धर्म, सत्ता और अपराध के त्रिकोण को तोड़ने का समय
देवानंद सिंह
कर्नाटक के पवित्र माने जाने वाले शहर धर्मस्थल से निकली भयावह कहानी न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि पूरे न्यायिक और राजनीतिक ढांचे पर गहरे सवाल खड़े करती है। जब एक पूर्व सफाईकर्मी ने इसी महीने 4 जुलाई को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 के तहत एक मजिस्ट्रेट के सामने यह दावा किया कि उसने 1995 से 2014 के बीच 100 से अधिक शवों को दफनाया, तब से इस प्रकरण ने धार्मिक संस्थाओं, कानून व्यवस्था और जनमानस के भरोसे को झकझोर कर रख दिया है।

दरअसल, यह कथित घटनाक्रम धर्मस्थल मंजुनाथ स्वामी मंदिर से जुड़ा हुआ है, जो दक्षिण भारत का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां शैव परंपरा का मंदिर है, लेकिन वैष्णव पुजारियों और जैन वंशजों के प्रशासनिक नेतृत्व के कारण यह अनूठा धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र माना जाता है। किंतु अब, यही मंदिर उस आरोप के केंद्र में है, जहां लंबे समय तक अपराधों को छिपाने और साक्ष्य मिटाने का घिनौना खेल चलने का दावा किया गया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उसने नेत्रावती नदी के किनारे सफाई कार्य करते हुए एक-एक कर 100 से अधिक शवों को देखा, दफनाया और कुछ को डीजल डालकर जलाया। इन शवों में किशोरियां, महिलाएं और पुरुष शामिल थे, जिनके शरीर पर यौन हिंसा, गला घोंटने, तेजाब से जलाने, और क्रूर तरीके से हत्या के निशान थे।
वह कहता है कि उसे डराया गया, धमकाया गया और अंततः सबूत नष्ट करने का हिस्सा बना दिया गया। 2010 की एक घटना का ज़िक्र करते हुए उसने बताया कि एक 12-15 साल की किशोरी का शव, जिसके गले पर रस्सी के निशान थे, उसे दफनाने को कहा गया। इस बयान को केवल सनसनीखेज़ नहीं, बल्कि एक व्यवस्था के अंदर गहरे रूप से धंसे आपराधिक तंत्र का संकेत माना जाना चाहिए।
कर्नाटक सरकार ने भारी जनदबाव और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों की आलोचना के बाद 14 जुलाई को एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। इसका नेतृत्व डीजीपी प्रणब मोहंती कर रहे हैं और इसमें उन अधिकारियों को शामिल किया गया है,जो पहले गौरी लंकेश जैसे हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच में सक्रिय रहे हैं। फिर भी, वरिष्ठ अधिवक्ता केवी धनंजय ने यह गंभीर आरोप लगाया है कि पुलिस न केवल सुस्त रफ्तार से काम कर रही है, बल्कि संभवतः प्रभावशाली लोगों को बचाने की रणनीति अपना रही है। उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा पहले ही कब्र खोदकर मजिस्ट्रेट के सामने अवशेष पेश करने के बावजूद, पुलिस ने न तो घटनास्थल का निरीक्षण किया और न ही शिकायतकर्ता को दोबारा बुलाया।

यह न केवल आपराधिक न्याय प्रक्रिया में गम्भीर चूक है, बल्कि एक संकेत है कि कहीं न कहीं शक्तिशाली संस्थाएं साक्ष्य नष्ट करने और मामले को कमजोर करने में लगी हो सकती हैं। शिकायत सामने आने के बाद सुजाता भट नाम की महिला ने अपनी 22 साल पहले लापता हुई बेटी अनन्या भट की कहानी साझा की। अनन्या मणिपाल मेडिकल कॉलेज की छात्रा थीं और आख़िरी बार धर्मस्थल में देखी गई थीं। उनकी मां का कहना है कि वे न्याय नहीं चाहतीं, सिर्फ़ सत्य और क्लोजर चाहती हैं, यह जानना चाहती हैं कि क्या वास्तव में अनन्या का जीवन वहीं खत्म हो गया।

इसी तरह 2012 में सौजन्या नामक छात्रा की बलात्कार और हत्या ने राज्य में व्यापक विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया था। सौजन्या का मामला आज भी अधूरा है और इन हालिया आरोपों ने उस दर्द को भी फिर से उजागर कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह धर्मस्थल जैसे प्रभावशाली धार्मिक संस्थान से जुड़ा है। यह वही स्थान है, जिसकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पकड़ क्षेत्र में बेहद मज़बूत है।
कई स्थानीय लोगों का यह विश्वास रहा है कि धर्मस्थल मंदिर प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाना लगभग असंभव है। ऐसे में, यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि क्या इतने वर्षों तक कथित हत्याएं होती रहीं और स्थानीय प्रशासन, पुलिस और धार्मिक संस्थान की मिलीभगत के बिना कोई शोर नहीं उठा?

1983 में विधायक के. वसंथ बंगेड़ा ने विधानसभा में चार महिलाओं के लापता होने का मुद्दा उठाया था, लेकिन वह भी बिना किसी परिणाम के दबा दिया गया। यह स्पष्ट करता है कि इन संस्थानों में जिम्मेदारी नाम की कोई चीज़ नहीं है। दक्षिण कन्नड़ जिले के पुलिस अधीक्षक डॉ. अरुण ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता द्वारा खुदाई करना एक अपराध है और इसलिए कानूनी प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ना संभव है। यह तर्क तकनीकी रूप से उचित हो सकता है, लेकिन जब मामला सैकड़ों संभावित हत्याओं का हो, तब प्राथमिकता साक्ष्य को संरक्षित करने, पीड़ितों की पहचान करने और शिकायतकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने की होनी चाहिए।
एक ओर जहां पुलिस कानूनी प्रक्रिया की दुहाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर पूरे राज्य में यह धारणा बनती जा रही है कि शायद सरकार, धार्मिक संस्था और पुलिस मिलकर इस मुद्दे को दबाना चाहते हैं। यह मामला केवल कानूनी या राजनीतिक नहीं है। यह उस सांस्कृतिक संकुचितता की भी पोल खोलता है, जिसमें धार्मिक संस्थानों को अस्पृश्य मान लिया जाता है और वहां घटित होने वाली अनैतिक घटनाओं को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं बनने दिया जाता।

धर्मस्थल जैसी संस्था से जुड़ी यौन हिंसा, हत्या और साक्ष्य मिटाने जैसे गंभीर आरोपों को धर्म के नाम पर ढंकने की कोशिश, भारतीय समाज में धर्म और न्याय के बीच की दूरी को उजागर करती है। कुल मिलाकर, कर्नाटक सरकार और न्यायिक संस्थाओं के समक्ष यह एक निर्णायक क्षण है। यह केवल 100 शवों की बात नहीं है, बल्कि उन अनगिनत परिवारों की भी है, जिनके लापता प्रियजनों का कभी कोई पता नहीं चला। अगर, इस मामले में जांच अधूरी, ढुलमुल या पक्षपातपूर्ण रही, तो यह न केवल शिकायतकर्ता की आत्मा की हत्या होगी,
बल्कि उन सभी नागरिकों के अधिकारों की हत्या होगी, जो आज भी न्याय की आशा करते हैं। धर्म, सत्ता और अपराध के इस त्रिकोण को तोड़ने का समय अब आ गया है। यह सिर्फ़ कानून की परीक्षा नहीं, नैतिकता और लोकतंत्र की भी अग्निपरीक्षा है।


