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    Home » राजस्थान में मानव तस्करी: बच्चियों को लीज पर देने का सच
    अपराध राष्ट्रीय संपादकीय

    राजस्थान में मानव तस्करी: बच्चियों को लीज पर देने का सच

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 8, 2026No Comments4 Mins Read
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    मानव तस्करी
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    लेखक: इंद्र यादव

    यह खबर पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, कलेजा मुँह को आ जाता है। ‘दैनिक भास्कर‘ की रिपोर्ट ने एक ऐसे घिनौने सच को उजागर किया है जिसे पढ़कर किसी भी संवेदनशील इंसान की आँखें शर्म से झुक जाएँगी। खबर है कि राजस्थान में एक ऐसा मानव तस्करी का नेटवर्क सक्रिय है, जो बच्चियों को महज 8-10 साल के लिए ‘लीज’ (किराये) पर ले लेता है। उन नन्हीं बच्चियों को पीटा जाता है, नशा दिया जाता है और उनका घोर शारीरिक शोषण बलात्कार किया जाता है।

    मानवता को शर्मसार करती मानव तस्करी का काला कारोबार

    सवाल यह है कि आखिर हम किस सदी में जी रहे हैं? क्या हमारे देश का सरकारी तंत्र इतना निकम्मा और संवेदनहीन हो गया है कि एक पिता अपनी 3 साल की बच्ची को ‘कर्ज’ उतारने के लिए गिरवी रख देता है? क्या एक माँ अपनी बेटी को कमाई का जरिया मानकर ठेकेदारों के हवाले कर देती है? यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि मानवता की सबसे निचली पराकाष्ठा है।

    जब गरीब का पेट खाली होता है और सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाएं फाइलों में दम तोड़ देती हैं, तब ऐसे ‘दलाल’ अपनी दुकानें सजाते हैं। स्टाम्प पेपर पर करार होता है—सरेआम, कानून की नाक के नीचे! क्या प्रशासन को इसकी भनक नहीं थी? जब स्टाम्प पर लिखकर बच्चियां बेची जा रही थीं, तब पुलिस, प्रशासन और समाज कल्याण विभाग के अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या उनका काम सिर्फ घटनाओं के बाद ‘दबिश’ देना और ‘गिरफ्तारी’ का ढिंढोरा पीटना रह गया है!

    यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि हमारे सिस्टम में कहीं बहुत बड़ा छेद है। गरीबी का दंश इतना गहरा है कि माँ-बाप ही अपनी संतानों के सौदागर बन रहे हैं। और दूसरी तरफ, उन दलालों की हिम्मत देखिए, जो इतनी बेखौफ होकर यह धंधा चला रहे हैं। उनके पास स्टाम्प हैं, उनके पास नियम हैं, और उनके पास वह ‘क्रूरता’ है जो इंसान को हैवान बना देती है।

    सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता पर सवाल

    यह सिर्फ पुलिस की नाकामी नहीं है, यह हमारी ‘सामूहिक विफलता’ है। हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ एक 3 साल की बच्ची की कीमत 90 हजार लगाई जाती है? जहाँ माँ की मौत पर भी बेटी को महज एक घंटे के लिए घर आने की छूट मिलती है? यह उस व्यवस्था पर तमाचा है जो ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारों की गूँज में, असलियत की चीखों को दबा देती है। भारत में मानव तस्करी के भयावह आंकड़े और इसके विभिन्न पहलू आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

    आगे की राह: क्या करें और क्या न करें?

    सिर्फ दोषियों को पकड़ लेना या एनजीओ के सहारे बच्चियों को रेस्क्यू कर लेना पर्याप्त नहीं है। इस नेटवर्क की जड़ें बहुत गहरी हैं। सरकार को चाहिए कि इन स्टाम्प पेपरों पर सौदा करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दे। ऐसे इलाकों में जाकर जाँच हो, जहाँ गरीबी के नाम पर बेटियों का सौदा हो रहा है। प्रशासन को ‘सक्रिय’ नहीं, ‘संवेदनशील’ होने की जरूरत है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    समाज को भी अब जागना होगा। अगर हमारे पड़ोस में कोई मासूम बच्ची गायब हो रही है, या किसी परिवार की आर्थिक स्थिति अचानक चमक रही है, तो हमें सवाल पूछने होंगे। हमें अपनी बेटियों को सुरक्षित रखने के लिए तंत्र के भरोसे बैठने के बजाय खुद एक रक्षक बनना होगा।

    इस खबर ने हमारे समाज के चेहरे पर जो कालिख पोती है, उसे सिर्फ कानून ही नहीं, हमारी मानवीय संवेदना ही धो सकती है। याद रखिए, जिस समाज में बच्चियां सुरक्षित नहीं, उस समाज का भविष्य अंधकारमय है। यह वक्त जागने का है, सवाल पूछने का है और इस घिनौने कारोबार को जड़ से उखाड़ फेंकने का है। शर्म आती है, पर हम चुप नहीं रह सकते। अब न्याय चाहिए, सिर्फ आश्वासन नहीं!

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