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    हुलास के भव्य कवि-सम्मेलन में गूंजे संवेदना, व्यंग्य और जीवन-दर्शन के स्वर

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarMay 17, 2026No Comments3 Mins Read
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    हुलास के भव्य कवि-सम्मेलन में गूंजे संवेदना, व्यंग्य और जीवन-दर्शन के स्वर

    राष्ट्र संवाद संवाददाता
    हुलास द्वारा रविवार को कदमा, जमशेदपुर में आयोजित भव्य “कवि-सम्मेलन” साहित्यिक ऊर्जा, संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से सराबोर रहा। तपती एवं उमस भरी गर्मी के बीच आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम ने कविता की शीतलता से उपस्थित साहित्य-प्रेमियों को भाव-विभोर कर दिया।
    कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की वंदना से हुआ, जिसकी भावपूर्ण प्रस्तुति विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’ ने दी। संस्था का परिचय पूर्व अध्यक्ष धनपत चावला ने प्रस्तुत किया, जबकि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्यामल सुमन ने की।
    कवि-सम्मेलन में हरिकिशन चावला, श्यामल सुमन, विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’, दीपक वर्मा ‘दीप’, जय प्रकाश पाण्डेय, धनपत चावला तथा अजय मुस्कान ने अपनी प्रभावशाली रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में हास्य, व्यंग्य, संवेदना, दर्शन और सामाजिक यथार्थ के विविध रंग देखने को मिले।
    कवि अजय मुस्कान की पंक्तियाँ—
    “अब कौन किसे देख मुस्कुराता है,
    देखे..! मुझे देख कौन मुस्कुराता है!!”
    ने बदलते सामाजिक रिश्तों और संवेदनहीनता पर मार्मिक टिप्पणी की।
    वहीं जय प्रकाश पाण्डेय ने अपनी भावपूर्ण रचना—
    “मेरी वो मधुर व्यथाएँ, मन भूल गया है जिनको,
    हैं आज कसकती उर में, बेचैन कर रही मुझको।”
    के माध्यम से स्मृतियों और भावनाओं की गहराई को स्वर दिया।
    दीपक वर्मा ‘दीप’ ने हास्य-व्यंग्य की प्रस्तुति से माहौल को हल्का और आनंदमय बना दिया। उनकी पंक्तियाँ—
    “मेरे घर के सामने है, एक बरगद का पेड़,
    जब बीवी नहीं सुनती मेरी रचनाएँ,
    तो मैं उसे सुना आता हूँ
    अपने गीत, ग़ज़ल और शेर।”
    पर श्रोताओं ने जमकर ठहाके लगाए।
    विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’ ने जीवन संघर्ष और जिजीविषा को अपनी पंक्तियों—
    “जिन्दगी के ग़म सभी सहते रहे,
    रो नहीं सकते थे, तो हँसते रहे।”
    के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
    पूर्व अध्यक्ष धनपत चावला ने सामाजिक यथार्थ और झूठ की राजनीति पर तीखा प्रहार करते हुए कहा—
    “हद से गुजर जाता है जब कोई ‘झूठ’,
    नाकाम हो जाती है ‘गोएबल्स तकनीक’।
    ‘झूठ’ को ‘सच’ में नहीं बदल पाती है,
    चाहे लाखों बार दोहराया जाए वो झूठ।”
    उनकी इन पंक्तियों ने उपस्थित श्रोताओं को गहन चिंतन के लिए प्रेरित किया।
    अध्यक्षीय संबोधन में श्यामल सुमन ने साहित्य को समाज की आत्मा बताते हुए कहा कि कविता मनुष्य की संवेदनाओं को जीवित रखने का सबसे सशक्त माध्यम है। उनकी पंक्तियाँ—
    “हो पूनम का चाँद या, जीवन में हो प्यार,
    पूर्ण हुआ घटने लगा, ऐसा क्यों करतार??”
    ने श्रोताओं के मन में दार्शनिक भाव जगा दिए।
    कार्यक्रम का सफल संचालन जय प्रकाश पाण्डेय ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन दीपक वर्मा ‘दीप’ ने प्रस्तुत किया। साहित्य-प्रेमियों और सुधी श्रोताओं की गरिमामयी उपस्थिति ने पूरे आयोजन को आत्मीय, सफल और यादगार बना दिया। यह आयोजन शहर की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला सिद्ध हुआ।

    व्यंग्य और जीवन-दर्शन के स्वर हुलास के भव्य कवि-सम्मेलन में गूंजे संवेदना
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