‘नार्सिसिस्टिक’ प्रवृत्ति का शिकार हो जाता है। अहंकार के मनोविज्ञान को समझें तो पता चलता है कि यह पतन की पहली सीढ़ी है।

    इसलिए भाई, पढ़ाई करो, तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ो, आसमान छूओ… लेकिन इस बात को कभी मत भूलना कि दिमाग में चाहे जितनी भी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हों, छाती में अहंकार का रावण नहीं पलना चाहिए! दिमाग का ज्ञानी होना आसान है, इंसान का ज्ञानी होना मुश्किल… और जब अहंकार सिर पर चढ़ जाए, तो बड़े-बड़े वेदों के ज्ञाता भी राख बन जाते हैं।

    अहंकार ज्ञान नैतिकता रावण विद्वान
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