अलविदा बिजली रानी! एक दौर था, जब शाहाबाद में जिसकी हैसियत बड़ी होती थी, उसके दरवाजे पर चांद-बिजली का नाच होता था
**अनूप नारायण सिंह की कलम से**
हाथ में रुमाल लेकर गाल पोंछने वाला वह गीत आज भी यादों के किसी कोने में बज उठता है, तो आंखों के सामने भोजपुरी लोकसंस्कृति का एक पूरा दौर जीवंत हो जाता है। इसी गीत ने सबसे पहले बिजली रानी से परिचय कराया था। तब कहां पता था कि बिजली रानी सिर्फ एक लोक कलाकार नहीं, बल्कि बिहार के गांवों की उस सांस्कृतिक विरासत का नाम हैं, जिसके साथ हजारों लोगों की यादें, भावनाएं और प्रतिष्ठा जुड़ी हुई थीं। बाद में जब चांद-बिजली के नाच की कहानियां सुनीं, तो समझ में आया कि शाहाबाद के गांवों में इस मंडली का कार्यक्रम होना महज मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक हैसियत और रसूख का प्रतीक हुआ करता था।
आज ही के दिन पिछले साल बिजली रानी इस दुनिया को अलविदा कह गई थीं। उनके जाने के साथ ही जैसे भोजपुरी लोकनाच की वह परंपरा भी एक बार फिर गहरी उदासी में डूब गई, जिसने दशकों तक शाहाबाद से लेकर सारण और चंपारण तक के गांवों में अपनी धाक जमाए रखी। कभी जिनकी आवाज, अदाओं और मंचीय प्रस्तुतियों के लिए गांव-गांव में इंतजार होता था, आज उनकी यादें ही उस बीते हुए समय की गवाही दे रही हैं।
बिजली रानी का नाम भोजपुरी समाज में कभी किसी परिचय का मोहताज नहीं था। उनका असली नाम बिजली रानी था, लेकिन भोजपुरी की अपनी मिठास और स्थानीय उच्चारण ने उन्हें ‘बिजुरी रानी’ बना दिया। जिस तरह आज भोजपुरी सिनेमा में पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, दिनेश लाल यादव निरहुआ और रवि किशन जैसे नामों की चर्चा होती है, कभी भोजपुरी के पारंपरिक नाच की दुनिया में चांद और बिजली रानी की जोड़ी का अपना अलग जलवा था। फर्क बस इतना था कि उस दौर में प्रसिद्धि का पैमाना सोशल मीडिया के व्यूज और लाइक नहीं, बल्कि गांवों की चौपालों पर होने वाली चर्चा, शादी-ब्याह में उमड़ने वाली भीड़ और कलाकारों को मिलने वाला सम्मान हुआ करता था।
**चांद-बिजली का नाच और गांवों की प्रतिष्ठा**
अस्सी और नब्बे के दशक में शाहाबाद के इलाके में चांद-बिजली के नाच का ऐसा क्रेज था कि हर कोई अपनी शादी या तिलक में इस मंडली का कार्यक्रम कराने की हैसियत नहीं रखता था। जिसके यहां चांद-बिजली का नाच आयोजित होता, उसे इलाके का बड़ा रईस और रसूखदार व्यक्ति समझा जाता था। लोगों की आर्थिक हैसियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जाता था कि किसके यहां यह मशहूर मंडली नाचने पहुंची है।
उस समय शादी की तारीख तय करने में भी नाच की उपलब्धता का ध्यान रखा जाता था। जिस दिन मंडली का सट्टा यानी कार्यक्रम पहले से तय नहीं होता, उसी तारीख को तिलक और विवाह का आयोजन रखने की कोशिश की जाती थी। यह बात बिजली रानी ने पिछले दिनों बातचीत के दौरान बताई थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी कलाकार की लोकप्रियता केवल मंच तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने गांवों के सामाजिक जीवन और उत्सवों की तारीखों तक को प्रभावित किया था।
उस दौर की नाच मंडली का आकार भी छोटा-मोटा नहीं था। कभी करीब 108 सदस्यों वाली मंडली का जिक्र होता था, तो बिजली रानी ने अपने एक दौर के समूह के बारे में लगभग 24 कलाकारों की बात बताई थी। अलग-अलग समय और प्रस्तुतियों में मंडली की संरचना बदलती रही। इसमें महिलाएं, लड़कियां, पुरुष नर्तक और दूसरे कलाकार शामिल होते थे। साज-बाज बजाने वाले कलाकार अलग रहते थे। जरूरत और मांग के मुताबिक मंडली के हिस्से भी अलग-अलग कार्यक्रमों में जाते थे। एक ही दिन दो जगह कार्यक्रम होने पर पूरी टीम को बांटकर प्रस्तुतियां दी जाती थीं।
इस विशाल आयोजन को संभालना आसान नहीं था। कलाकारों का आना-जाना, रहने-खाने की व्यवस्था, वाद्य यंत्र, साज-सज्जा और कई दिनों तक चलने वाले कार्यक्रम का खर्च उठाना हर किसी के बूते की बात नहीं थी। यही कारण था कि चांद-बिजली का नाच कराने वाले व्यक्ति की प्रतिष्ठा दूर-दूर तक फैल जाती थी।
**लबार की ठिठोली, लोकगीतों की मिठास और रात भर सजने वाला मंच**
भोजपुरी के पारंपरिक नाच में केवल नृत्य ही नहीं होता था। गीत, संगीत, अभिनय, हास्य और स्थानीय जीवन की झलक मिलकर एक ऐसी प्रस्तुति तैयार करते थे, जिसमें दर्शक पूरी रात डूबे रहते थे। भोजपुरिया समाज में हास्य कलाकारों को ‘लबार’ कहा जाता था। मंडली में लबार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती थी, क्योंकि उनकी ठिठोली, संवाद और हाजिरजवाबी दर्शकों को बांधे रखती थी। बिजली रानी की मंडली से जुड़े श्री भगवान शर्मा बाद में काफी चर्चित हुए।
विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों की भी अपनी अलग परंपरा थी। सेहरा, नजराना और शुक्रिया जैसे गीत खास मौकों के लिए होते थे। इन गीतों में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि रिश्तों की गरिमा, पारिवारिक भावनाएं, सामाजिक व्यवहार और लोकजीवन की सहज अभिव्यक्ति दिखाई देती थी। कलाकार नाचने के साथ-साथ गाते भी थे। इसीलिए उनका कार्यक्रम किसी एक विधा तक सीमित नहीं था, बल्कि भोजपुरी लोकसंस्कृति का चलता-फिरता मंच था।
उस समय बारातें तीन-तीन दिनों तक ठहरती थीं। बारात के साथ नाच का कार्यक्रम भी कई रातों तक चलता था। बाद में यह परंपरा दो दिनों तक सिमटने लगी। गांव से कुछ दूरी पर बारात का ठहराव होता था। आज की तरह भव्य मंच, एलईडी स्क्रीन और आधुनिक लाइटें नहीं थीं। चौकियों को जोड़कर मंच तैयार कर दिया जाता था और रोशनी के लिए पेट्रोमैक्स जलाए जाते थे। उसी रोशनी में कलाकारों की अदाएं, गीतों की गूंज और दर्शकों की तालियां पूरी रात गांव के वातावरण को जीवंत बनाए रखती थीं।
रोहतास, कैमूर, सासाराम, औरंगाबाद, आरा और बक्सर से लेकर बिहार के दूसरे भोजपुरी भाषी इलाकों तक चांद-बिजली के नाच की मांग थी। उत्तर प्रदेश से लेकर नेपाल तक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। जहां भी मंडली पहुंचती, वहां कलाकारों के आने को खास आयोजन माना जाता था। बिजली रानी के मुताबिक, उस दौर में कलाकारों को सम्मान, पारिश्रमिक और सामाजिक प्रतिष्ठा तीनों मिलते थे। मेजबान की जिम्मेदारी होती थी कि कलाकारों के साथ किसी तरह की अभद्रता न हो और उनका सम्मान बना रहे।

**जब कैसेट और वीडियो ने गांवों की चौपाल से दुनिया तक पहुंचाया नाम**
बिजली रानी और चांद की लोकप्रियता केवल गांवों के आयोजनों तक सीमित नहीं रही। बाद के दौर में टी-सीरीज जैसी कंपनियों ने उनके कार्यक्रमों को रिकॉर्ड किया और वीडियो के माध्यम से उनकी कला को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। जो कलाकार कभी गांवों की चौपालों और शादी के पंडालों में अपनी प्रस्तुति देते थे, उनकी कला घरों में वीडियो देखने वाले लोगों तक पहुंचने लगी।
लेकिन लोकप्रियता के इस विस्तार के साथ लोकनाच की दुनिया में बदलाव भी तेज हो रहा था। धीरे-धीरे आर्केस्ट्रा का चलन बढ़ा। शादी-ब्याह के आयोजन छोटे होने लगे। तीन दिनों की बारात एक रात में सिमट गई। लोगों के पास घंटों बैठकर नाच देखने का समय कम होता गया। फिर मोबाइल और सोशल मीडिया का दौर आया, जिसमें मनोरंजन लोगों की हथेली तक पहुंच गया।
बिजली रानी इस बदलाव से दुखी थीं। उनका कहना था कि आर्केस्ट्रा के चलन ने पारंपरिक नाच को उजाड़ दिया। लोगों की रुचि और आयोजन की शैली बदलने से पुराने कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हुआ। जिनके कार्यक्रमों के लिए कभी महीनों पहले तारीख तय होती थी, वे कलाकार धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए। उनके शब्दों में, अब पहले जैसी बात नहीं रही; किसी तरह दाल-रोटी चल जाती है।
यह केवल बिजली रानी की पीड़ा नहीं थी। यह उस पूरी लोककला की व्यथा थी, जिसमें कलाकारों की कई पीढ़ियों ने अपना जीवन लगा दिया, लेकिन बदलते समय के साथ उन्हें वैसा सहारा और सम्मान नहीं मिल पाया।
**संघर्ष के अंतिम दिनों में पवन सिंह ने बढ़ाया मदद का हाथ**
जीवन के अंतिम दौर में बिजली रानी किडनी की बीमारी से जूझ रही थीं। बीमारी ने उनके लिए मुश्किलें बढ़ा दी थीं। ऐसे समय में भोजपुरी के पावर स्टार पवन सिंह ने मदद का हाथ बढ़ाया। उन्होंने बिजली रानी को लखनऊ बुलाकर इलाज की व्यवस्था कराई और 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता भी दी। यह मदद उस कलाकार के प्रति सम्मान का एक भावनात्मक उदाहरण थी, जिसने अपने समय में भोजपुरी लोकमंच को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
बिजली रानी के संघर्ष और जीवन यात्रा पर हिंदी फिल्म निर्माता साधना सिंह ने ‘बिजली रानी: द अनटोल्ड स्टोरी’ नाम से फिल्म भी बनाई। उनके जीवन की कहानी केवल एक कलाकार की सफलता और संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक बदलाव का दस्तावेज भी है, जिसमें लोककला के मंच बदले, दर्शकों की पसंद बदली और कलाकारों की दुनिया धीरे-धीरे सिकुड़ती चली गई।
**बिजली रानी के साथ क्या सचमुच एक पूरा दौर चला गया?**
आज बिजली रानी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत, उनकी प्रस्तुतियां और चांद-बिजली के नाच की स्मृतियां आज भी उन लोगों के मन में जीवित हैं, जिन्होंने उस दौर को अपनी आंखों से देखा था। यह याद करना जरूरी है कि भोजपुरी संस्कृति केवल फिल्मों, चमकते सितारों और आधुनिक संगीत तक सीमित नहीं है। उसकी जड़ें गांवों के लोकगीतों, विवाह की रस्मों, चौपालों, पारंपरिक नाच और उन कलाकारों में भी हैं, जिन्होंने सीमित साधनों के बावजूद लाखों लोगों का मनोरंजन किया।
कभी चांद-बिजली का नाच करवाना अमीरी की पहचान था। आज उसी परंपरा को याद करना हमारी सांस्कृतिक स्मृति को बचाए रखने की जरूरत बन गया है। वक्त बदलता है, मनोरंजन के साधन बदलते हैं और कलाकारों की जगह नए चेहरे लेते हैं, लेकिन लोककला के इतिहास को भुला देना किसी समाज के लिए आसान नहीं होना चाहिए।
हाथ में रुमाल लेकर गाल पोंछने वाले उस गीत से शुरू हुआ बिजली रानी का परिचय आखिरकार एक ऐसी कहानी में बदल गया, जिसमें शोहरत भी है, संघर्ष भी; लोकजीवन की मिठास भी है और बदलते समय की कसक भी।
**अलविदा बिजली रानी!**
आपके जाने से केवल एक कलाकार की कमी नहीं हुई। भोजपुरी लोकमंच की उस परंपरा की एक जीवंत आवाज खामोश हो गई, जिसने कई दशकों तक शाहाबाद से सारण और चंपारण तक लोगों के दिलों पर राज किया। अब चांद-बिजली के नाच की रातें इतिहास की यादों में बसेंगी, लेकिन उनकी गूंज उन गांवों में लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी, जहां कभी पेट्रोमैक्स की रोशनी में पूरी रात लोकगीतों और ठिठोली से महफिल सजती थी।
अनूप_नारायण_सिंह फेसबुक वाल से

