कड़वा सच
विनम्रता नहीं, जवाबदेही चाहिए: TMH और कंपनी प्रबंधन कटघरे में कंपनी प्रबंधन को यह समझना होगा कि यह “एहसान” नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है
देवानंद सिंह
जमशेदपुर के Tata Main Hospital (TMH) को लेकर उठे सवाल अब केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहे, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहे हैं। विधायक पूर्णिमा साहू को सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा व्यक्त करनी पड़ी यह अपने आप में चिंताजनक संकेत है।
कंपनी प्रबंधन का यह तर्क कि CSR फंड की सीमा समाप्त हो चुकी है, न केवल अमानवीय लगता है, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का एक सुविधाजनक रास्ता भी प्रतीत होता है। कई बार ऐसी स्थिति सामने आई है जब बिना बकाया राशि चुकाए शव देने में भी आनाकानी की गई, जिससे जनप्रतिनिधियों और अस्पताल प्रबंधन के बीच टकराव की नौबत तक आ गई। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।
Tata Steel के अंतर्गत संचालित Tata Steel Foundation द्वारा किए जा रहे CSR खर्च की भी पारदर्शी जांच की मांग अब समय की जरूरत बनती जा रही है।
जनप्रतिनिधियों को एकजुट होकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि CSR का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचे, न कि कागजी आंकड़ों तक सीमित रह जाए।
Companies Act, 2013 के तहत CSR कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य दायित्व है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर कंपनी प्रबंधन धीरे-धीरे अपने सामाजिक दायित्वों से विमुख क्यों होता जा रहा है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जे एन टाटा की मानवीय और समाजोन्मुख सोच आज की परिस्थितियों में भी उतनी ही जीवंत है, या फिर वह केवल इतिहास के पन्नों तक सिमटती जा रही है?
कंपनी प्रबंधन को यह समझना होगा कि यह “एहसान” नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है और यदि इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा गया, तो जनप्रतिनिधि और समाज दोनों ही जवाब मांगेंगे क्योंकि विनम्रता को कमजोरी समझना सबसे बड़ी भूल होगी।

