दृष्टिबाधित युवाओं का साहसिक अभियान
जमशेदपुर/पश्चिमी सिंहभूम: दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के बल पर दो दृष्टिबाधित युवाओं ने वह कर दिखाया, जिसे सामान्य परिस्थितियों में भी कठिन माना जाता है। पश्चिमी सिंहभूम के शेखर और धीरोज ने लद्दाख के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में आयोजित पर्वतारोहण अभियान में हिस्सा लेकर साहस और संकल्प की नई मिसाल पेश की है।
25 अगस्त से शुरू हुआ यह अभियान 31 अगस्त 2026 को सफलतापूर्वक पूरा हुआ। अभियान के दौरान दोनों पर्वतारोहियों ने कठिन मौसम, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और ऊंचाई से जुड़ी चुनौतियों का सामना किया। हालांकि यात्रा के दौरान धीरोज की तबीयत बिगड़ गई, जिसके कारण उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में ही रुकना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अभियान का हिस्सा बने रहे।
वहीं शेखर ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपनी चढ़ाई जारी रखी और 20 हजार फीट से अधिक ऊंची जो-जोंगो चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। उनकी यह उपलब्धि न केवल व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि दिव्यांगजनों की क्षमताओं और संभावनाओं का भी सशक्त उदाहरण है।
दोनों युवाओं का यह सफर केवल पर्वतारोहण तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने वर्षों की मेहनत से ब्रेल सीखने, स्वतंत्र रूप से यात्रा करने, तकनीक का उपयोग करने, खेल गतिविधियों में भाग लेने और नेतृत्व क्षमता विकसित करने जैसी कई चुनौतियों को पार किया है। यही आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास उन्हें हिमालय की ऊंचाइयों तक ले गया।
यह अभियान ‘सबल’ संस्था के समावेशी प्रयासों का भी परिणाम है, जो दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 के तहत मान्यता प्राप्त विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं वाले लोगों के सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रही है। संस्था प्रशिक्षण, जागरूकता, क्षमता विकास और अधिकारों तक पहुंच सुनिश्चित करने के माध्यम से दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
शेखर और धीरोज की उपलब्धि यह संदेश देती है कि यदि अवसर, समर्थन और दृढ़ संकल्प साथ हों तो कोई भी बाधा सफलता की राह नहीं रोक सकती। उनका यह सफर देशभर के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है।

इस अभियान की सफलता ने समाज में एक नई चेतना जगाई है। दिव्यांगजनों के प्रति प्रचलित रूढ़िवादी सोच को चुनौती देते हुए शेखर और धीरोज ने साबित किया कि शारीरिक सीमाएं मानसिक दृढ़ता के आगे बौनी पड़ जाती हैं। उनकी यह यात्रा न केवल पर्वतारोहण के क्षेत्र में बल्कि सामाजिक समावेशन के लिए भी एक मील का पत्थर साबित होगी।
‘सबल’ संस्था के निदेशक ने बताया कि इस तरह के अभियान दिव्यांग युवाओं में आत्मविश्वास भरने के साथ-साथ समाज को उनकी क्षमताओं से परिचित कराने का सशक्त माध्यम हैं। संस्था भविष्य में ऐसे और भी समावेशी अभियान आयोजित करने की योजना बना रही है, जिसमें विभिन्न श्रेणियों के दिव्यांगजन हिस्सा ले सकें।
पर्वतारोहण जैसे जोखिम भरे खेल में दृष्टिबाधित व्यक्तियों की भागीदारी विश्व स्तर पर भी दुर्लभ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, शारीरिक गतिविधियों में दिव्यांगजनों की सहभागिता उनके समग्र कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह अभियान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का नाम रोशन करेगा।
शेखर और धीरोज की इस असाधारण उपलब्धि पर झारखंड सरकार ने भी प्रसन्नता व्यक्त की है। मुख्यमंत्री ने दोनों पर्वतारोहियों को सम्मानित करने की घोषणा की है। साथ ही, राज्य में दिव्यांगजनों के लिए साहसिक खेल सुविधाएं विकसित करने पर बल दिया गया है।
इस प्रेरणादायक कहानी के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- दृष्टिबाधित युवाओं ने लद्दाख की दुर्गम चोटियों पर चढ़ाई की।
- शेखर ने 20,000 फीट से अधिक ऊंची जो-जोंगो चोटी पर तिरंगा फहराया।
- धीरोज ने 16,732 फीट ऊंचे बेस कैंप तक यात्रा पूरी की।
- अभियान ‘सबल’ संस्था द्वारा आयोजित किया गया था।
- यह उपलब्धि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 के उद्देश्यों को साकार करती है।
आने वाले समय में यह उम्मीद की जाती है कि अधिक से अधिक दिव्यांग युवा साहसिक खेलों की ओर प्रेरित होंगे और अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करेंगे। शेखर और धीरोज की यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो जीवन की चुनौतियों से जूझ रहा है।


