

उत्तर प्रदेश की सियासत में जनता के मुद्दे कहां गुम हैं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिसात अब तेजी से बिछने लगी है, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग अपने चरम पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समाजवादी पार्टी को इस राज्य के लिए श्राप बताते हुए उसके शासनकाल को दंगे, कर्फ्यू, अपराध और अराजकता का दौर करार दे रहे हैं। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से भाजपा पर वोट चोरी, चुनावी धांधली, चंदा चोरी और चढ़ावा चोरी जैसे बेहद गंभीर आरोप मढ़ रहे हैं। सियासत के इन दोनों बड़े ध्रुवों की भाषा भले ही अलग हो, लेकिन इन सबके निशाने पर केवल और केवल एक-दूसरे की राजनीतिक विश्वसनीयता ही है।
बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव केवल अतीत की गलतियां एक-दूसरे को गिनाने और वर्तमान पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने तक ही सीमित होकर रह जाएगा, या फिर राज्य की आम जनता के भविष्य को लेकर भी कोई गंभीर वैचारिक बहस होगी? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि सपा शासनकाल में उत्तर प्रदेश में अराजकता का माहौल था, पूरी तरह से राजनीतिक विमर्श से परे नहीं है। समाजवादी पार्टी के पिछले शासन के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर विपक्ष ने लगातार आक्रामक रुख अपनाया था। मुजफ्फरनगर दंगे, बढ़ते अपराध और लचर प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उस समय की सरकार की कड़ी आलोचना हुई थी।
लोकतंत्र में किसी भी दल की कमजोरियों को उजागर करना गलत नहीं है, लेकिन केवल अतीत के पन्ने पलटकर वर्तमान की हर गंभीर समस्या से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। भारतीय जनता पार्टी लगभग एक दशक से प्रदेश की सत्ता की बागडोर संभाले हुए है, इसलिए उससे भी उतनी ही कठोर जवाबदेही की अपेक्षा करना पूरी तरह स्वाभाविक है। हाल ही में गोंडा में 520 करोड़ रुपये से अधिक की 69 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास करते हुए मुख्यमंत्री ने विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था की अपनी तमाम उपलब्धियां जनता के सामने गिनाईं।
सड़क, पुल, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की योजनाएं बनना सराहनीय कदम है, लेकिन विकास का वास्तविक पैमाना केवल परियोजनाओं की घोषणाओं या शिलान्यासों की संख्या नहीं होती। असली पैमाना यह है कि वे योजनाएं जमीन पर कितनी उतरती हैं और आम आदमी के जीवन स्तर में कितना सकारात्मक बदलाव लाती हैं। आज भी प्रदेश का युवा रोजगार के अवसरों की तलाश में भटक रहा है, किसान अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहा है, गरीब तबका बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तरस रहा है और आम नागरिक महंगाई के बोझ तले दबा हुआ है।
वहीं दूसरी ओर, अखिलेश यादव द्वारा भाजपा सरकार पर लगाए जा रहे वोट चोरी और चंदा चोरी जैसे आरोप भी कम गंभीर नहीं हैं। लोकतंत्र में देश के हर मतदाता का वोट उसका सबसे पवित्र अधिकार माना जाता है। यदि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर इस तरह के गंभीर सवाल खड़े होते हैं, तो उनका ठोस तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर पारदर्शी समाधान होना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि आरोपों की गंभीरता तभी साबित होती है जब उनके समर्थन में पुख्ता सबूत हों। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं।
यहाँ विपक्ष की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। केवल भाजपा को घेरे रहने से समाजवादी पार्टी अकेले जनता का पूरा विश्वास नहीं जीत सकती। अखिलेश यादव को साफ तौर पर यह बताना होगा कि यदि उनकी सरकार दोबारा बनती है, तो प्रदेश की कानून-व्यवस्था का मॉडल क्या होगा, युवाओं को रोजगार देने की उनकी नीति क्या होगी और पिछली सरकार के दौरान उठे सवालों से उन्होंने क्या सबक सीखा है।
ठीक इसी प्रकार, भाजपा को भी हर चुनाव में केवल पिछली सरकारों का भय दिखाकर आगे बढ़ने के बजाय अपने कार्यकाल का पारदर्शी रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखना चाहिए। यदि कानून-व्यवस्था वास्तव में इतनी ही बेहतर है, तो महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों और पुलिस प्रशासन की जवाबदेही पर खुली बहस क्यों नहीं होनी चाहिए? अंततः लोकतंत्र में असली परीक्षा सिर्फ विरोधी दल को हराने की नहीं, बल्कि आम जनता का अटूट विश्वास जीतने की होती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को अब इसी कठिन कसौटी पर खरा उतरना ही होगा।

