जब सूंड में फँसी अबोध बच्चे की लाश भी सिस्टम को नहीं झकझोर पातीं
क्यों नहीं सरकार से प्रश्न पूछे जाने चाहिए!
राष्ट्र संवाद संवाददाता मृत्युंजय बर्मन
उस अभागी माँ की मनोदशा की कल्पना कीजिए, जिसने नौ महीने तक अपने बच्चे को कोख में रखा, सपनों के पालने में झुलाया, असहनीय पीड़ा सहकर उसे इस दुनिया में लायी और आज वही माँ अपने बच्चे के मांस का लोथड़ा एक जंगली हाथी की सूंड में फँसा हुआ देख रही है। यह दृश्य किसी पत्थरदिल जल्लाद को भी झकझोर दे। साहब, आप तो सरकार हैं। आपकी संवेदना कहाँ है?
पश्चिमी सिंहभूम की यह घटना अखबार की सुर्खी बनकर किसी लोहे की अलमारी में फाइल के रूप में सज चुकी होगी। मगर सवाल जिंदा हैं। और सवाल पूछे जाएंगे। क्योंकि जब तक आप इस त्रासदी को अपनी आपबीती समझकर महसूस नहीं करेंगे, जब तक आपकी खुली आँखों में यह दृश्य तैरता नहीं रहेगा, तब तक आपको अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व का बोध कैसे होगा? वरना अगली सुर्खी के लिए तैयार रहिए, अगली लाश, अगला मुआवजा और वही घिसा-पिटा बयान।
सरकार जी, अब मुआवजे और क्षतिपूर्ति की चौखट से बाहर निकलने का वक्त है। इंसानी जान को हजार–लाख रुपये के तराजू पर तौलने की परंपरा को दफन कीजिए। ‘वन टाइम सेटलमेंट’ को अपनी कर्तव्यहीनता का कवच बनाना बंद कीजिए। आंकड़े गवाही देते हैं कि वर्ष 2016 से 2020 के बीच देश में करीब 30,341 घटनाओं में जंगली जानवरों, खासतौर पर हाथियों ने फसल, घर, अनाज और मवेशियों को भारी नुकसान पहुँचाया। राज्यों ने मुआवजे के तौर पर रुपये बांटे, लेकिन यह भुगतान न तो वास्तविक नुकसान की भरपाई कर सका और न ही पीड़ितों को सुरक्षा का भरोसा दे पाया। क्षति दर आज भी वर्षों पुरानी हैं। सबसे दुखद यह कि मुआवजा देकर सरकार पल्ला झाड़ लेती है, पीड़ित परिवारों की सुध लेने कोई दोबारा नहीं लौटता।
इसलिए सरकार जी, एसी कमरों से बाहर निकलिए। उन गांवों की गलियों और पगडंडियों की खाक छानिए, जहां आज भी हाथियों और जंगली जानवरों के ताजे पांवों के निशान मौजूद होंगे। ज़ीरो ग्राउंड पर उन बेबस ग्रामीणों का दर्द समझिए, जो आपको अपना रहनुमा मानकर पूरे परिवार की जिंदगी दांव पर लगाए बैठे हैं। याद रखिए, इन्हीं लोगों के टैक्स से आपकी कुर्सी चलती है, आपके ठाठ-बाठ पलते हैं। पीड़ितों के आंसुओं की कीमत समझिए सरकार जी।
यह भी सवाल उठना चाहिए कि आखिर झारखंड में हाथी व मानव संघर्ष के मूल कारण आपके नीति-पत्रों से बाहर क्यों हैं? हाथियों के आवास में कमी, खंडित जंगल, अंधाधुंध खनन, सड़क और रेलवे विस्तार, औद्योगिक गतिविधियां, पारंपरिक हाथी गलियारों का विनाश, भोजन और पानी की कमी, बांस जैसी प्रमुख प्रजातियों का खत्म होना, ये सब वजहें हाथियों को इंसानी बस्तियों की ओर धकेल रही हैं। फिर टकराव बढ़ रहा है, लाशें गिर रही हैं। क्या यह सब आपके ब्लू प्रिंट का हिस्सा नहीं होना चाहिए?
विडंबना यह है कि वर्ष 2023 की रिपोर्ट में भारत और झारखंड सरकार तथा विशेषज्ञ समूहों ने हाथियों के आवागमन के लिए सुरक्षित कॉरिडोर की पहचान भी कर ली थी। झारखंड में कुल 17 हाथी गलियारों को चिह्नित किया गया था। दलमा–आसनबनी, दलमा–चांडिल, इचागढ़, पश्चिमी सिंहभूम, घाटकुरी–लातेहार जैसे प्रमुख कॉरिडोर, जो हाथियों को उनके पारंपरिक रास्तों पर लौटने में मदद कर सकते हैं। खोखरो, टोंकीसूद, घाटशिला, मुसाबनी, खेलारसाई जैसे कई ग्रामीण इलाके इन्हीं गलियारों के आसपास आते हैं। फिर सवाल यह है कि ये कॉरिडोर आखिर फाइलों में कब तक दबे रहेंगे? इन्हें जमीन पर उतारने की हिम्मत और इच्छाशक्ति कब दिखेगी?
सरकार और वन विभाग को यह समझना होगा कि यह लड़ाई हाथी बनाम इंसान की नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन बनाम संवेदनहीन व्यवस्था की है। जब तक नीति, नियोजन और जमीनी क्रियान्वयन एक साथ नहीं चलेंगे, तब तक न हाथी बचेंगे, न इंसान। और तब इतिहास यही लिखेगा कि जब सूंड में फँसी लाशें भी सिस्टम को नहीं जगा सकीं, तब सत्ता की नींद शायद बहुत गहरी हो चुकी थी।

