सत्ता के लिए एहसान, सवाल उठे तो निष्कासन!
बिहार की राजनीति में वफादारी का पैमाना क्या है नेता का योगदान या नेतृत्व की सुविधा?
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता, संगठन और राजनीतिक वफादारी के बीच का अंतर धुंधला नजर आने लगा है। मोकामा विधायक अनंत सिंह को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से छह साल के लिए निष्कासित किए जाने और उसके बाद उनके तीखे बयानों ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। अनंत सिंह का दावा है कि उन्होंने 2024 में विश्वास मत के दौरान नीतीश कुमार की सरकार को बचाने में भूमिका निभाई थी। आज वही अनंत सिंह नेतृत्व को एहसान याद दिला रहे हैं और कह रहे हैं कि पार्टी में अब न्याय करने वाला कोई नहीं बचा। सवाल है कि बिहार की राजनीति आखिर किस दिशा में जा रही है?
राजनीति में कोई भी समर्थन स्थायी एहसान नहीं होता और न ही किसी नेता का योगदान उसे अनुशासन से ऊपर कर सकता है। लेकिन यही सिद्धांत राजनीतिक दलों के नेतृत्व पर भी लागू होता है। यदि पार्टी अपने विधायक के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो उसे बताना चाहिए कि कार्रवाई किन तथ्यों और नियमों के आधार पर हुई। क्या अनंत सिंह ने वास्तव में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ काम किया? क्या उन पर लगे आरोप प्रमाणित हैं? यदि हां, तो पार्टी को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। और यदि मामला केवल राजनीतिक मतभेद का है, तो क्या निष्कासन ही एकमात्र रास्ता था?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू अनंत सिंह का वह बयान है, जिसमें उन्होंने पार्टी के लिए गद्दारी तक करने की बात कही। यह शब्द अपने आप में कई सवाल पैदा करता है। आखिर किसके साथ गद्दारी और किसके हित में? क्या यह महज राजनीतिक आक्रोश में कही गई बात है या सत्ता के भीतर ऐसे समीकरण रहे हैं, जिनका खुलासा जनता के सामने होना चाहिए? इन सवालों का जवाब किसी अनुमान से नहीं, बल्कि तथ्यों से मिलना चाहिए।
दूसरी ओर, अनंत सिंह को भी समझना होगा कि लोकतंत्र में सरकार बचाने या किसी राजनीतिक दल का समर्थन करने का अर्थ किसी पर व्यक्तिगत एहसान करना नहीं है। विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं। उनका पहला दायित्व जनता के प्रति है, न कि किसी नेता के प्रति। यदि राजनीतिक फैसलों को एहसान और बदले की भाषा में समझा जाएगा, तो जनहित पीछे छूट जाएगा और सत्ता का खेल ही राजनीति का केंद्र बन जाएगा।
जदयू के सामने भी अपनी निष्पक्षता साबित करने की चुनौती है। पार्टी अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन का अर्थ नेतृत्व के हर फैसले पर सवाल न उठाना नहीं हो सकता। यदि नियम तोड़ने पर कार्रवाई होती है, तो वही नियम सभी नेताओं पर समान रूप से लागू होने चाहिए। राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता इसी से तय होती है कि वे अपने प्रभावशाली नेताओं और सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए एक जैसी कसौटी अपनाते हैं या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल नीतीश कुमार और जदयू नेतृत्व से है क्या पार्टी में फैसले सिद्धांतों के आधार पर होते हैं या राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से? यदि अनंत सिंह गलत हैं, तो उनके दावों का तथ्यात्मक जवाब दिया जाए। यदि पार्टी की कार्रवाई उचित है, तो उसके आधार सार्वजनिक किए जाएं। केवल निष्कासन का आदेश जारी कर देने से राजनीतिक सवाल खत्म नहीं हो जाते।
बिहार की जनता को नेताओं के बीच एहसान गिनने की राजनीति नहीं, जवाबदेही की राजनीति चाहिए। सत्ता बचाने के लिए साथ खड़े होने वाले नेता हों या संगठन के नाम पर कार्रवाई करने वाला नेतृत्व—दोनों को अपनी भूमिका का हिसाब देना होगा। आखिर लोकतंत्र में न कोई नेता जनता से बड़ा है, न कोई पार्टी सवालों से ऊपर।
अनंत सिंह का निष्कासन एक राजनीतिक कार्रवाई हो सकती है, लेकिन उससे उठे सवालों का निष्कासन संभव नहीं। बिहार को यह जानना ही होगा कि राजनीति में वफादारी का अर्थ जनसेवा है या सत्ता के वक्त साथ देने और वक्त बदलते ही किनारे कर दिए जाने का खेल।

