

गम्हरिया की घटना ने पुलिसिंग की बुनियाद पर खड़े किए गंभीर सवाल
आम आदमी जब किसी मुसीबत में फंसता है, उसके साथ अन्याय होता है अथवा उसे किसी तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, तो वह सबसे पहले थाने का दरवाजा खटखटाता है। उसके मन में एक सहज विश्वास होता है कि कानून के रखवाले उसकी बात सुनेंगे, उसकी पीड़ा समझेंगे और उसे न्याय दिलाने की दिशा में पहल करेंगे। पुलिस व्यवस्था से उसकी अपेक्षा बहुत बड़ी नहीं होती। वह केवल इतना चाहता है कि उसकी फरियाद सुनी जाए, उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार हो और कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए।
यह भी सच है कि पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार, पक्षपात, राजनीतिक दबाव और संवेदनहीनता की शिकायतें नई नहीं हैं। कई बार फरियादी थाने पहुंचता है, लेकिन उसकी समस्या का समाधान होने के बजाय वह नई परेशानियों में घिर जाता है। कहीं प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है, कहीं प्रभावशाली लोगों के दबाव में कार्रवाई प्रभावित होती है, तो कहीं पुलिसकर्मियों का व्यवहार ही पीड़ित के लिए दूसरी यातना बन जाता है। इसके बावजूद आम आदमी थाने जाता है, क्योंकि उपलब्ध संस्थागत व्यवस्था में पुलिस ही वह पहली कड़ी है, जहां से उसे न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचने का रास्ता मिलता है।
लेकिन जरा ठहरकर सोचिए। यदि कोई महिला न्याय की आस लेकर थाने पहुंचे और वहीं उसके साथ दुष्कर्म जैसी जघन्य वारदात हो जाए तो इस स्थिति को क्या कहा जाएगा? जिस संस्थान से उसे सुरक्षा और न्याय की उम्मीद थी, यदि उसी की चारदीवारी में उसकी गरिमा और सुरक्षा खतरे में पड़ जाए तो उसके लिए न्याय व्यवस्था पर भरोसा बचा कैसे रहेगा?
झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया थाने से सामने आया मामला इसी वजह से असाधारण रूप से गंभीर है। एक महिला न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुंची थी। आरोप है कि वहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इस मामले में थाना प्रभारी समेत अब तक 15 लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की खबर सामने आई है। आरोपों की जांच और दोषियों की कानूनी जवाबदेही अपनी जगह है, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने पुलिसिंग की कार्यप्रणाली को लेकर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
थाने में फरियादी की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?
इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पुलिस थाने के भीतर फरियादियों की सुरक्षा और उनके साथ होने वाले व्यवहार से जुड़ा है। आखिर किसी थाने में आने वाले फरियादी की जिम्मेदारी किसकी होती है? उसकी शिकायत सुनने, उसे उचित अधिकारी तक पहुंचाने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व किस पुलिसकर्मी का है?
थाने में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परेशानी से गुजर रहा होता है। वह मानसिक रूप से परेशान, भयभीत अथवा असहाय हो सकता है। विशेषकर महिला फरियादी की स्थिति और भी संवेदनशील होती है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना थाने के प्रभारी और वहां तैनात पूरी टीम की जिम्मेदारी है कि कोई भी अनधिकृत व्यक्ति उसके संपर्क में न आए और उसके साथ किसी तरह की अभद्रता या उत्पीड़न न हो।
गम्हरिया प्रकरण में वायरलेस ऑपरेटर की भूमिका को लेकर जो सवाल उठे हैं, वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। एक वायरलेस ऑपरेटर का मूल काम संचार व्यवस्था को संचालित करना है। फिर वह फरियादी महिला के संपर्क में किस परिस्थिति में पहुंचा? क्या उसकी भूमिका और अधिकारों की स्पष्ट सीमा निर्धारित थी?
पुलिसिंग का नया ट्रैक: थानों को सेवा केंद्र बनाना होगा
अब समय आ गया है कि पुलिसिंग को केवल अपराध नियंत्रण, गिरफ्तारी और कानून-व्यवस्था के पारंपरिक नजरिये से देखने के बजाय नागरिक सेवा और जवाबदेही के व्यापक ढांचे में रखा जाए। थाने को ऐसा स्थान बनाना होगा जहां फरियादी भय लेकर नहीं, भरोसा लेकर पहुंचे। इसके लिए प्रत्येक थाने में फरियादी सहायता डेस्क हो और महिला फरियादियों के लिए सुरक्षित व्यवस्था अनिवार्य हो।
गम्हरिया की घटना ने झारखंड पुलिस की छवि पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस धब्बे को मिटाना आसान नहीं होगा। विभागीय कार्रवाई से तत्काल संदेश जरूर जाएगा, लेकिन जनता का भरोसा बहाल करने के लिए उससे कहीं अधिक प्रयास करने होंगे।
