पाठ
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पाठशाला में अब कहाँ पढ़ाई,
नाटकघर में नाटक छाए,
ब्लैकबोर्ड पर धूल जमी है,
गिनती-पहाड़े सब भरमाए।
बेंचों में अब घुन लग बैठे,
किताबों को कीड़े खाते,
मोबाइल हाथों में आते ही
माँ के डाँटों के बादल छाते।
क्या करें भाई, सब भूल गए,
ए प्लस बी का वर्ग विचार,
व्हाट्सऐप और फेसबुक पर ही
मैसेजों की लगती आग।
परीक्षा अब ऑनलाइन होती,
नकल से सब होते पास,
नौकरी तो सात समंदर,
प्रश्नपत्र होते उजागर खास।
कोर्टों में बस तारीखें चलतीं,
सब भ्रम में डूबे रहते,
कोई न जाने सच की बातें,
बंद लिफाफों में राज बहते।
टकुस-टुकुस, खुटुस-खाटुस,
कवि की अपनी वर्णमाला,
वर्षांत आते ही कवियों को
सब जपते जैसे माला।
स्कूल-कॉलेज बंद ही रहें तो,
चल पड़े ग्रीष्म अवकाश,
पहाड़ों-विदेशों की यात्रा करके
लौटे फिर से पौष मास।।
लेखिका: वर्णली खारा

