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    Home » विश्व दाल दिवस: घर-आंगन में बिखरती रहे दाल की खुशबू
    Breaking News Headlines धर्म संपादकीय संवाद विशेष

    विश्व दाल दिवस: घर-आंगन में बिखरती रहे दाल की खुशबू

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 10, 2026No Comments6 Mins Read
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    विश्व दाल दिवस
    विश्व दाल दिवस
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    विश्व दाल दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि दालों के पोषण, स्वाद और सांस्कृतिक महत्व को समझने का अवसर है, जो हमारे घर-आंगन और थाली से गहराई से जुड़ा है।

    प्रमोद दीक्षित मलय

    यही कोई दस साल पहले की बात होगी। मुझे सह-समन्वयक (हिंदी भाषा) के पद पर काम करते हुए तीन साल हो चुके थे। प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए मन में बहुत उत्साह था। लगभग प्रतिदिन ही किसी न किसी विद्यालय में जाना होता था। बच्चों, शिक्षकों, अभिभावकों, प्रबंध समिति के सदस्यों और गांव के आम निवासियों से विद्यालय विकास की बातचीत करता, सहयोग हेतु प्रेरित करता। परिणाम भी आने लगे थे, एक अच्छा शैक्षिक माहौल बन गया था। ये सब करते हुए कुछ ग्रामवासियों से स्नेह, मधुरता एवं आत्मीयता के स्वाभाविक सम्बन्ध भी विकसित हुए और शादी-विवाह एवं जन्म-मरण के अवसरों पर मेरी उपस्थिति होने लगी थी। सामाजिक रिश्ते की यह डोर भावना के रस से भींगी हुई थी। एक दिन शाम को एक गांव से फोन आया, “सर! कल आप स्कूल आ रहे हैं न। आपका भोजन हमारे साथ होगा। दाल, बाटी, चोखा, रायता रहेगा सर।” वह गांव के एक बुजुर्ग व्यक्ति थे और एक ही सांस में पूरी बात कह गये। मुझे हां कहना ही था। वह विद्यालय एक मजरे में आबादी के बाहर एक बगीचे के निकट स्थित प्राथमिक स्कूल था। वह बुजुर्ग व्यक्ति उसी बगीचे में सपरिवार रहते थे। विद्यालय के सहयोग हेतु सदैव तत्पर, वह एक संवेदनशील सहयोगी व्यक्ति थे।

    मैं जब विद्यालय पहुंचा तो वह वहीं उपस्थित थे। विद्यालय का संक्षिप्त कार्यक्रम पूरा कर अन्य शिक्षकों के साथ हम लोग बाग पहुंचे। वहां दो-तीन लोग भोजन की तैयारी में जुटे थे। उपलों की आग पर भुन रहे आलू-बैंगन की सोंधी महक ने मन मोह लिया। ईंटों के चूल्हे पर मिट्टी के घड़े में मिक्स दाल (अरहर, चना, मूंग, उड़द, मसूर) खदबदा रही थी, और एक आदमी करछुल से दाल का छाग बाहर करता जा रहा था। दाल पकने के बाद उसमें लाल साबुत मिर्च, जीरा, हींग, तेजपत्ता, डोंडा एवं लौंग को सरसों के तेल में तड़का कर छौंका लगाया गया, तो खुशबू पूरे बगीचे में फैल गयी और स्वाद मुंह में उतर आया। प्रेम पूर्वक भोजन कर हम विदा हुए।

    पाठक सोच रहे होंगे कि दाल विषयक लेख के आरम्भ में उपर्युक्त प्रसंग मैंने क्यों लिखा। दरअसल मैं बताना चाह रहा हूं कि दाल के बिना हमारा भोजन बेस्वाद, नीरस और अपूर्ण है। दाल ही है जो भोजन की थाली के सौंदर्य, स्वाद, संतुष्टि और पोषण-संतुलन को संभालती एवं वृद्धि करती है। दाल के बिना स्वस्थ शरीर की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि दालें मानव शरीर के लिए अत्यावश्यक प्रोटीन का उत्कृष्ट स्रोत एवं संसाधन हैं, साथ ही फाइबर, खनिज एवं विटामिन का भी। एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति के लिए प्रति किलोग्राम वजन हेतु 0.8 से 1.7 ग्राम प्रोटीन की जरूरत प्रतिदिन पड़ती है। मोटे तौर पर कहें तो न्यूनतम 50-60 ग्राम प्रोटीन प्रतिदिन आवश्यक है। प्रोटीन न केवल शरीर के विकास के लिए एक जरूरी तत्व है बल्कि वह देह के अंदरूनी अंगों की मरम्मत का काम भी करता है। एंजाइम एवं हार्मोन के उत्पादन में सहयोग, मांसपेशियों, त्वचा, हड्डी, बाल, नाखून आदि के साथ शरीर के ऊतकों का निर्माण करता है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सबल करता है। कार्बोहाइड्रेट की कमी हो जाने पर ऊर्जा की आपूर्ति एवं पोषक तत्वों के परिवहन में सहायक है। इतना ही नहीं, शरीर के पीएच मान के संतुलन को भी बनाये रखता है। कह सकते हैं कि प्रोटीन मानव शरीर का सुपर हीरो हैं और दालें सुपर फूड। इसीलिए दालों के महत्व से परिचित कराने, टिकाऊ खेती में दालों की भूमिका के बारे में जागरूकता का प्रसार करने तथा मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारने में दालों के योगदान से जन सामान्य को रू-ब-रू कराने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा प्रतिवर्ष 10 फरवरी को जागतिक आयोजन किया जाता है। उल्लेखनीय है कि खाद्य एवं खाद्य संगठन ने वर्ष 2016 में अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष मनाया था, और एक नारा दिया था – स्वस्थ आहार और ग्रह के लिए दलहन से प्यार करें। उस आयोजन से प्राप्त निष्कर्ष, प्रेरणा एवं ऊर्जा से खाद्य एवं कृषि संगठन की पहल पर दिसम्बर 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 फरवरी को विश्व दाल दिवस के रूप में मनाते हुए मानव शरीर, मिट्टी एवं पर्यावरण में दालों की योगदान से परिचित कराने हेतु घोषित किया था। तब पहला आयोजन 10 फरवरी, 2019 को किया गया। प्रत्येक वर्ष आयोजनों हेतु एक थीम निर्धारित की जाती है। वर्ष 2026 की थीम है- विश्व की दलहन : सादगी से उत्कृष्टता की ओर, जबकि वर्ष 2025 की थीम थी- दलहन : कृषि खाद्य प्रणालियों में विविधता लाना। थीम से आयोजनों को दिशा मिलती है और प्रेरणा भी।

    भारत दालों के उत्पादन में अग्रणी है। विश्व के कुल दाल उत्पादन में भारत का हिस्सा 25-30 प्रतिशत है। गतवर्ष भारत में 28 मीट्रिक टन दालों का उत्पादन हुआ। दाल उत्पादन में सिरमौर होने के बावजूद भारत विश्व का सबसे बड़ा दाल आयातक देश भी है, क्योंकि दाल के उपभोग में भी सर्वोपरि है। भारत में सर्वाधिक दाल उत्पादन के राज्य मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्रप्रदेश हैं। जबकि विश्व में भारत के बाद कनाडा, म्यांमार, चीन, आस्ट्रेलिया और रूस प्रमुख दाल उत्पादक देश हैं। विश्व के लगभग 170 देश कुल 9.6 मिलियन हेक्टेयर भूमि में विभिन्न प्रकार की दालें उगाते हैं।‌ खाद्य एवं कृषि संगठन ने चना, मसूर, अरहर, मूंग, उड़द, मटर, लोबिया, सेम प्रजाति की फलियों सहित 11 प्रकार की दालों को मान्यता दी है। चना को दालों का राजा तो मूंग को दालों की रानी कहा जाता है। भारत में कुल दाल उत्पादन में 40 प्रतिशत हिस्सा चना दाल का है। चना दाल का उपयोग भोजन के अलावा मिठाई, बेसन और नमकीन बनाने में किया जाता है। शादी-विवाह, तिथि-त्योहारों एवं शुभ अवसरों पर चने की दाल रांधने की परम्परा है। रोगियों के पथ्य के रूप में मूंग की दाल और उससे बनी खिचड़ी दी जाती है तथा मूंग की दाल का हलुवा और पराठे का स्वाद जीभ पर सालों बस रहता है तथा अदरक, मिर्च, धनिया पत्ती, लहसुन की टमाटर वाली चटनी के साथ जाड़ों में मुंगौड़े खाने का अलौकिक आनंद है। उड़द की दाल शक्तिवर्धक होती है, किंतु गरिष्ठ और बादी भी। लेकिन कुरकुरी-करारी स्वादिष्ट कचौड़ियां तो उड़द की दाल की ही बनती हैं और बड़े-भल्ले भी, और तब छुहारे, इमली, गुड़ की चटनी के साथ खाने वालों का पेट भर सकता है मन नहीं। अरहर की दाल दैनंदिन भोजन की थाली की शोभा है। इन दालों का अपना गुण-धर्म होता है, शरीर के लिए सुपाच्य, स्वादिष्ट एवं पोषक बनाने हेतु तड़का लगाना आवश्यक होता है जो हर दाल के लिए अलग-अलग होता है। अरहर की दाल में जीरा, मूंग में डोंडा और लौंग, उड़द में हींग और अदरक, मसूर में हींग और राई तथा चना में हींग का छौंक लगाने से स्वाद और सुगंध में वृद्धि होती है। प्याज, लहसुन, करी पत्ता, तेजपत्ता, साबुत लाल मिर्च, दही, टमाटर आदि डालकर अलग प्रकार से छौंक भी लगा सकते हैं। कल्पना से दालों के विभिन्न व्यंजन आज परोसे जा रहे हैं। मानव शरीर के लिए उपयोगी दाल की सुगंध हमारे घर-आंगन में बसी रहे, दालों का स्वाद मुंह में घुलता रहे, यही कामना है।

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