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    Home » सदियों से जारी है धर्मस्थलों के चढ़ावे पर डाका: सोमनाथ से अयोध्या तक की कहानी
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    सदियों से जारी है धर्मस्थलों के चढ़ावे पर डाका: सोमनाथ से अयोध्या तक की कहानी

    Devanand SinghBy Devanand SinghJune 27, 2026No Comments7 Mins Read
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    धर्मस्थलों के चढ़ावे पर डाका
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    लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी

    मंदिर भारत में सिर्फ पूजा स्थल नहीं रहे। ये राजकोष थे, बैंक थे, समाज की तिजोरी थे। राजा से लेकर किसान तक सोना, चांदी, जमीन मंदिर को दान करता था। यही वजह है कि जब भी कोई आक्रांता आया, लुटेरा आया या लालची हाथ बढ़ा, निशाना मंदिर का चढ़ावा ही बना। इस ऐतिहासिक और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, धर्मस्थलों के चढ़ावे पर डाका कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह एक सदियों पुरानी समस्या है।

    प्राचीन काल से धन का लक्ष्य

    आठवीं सदी में मुहम्मद बिन कासिम सिंध आया। देबल और नीरून के मंदिरों से मूर्तियां तोड़ीं, सोना लूटा। यह शुरुआत थी। असली कहर ढाया महमूद गजनवी ने। 1000 से 1027 ईस्वी के बीच सत्रह बार हमले किए। 1025 में सोमनाथ पर हमला किया। अल-बरुनी लिखता है कि मंदिर में करोड़ों का खजाना था। गर्भगृह में हीरे जड़े शिवलिंग, सोने-चांदी की मूर्तियां थीं। महमूद गजनवी ऊंटों पर लादकर धन गजनी ले गया। मथुरा के मंदिरों से अट्ठानवे हजार तीन सौ मिस्कल सोना मिला। कन्नौज, थानेश्वर के मंदिर भी खाली कर दिए गए।

    मकसद सिर्फ दीन नहीं था, दौलत थी। रिचर्ड ईटन जैसे इतिहासकार बताते हैं कि 1192 से 1729 के बीच अस्सी मंदिरों के तोड़े जाने के पक्के सबूत हैं। मुहम्मद गोरी ने तराइन जीतने के बाद अजमेर-दिल्ली के मंदिर लूटे। अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को दक्षिण भेजा। वारंगल, द्वारसमुद्र, मदुरै के मंदिरों से इतना सोना-हीरा लूटा कि दिल्ली के बाजार में दाम गिर गए। तैमूर लंग 1398 में आया तो दिल्ली के आसपास के मंदिर और बस्तियां दोनों लूट लीं।

    औरंगजेब के दौर 1658 से 1707 तक सबसे व्यवस्थित तोड़फोड़ हुई। काशी विश्वनाथ, मथुरा केशवदेव, सोमनाथ मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि सब कुछ आज हमारे सामने है। मंदिर की संपत्ति जब्त होती थी, पुजारियों को मार दिया जाता था या भगा दिया जाता था। सतीश चंद्र लिखते हैं कि औरंगजेब ने वही मंदिर तुड़वाए जो जाट, मराठा, राजपूत विद्रोह के केंद्र थे। बनारस का मंदिर इसलिए तोड़ा क्योंकि शिवाजी के भाई को वहां शरण मिली थी।

    नीति में विविधता: दान और निर्माण भी

    पर सिक्के का दूसरा पहलू भी है। अकबर ने वृंदावन के मंदिरों को जमीन दी, अनुदान दिया। जहांगीर ने बनारस के जंगमबाड़ी मठ को दान दिया। टीपू सुल्तान ने शृंगेरी मठ को चांदी का सिंहासन दिया, मंदिर टूटने पर मरम्मत के लिए पैसा भेजा। दक्षिण के बहमनी और आदिलशाही सुल्तानों ने कई मंदिरों को कर-मुक्त जमीन दी। मुगल दरबार में राजपूत राजाओं ने ओरछा और वृंदावन के भव्य मंदिर बनवाए। यानी नीति एक जैसी नहीं थी। जब जरूरत पड़ी, मंदिर लूटे। जब राजनीति सधी, मंदिर बनवाए भी।

    लूट सिर्फ मुस्लिम शासकों ने नहीं की। कश्मीर का राजा हर्ष 1089 ईस्वी में देवोत्पाटन नायक बना। पैसे के लिए मंदिरों की सोने-चांदी की मूर्तियां गलवा दीं। चोल राजा राजाधिराज ने ग्यारहवीं सदी में चालुक्य राजधानी कल्याणी पर हमला कर मंदिर लूटे। रोमिला थापर कहती हैं कि मध्यकाल में मंदिर राजा की सत्ता का प्रतीक था। उसे तोड़ना मतलब दुश्मन राजा को वैचारिक रूप से हराना। इसलिए युद्ध में मंदिर हमेशा निशाने पर रहा, चाहे हमलावर कोई भी हो।

    अंग्रेजी शासन और संपत्ति का अधिग्रहण

    अंग्रेज आए तो तरीका बदला। 1857 के बाद कई मंदिरों की संपत्ति जब्त की गई। इनाम आयोग बैठाकर लाखों एकड़ देवस्थल जमीन छीन ली। 1863 के धार्मिक अक्षय निधि नियम से सरकार ने मंदिरों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। पुजारी वेतनभोगी कर्मचारी बन गए। चढ़ावा सरकारी खजाने में जाने लगा।

    आधुनिक युग में धर्मस्थलों के चढ़ावे पर डाका

    आजादी के बाद लूट का रूप बदल गया। अब तलवार से नहीं, ताले तोड़कर और कलम से डाका पड़ता है। 1980 में चित्रकूट के भरतकूप राम जानकी मंदिर में चोरी हुई। आज भी हो रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले बाहरी हमलावर थे, अब अंदर के लोग भी मिले हुए हैं।

    बढ़ती चोरियां और संगठित अपराध

    पिछले 20 साल का रिकॉर्ड देखो। चित्रकूट का विजय कुमार शुक्ला गिरोह। 2004 में हत्या के मामले में जमानत मिली तो कागजों में खुद को मृत घोषित करवा लिया। फिर 20 साल में पचास मंदिर लूटे। मूर्तियां, चांदी के गहने, पीतल के घंटे। मोबाइल में तीन सौ से ज्यादा मंदिरों की रेकी की फोटो मिलीं। कुत्तों को जहरीली मिठाई खिलाकर रास्ता साफ करता था।

    2024 से 2026 के बीच वारदातें तेज हुईं। दिल्ली चांदनी चौक में 11 मई 2025 की रात शनि देव की अष्टधातु मूर्ति चोरी। पंद्रह साल पुरानी, एक लाख की। चोर निगरानी कैमरे में कैद हुआ। चित्रकूट भरतकूप में राम परिवार के आठ चांदी के मुकुट गए, वजन एक किलो सात सौ ग्राम। भागलपुर में सोना महंगा हुआ तो दुर्गा मंदिर से मुकुट, गले का हार, दानपेटी साफ। कहलगांव से एक सौ पच्चीस साल पुरानी दुर्गा मूर्ति और शिवलिंग चोरी। बुलंदशहर साईं मंदिर में 19 अप्रैल 2026 को ढाई सौ ग्राम चांदी का छत्र और पांच हजार नकद गए। इक्कीस निगरानी कैमरे लगे थे, फिर भी चोर बरसाती-दस्ताने पहनकर आए। सिरसा दुर्गा मंदिर से पांच सौ ग्राम चांदी का मुकुट, एक सौ बीस ग्राम सोना, चांदी के छत्र गए। कुल नुकसान बीस लाख से ऊपर। भीलवाड़ा स्वस्ति धाम जैन मंदिर से 24 मई 2025 को एक किलो तीन सौ ग्राम सोने का आभा मंडल और तीन किलो चांदी का कछुआ गया। कीमत सवा करोड़। चोर दर्शन के बहाने दिन में घुसा, रात को छत पर छिपा रहा। मऊगंज नईगढ़ी किला मंदिर से 30 सितंबर 2024 को बत्तीस लाख के जेवर गए। खंभों पर जड़ी परत तक नोच ली। निगरानी कैमरे के तार काट दिए। उज्जैन आशापुरी माता मंदिर से तीन किलो से ज्यादा चांदी के आभूषण गए। तीन चोर थे, एक ने तो प्रणाम करके चोरी की।

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    अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का आरोप

    सबसे बड़ा घाव अयोध्या में लगा। राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का आरोप। जून 2025 में अखिलेश यादव ने सात करोड़ की हेराफेरी का मुद्दा उठाया। सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगी तो आंकड़ा दो सौ करोड़ तक पहुंचा। उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रशासनिक अधिकारी विजय विश्वास पंत, पुलिस अधिकारी किरण एस का विशेष जांच दल बनाया। जांच में निकला कि दान गिनने वाले कर्मचारी लवकुश मिश्रा के घर से दस लाख नकद मिला। कुछ आलमारी में, कुछ गोबर के ढेर में छिपा था। दो कर्मचारियों की तनख्वाह अठारह से बीस हजार थी। एक ने डेढ़ करोड़ की जमीन ली, दूसरे ने चालीस लाख का भूखंड। नौ कर्मचारी ऐसे मिले जिन्होंने हाल में महंगे फोन-गाड़ियां खरीदीं। चंपत राय के पूर्व चालक रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू के पास अयोध्या-लखनऊ में पचास करोड़ की संपत्ति का आरोप। घर से सोना बरामद होने की खबर। भतीजा मनीष यादव नोट गिनता था, उसकी निशानदेही पर छत्तीस लाख मिले। कुंभ के दो महीने में रोज दस लाख श्रद्धालु आए। दानपेटी दो घंटे में भर जाती थी। उसी दौरान सबसे बड़ी गड़बड़ का शक।

    चोरी के तरीके और कारण

    ढंग साफ है। निशाना सोना, चांदी, अष्टधातु की मूर्ति, मुकुट, छत्र, दानपात्र की नकदी। समय रात का, जब मंदिर बंद। तरीका रेकी, निगरानी कैमरा तोड़ना, दीवार फांदना, छत से घुसना। पहले बाहरी गिरोह थे, अब प्रबंध समिति के कर्मचारी, पुजारी, चालक भी शामिल। वजह सोने-चांदी के दाम का बढ़ना और सुरक्षा का कमजोर होना।

    मंदिरों के पास एक लाख करोड़ से ऊपर की संपत्ति का अनुमान है। पद्मनाभस्वामी मंदिर के तहखाने में ही इतना खजाना निकला। तिरुपति बालाजी का सालाना चढ़ावा तीन हजार करोड़ से ऊपर है। इतना धन होगा तो लालच भी आएगा। पहले तलवार वाले आए, अब सफेदपोश आए। पहले गजनी से आए, अब गली से निकलते हैं।

    सुरक्षा के सवाल और पारदर्शिता की कमी

    सवाल सुरक्षा का है। बड़े मंदिरों में केंद्रीय सुरक्षा बल, आतंक विरोधी दस्ता, उड़न-रोधी व्यवस्था है। पर चोरी रोक नहीं पा रहे। क्योंकि बाहरी सुरक्षा और आंतरिक हिसाब दो अलग चीज हैं। राम मंदिर में बाहरी पहरा कड़ा है, पर दान गिनने वाले ही शक के घेरे में हैं। छोटे मंदिरों में तो निगरानी कैमरा तक नहीं। पुजारी अकेला है। दानपेटी का ताला टूटना रोज की बात है।

    निष्कर्ष यही कि धर्मस्थल का चढ़ावा हजार साल से लूट का केंद्र रहा है। महमूद गजनवी ऊंट पर लादकर ले गया। विजय शुक्ला बोरे में भरकर ले गया। लवकुश मिश्रा गोबर में छिपाकर ले गया। नाम बदले, तरीके बदले, नीयत नहीं बदली। जब तक मंदिर में अपार धन रहेगा और हिसाब में पारदर्शिता नहीं आएगी, डाका पड़ता रहेगा। सोमनाथ से राम मंदिर तक कहानी एक ही है। बस लुटेरे का चेहरा बदल गया है।

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