लेखक: देवानंद सिंह
होर्मुज संकट ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी तनाव न केवल तेल की कीमतों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि सामरिक समीकरणों को भी बदल रहा है।
होर्मुज संकट और चीन की दूरगामी चाल
पश्चिम एशिया में युद्ध की लपटें जितनी तेज हो रही हैं, दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा उतनी ही असुरक्षित होती जा रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था आखिर कब तक कुछ चुनिंदा समुद्री मार्गों पर अपनी ऊर्जा निर्भरता बनाए रख सकती है। तेल और एलपीजी की आवाजाही में मामूली व्यवधान भी बाजार में कीमतों की बेचैनी बढ़ा देता है और उसका असर अंततः आम उपभोक्ता की जेब तक पहुंचता है।
चीन की रणनीतिक पहल: वैकल्पिक मार्गों का निर्माण
लेकिन इस पूरे संकट में एक दिलचस्प पहलू यह है कि जब अमेरिका और ईरान के बीच टकराव दुनिया का ध्यान होर्मुज पर केंद्रित कर रहा है, तब चीन अपनी रणनीतिक जमीन मजबूत करने में लगा है। बीजिंग का लक्ष्य केवल आज की ऊर्जा जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि आने वाले दशकों के लिए ऐसे वैकल्पिक व्यापार और परिवहन मार्ग तैयार करना है, जो उसे समुद्री रास्तों की अनिश्चितताओं से अपेक्षाकृत सुरक्षित रख सकें।
चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान रेलवे परियोजना
चीन-किर्गिस्तान-उज्बेकिस्तान रेलवे परियोजना को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। किर्गिस्तान खंड में पहली सुरंग का पूरा होना तकनीकी उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसके पीछे छिपा भू-राजनीतिक संदेश कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। चीन मध्य एशिया में रेल नेटवर्क के जरिए अपनी पहुंच बढ़ा रहा है और इस क्षेत्र को अपने व्यापारिक तथा रणनीतिक प्रभाव के दायरे में और मजबूती से जोड़ना चाहता है।
दीर्घकालीन योजना और बेल्ट एंड रोड
यह समझना जरूरी है कि चीन की ताकत केवल उसकी औद्योगिक क्षमता में नहीं, बल्कि लंबी अवधि की योजना बनाने और उसे लगातार जमीन पर उतारने की क्षमता में भी है। जब दुनिया किसी तत्काल संकट में उलझती है, चीन अक्सर उससे आगे की परिस्थितियों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करता दिखाई देता है। बेल्ट एंड रोड से लेकर रेल कॉरिडोर तक उसकी यही नीति नजर आती है।
होर्मुज संकट ने दी नई उपयोगिता
होर्मुज संकट ने इस रणनीति को नई उपयोगिता दे दी है। यदि समुद्री मार्ग किसी युद्ध, राजनीतिक टकराव या सुरक्षा संकट के कारण बाधित होते हैं तो वैकल्पिक स्थलीय संपर्क का महत्व बढ़ जाता है। चीन के लिए मध्य एशिया के रास्ते पश्चिम की ओर खुलता यह गलियारा केवल माल ढुलाई का रास्ता नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक पहुंच का माध्यम बन सकता है।
चुनौतियाँ और वास्तविकता
हालांकि यह कहना कि इस रेलवे के बन जाने से होर्मुज का काम पूरी तरह तमाम हो जाएगा, वास्तविकता को सरल बनाना होगा। तेल और एलपीजी की विशाल वैश्विक आवाजाही को समुद्र से रेल पर स्थानांतरित करना आसान नहीं है। क्षमता, लागत, दूरी, सुरक्षा और आधारभूत ढांचे जैसी कई चुनौतियां मौजूद रहेंगी। लेकिन रणनीतिक विकल्पों का निर्माण ही अपने आप में बड़ी शक्ति है। संकट के समय जिसके पास विकल्प अधिक होते हैं, उसकी सौदेबाजी की क्षमता भी अधिक होती है।
भारत के लिए गंभीर संदेश
यहीं भारत के लिए भी गंभीर संदेश है। भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और पश्चिम एशिया उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में किसी एक समुद्री मार्ग या किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में जोखिम पैदा कर सकती है। भारत को भी वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, रणनीतिक तेल भंडार, पाइपलाइन नेटवर्क और मध्य एशिया के साथ बेहतर कनेक्टिविटी पर लगातार ध्यान देना होगा।
आधुनिक शक्ति-संघर्ष के नए हथियार
आज का भू-राजनीतिक संघर्ष केवल मिसाइलों और युद्धपोतों से नहीं लड़ा जा रहा। रेलवे लाइन, बंदरगाह, पाइपलाइन, ऊर्जा समझौते और व्यापारिक गलियारे भी आधुनिक शक्ति-संघर्ष के हथियार बन चुके हैं।
चीन का संदेश: युद्ध नहीं, रास्ते बनाना
अमेरिका के लिए पश्चिम एशिया में सैन्य शक्ति का प्रदर्शन महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन चीन यह संदेश दे रहा है कि दीर्घकालीन प्रभाव केवल युद्ध जीतने से नहीं, बल्कि वैकल्पिक रास्ते बनाने से भी हासिल किया जाता है।
भविष्य की तैयारी
होर्मुज आज दुनिया की चिंता का केंद्र है। मगर चीन की नजर शायद उससे आगे है। वह उस दुनिया की तैयारी कर रहा है जहां ऊर्जा और व्यापार के लिए एक ही रास्ते पर निर्भर रहना कमजोरी माना जाएगा।
युद्ध का शोर भले ही आज ज्यादा सुनाई दे रहा हो, लेकिन भविष्य की असली बाजी उन देशों के हाथ में होगी जो संकट के बीच सड़क, रेल, ऊर्जा और व्यापार के नए रास्ते तैयार कर रहे हैं। चीन की मौजूदा पहल को इसी दूरगामी रणनीति के आईने में देखने की जरूरत है।
वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर अधिक जानकारी के लिए रॉयटर्स की रिपोर्ट पढ़ें।

