प्रेरणा के एक उज्ज्वल नक्षत्र: राजशेखर व्यास जी के साथ एक स्मरणीय दोपहर
राजशेखर व्यास— यह केवल एक नाम नहीं है, बल्कि वे भारतीय साहित्य, पत्रकारिता और प्रसारण जगत के एक देदीप्यमान नक्षत्र हैं। उनका व्यक्तित्व एक बहुमुखी प्रतिभा का धनी है, जहाँ वे एक प्रतिष्ठित लेखक, दूरदर्शी संपादक, सफल निर्माता-निर्देशक और बहुभाषाविद विद्वान के रूप में समादृत हैं। उनकी अद्वितीय रचनात्मकता और दूरदृष्टि ने उन्हें भारतीय संस्कृति और मीडिया परिदृश्य में एक अमिट पहचान दिलाई है। वर्ष 1992 में ‘भारतीय प्रसारण सेवा’ (Indian Information Service – IIS) के लिए चयनित राजशेखर व्यास जी ने बाद में दूरदर्शन निदेशालय के अतिरिक्त महानिदेशक (Additional Director General) के रूप में कार्यभार संभाला। दिल्ली दूरदर्शन केंद्र के निदेशक के रूप में अपना करियर शुरू करके इस उच्च पद पर पहुँचने वाले, विख्यात साहित्यकार कमलेश्वर जी के बाद वे दूसरे ऐसे व्यक्ति हैं जो साहित्य जगत से जुड़े होने के बावजूद प्रसारण के सर्वोच्च प्रशासनिक पदों में से एक पर आसीन हुए। उनका यह सफर भारतीय प्रसारण के इतिहास में एक मील का पत्थर है।
राजशेखर व्यास: करियर की ऊँचाइयाँ और साहित्यिक योगदान
राजशेखर व्यास जी का करियर न केवल विस्तृत है, बल्कि उपलब्धियों से भरा पड़ा है। उन्होंने भारतीय प्रसारण सेवा में रहते हुए दूरदर्शन को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया और अपनी प्रशासनिक क्षमता तथा रचनात्मकता का अनूठा प्रदर्शन किया। लगभग 70 पुस्तकों के रचयिता राजशेखर व्यास जी के चार हजार से भी अधिक लेख देश-विदेश के अग्रणी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, जो उनके गहन चिंतन और लेखन शैली का प्रमाण है। इसके अतिरिक्त, उनके द्वारा निर्मित दो सौ से अधिक वृत्तचित्र (Documentaries), कार्यक्रम और फीचर फिल्में दूरदर्शन पर प्रसारित हुई हैं, जिन्होंने लाखों दर्शकों को शिक्षित और मनोरंजन किया है। विशेष रूप से उनके जन्मस्थान उज्जैन की पृष्ठभूमि पर निर्मित तीन महत्वपूर्ण वृत्तचित्र— "जय जय उज्जयिनी" , "काल" और "द टाइम" उनकी निर्देशन शैली के अनूठे उदाहरण हैं, जो ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक पहलुओं को बड़ी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं। सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उद्देश्य से उन्होंने फ्रांस, यूरोप, मलेशिया, सिंगापुर, अमेरिका, नॉर्वे, सोवियत रूस और चीन आदि विभिन्न देशों की यात्राएँ की हैं, जहाँ उन्होंने भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया और विश्व भर की संस्कृतियों से संवाद स्थापित किया। उनके कार्यकाल में दूरदर्शन ने अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं, जिनकी विस्तृत जानकारी आप विकिपीडिया पर दूरदर्शन के बारे में पढ़ सकते हैं।
संस्मरण की अनूठी विधा और राजशेखर व्यास की साहित्यिक कृतियाँ
आज के इस एस.एम.एस., मोबाइल इंटरनेट और ईमेल के तीव्र युग में लोगों के बीच की आत्मीयता, प्रेम और घनिष्ठता जैसे कहीं खोती जा रही है। ऐसे एक यांत्रिक समय में दूसरों के गुण, यश या संबंधों को प्रेम से हृदय में समेटकर संस्मरण लिखना अत्यंत दुर्लभ है। परंतु इस कठिन कार्य को भी राजशेखर व्यास जी ने अत्यंत निपुणता के साथ कर दिखाया है। उनके संस्मरण न केवल घटनाओं का ब्यौरा देते हैं, बल्कि उनमें भावनाओं की गहराई और मानवीय संबंधों की सूक्ष्मता भी झलकती है।
- यादें (Yadein): अपने पूज्य पिता, पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास पर लिखी गई उनकी यह पहली संस्मरण पुस्तक पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुई थी। यह पुस्तक पिता-पुत्र के संबंधों की मधुरता और एक महान व्यक्तित्व के जीवन की झलक प्रस्तुत करती है।
- याद आती है (Yaad Aati Hai): उनके इस दूसरे संस्मरण को भी साहित्य जगत में प्रचुर सराहना मिली। यह कृति भी विभिन्न स्मृतियों और महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ उनके अनुभवों का एक संग्रह है।
पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास जी के पुत्र होने के नाते उन्हें बचपन से ही डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, भगवतशरण उपाध्याय और श्री वाकणकर जैसे मनीषियों का स्नेह और सानिध्य प्राप्त हुआ था। इन शुरुआती अनुभवों ने उनके साहित्यिक संस्कारों को गहरा किया और उन्हें मानवीय संबंधों की बारीक समझ दी। आप हमारे अन्य लेखों में भारतीय साहित्य के योगदान के बारे में अधिक पढ़ सकते हैं।
महान विभूतियों का सानिध्य: राजशेखर व्यास के प्रेरणास्त्रोत
अपने जीवनकाल में राजशेखर व्यास जी ने अनेक राजनीतिक, सांस्कृतिक और कला जगत की महान विभूतियों का अत्यंत करीबी सानिध्य प्राप्त किया। इनमें डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. शंकर दयाल शर्मा, प्रतिभा पाटिल, माधवराव सिंधिया, अशोक सिंघल, रज्जू भैया, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, कवि नीरज और ओशो जैसे विचारकों व नेताओं से लेकर ए. के. हंगल, बासु चटर्जी, एन. चंद्रा, परीक्षित साहनी और अरुण गोविल जैसे सिनेमा जगत के दिग्गज व्यक्तित्व शामिल हैं। इन सभी अनुभवों ने उनकी कहानियों और संस्मरणों को असाधारण रूप से समृद्ध और अत्यंत लोकप्रिय बना दिया है। इन महान आत्माओं के साथ उनकी बातचीत, उनके जीवन के किस्से और उनके विचारों ने राजशेखर व्यास के लेखन को एक विशेष गहराई और विश्वसनीयता प्रदान की।
व्यक्तिगत भेंट: एक अविस्मरणीय अनुभव
हाल ही में दिल्ली के सिविल सर्विसेज ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट यानी "C S O I" (Civil Services Officers’ Institute) क्लब में मुझे इस बहुभाषाविद, प्रख्यात विद्वान और गुणी व्यक्तित्व से मिलने का एक स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ उन्होंने मेरा अत्यंत भावभीना स्वागत किया और आत्मीय आतिथ्य प्रदान किया, जिससे मुझे तुरंत ही एक गहरे संबंध का अनुभव हुआ। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने अपने कर-कमलों से लिखित अपनी अमूल्य पुस्तक "छोटी-छोटी यादें" (Chhoti-Chhoti Yaadein) मुझे उपहार स्वरूप भेंट की, जो मेरे लिए एक अनमोल स्मृति बन गई है। उनके जैसे एक विरल प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के साथ साहित्य और समाज के विभिन्न पहलुओं पर दीर्घकाल तक संवाद करने का अवसर पाकर मैं सचमुच अत्यंत आनंदित, धन्य और अभिभूत हूँ। यह बातचीत मेरे जीवन के उन क्षणों में से एक है जिसे मैं कभी भूल नहीं पाऊँगा।
इस महान व्यक्तित्व के साथ हुई यह अंतरंग बातचीत और उनकी सुदीर्घ साहित्य साधना मेरे भविष्य के जीवन के लिए और साहित्य सृजन के मार्ग में एक शाश्वत प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। राजशेखर व्यास जी का जीवन और उनका कार्य हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार एक व्यक्ति अपने ज्ञान, कला और मानवीय संबंधों के माध्यम से समाज पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
मूल लेखिका: मनीषा शर्मा
अनुवादक: रितेश शर्मा
पता: जलुकबाड़ी, गुवाहाटी


