“बच्चों की सुरक्षा सिर्फ परिवार की नहीं, पूरे समाज की साझा ज़िम्मेदारी है”
आज सुबह समूह के सम्मानित भाई ने एक मैसेज छोड़ा कि जरा इस विषय पर भी ध्यान दें तो इस विषय पर एक करवा सच कड़वी दवा के रूप में रख रहूं अगर कुछ गलती हो तो माफ़ करें
गायब होने और मिलने की कहानी कुछ भी हो सकती हैं ऐ जाँच का विषय हैं, पर माँ, बाप की कुछ भी जिम्मेदारी नहीं हैं,? टूशन टीचर की जिम्मेदारी क्या सिर्फ फीस तक ही सीमित हैं, अगर बच्ची से कोई शिकायत थी तो पेरेंट्स से शिकायत करनी थी ना की बच्ची को अकेले घर भेज देने से जिम्मेदारी से मुक्त? सबसे बड़ी दोषी अभिवावक और टीचर्स दोनों

देवानंद सिंह
टेल्को की 9 वर्षीय अंशिका सिंह की अचानक लापता होने और फिर कॉलोनी के ही एक क्वार्टर के सामने डरी-सहमी हालत में मिलने की घटना केवल एक खबर नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी है। यह घटना स्पष्ट करती है कि बच्चों की सुरक्षा का सवाल अब सिर्फ स्कूल, परिवार या पुलिस तक सीमित नहीं रहा — यह संपूर्ण कॉलोनी और समाज की जिम्मेदारी बन चुका है।

बच्चे अब घर के नहीं, समाज के भी होते हैं
बच्चे किसी एक परिवार का हिस्सा नहीं, भविष्य के नागरिक होते हैं। जब वे स्कूल, ट्यूशन या खेलकूद के लिए घर से निकलते हैं, तो वे पूरे समाज की जिम्मेदारी बन जाते हैं।
अंशिका का मामला यही बताता है — वह कहीं बाहर नहीं, अपने ही मुहल्ले में लापता हुई और मिली भी वहीं। इसका सीधा अर्थ है कि खतरें अब “बाहर” नहीं, “अंदर” हैं।

कॉलोनी की सतर्कता: क्या अब भी हम बेपरवाह हैं?
हर कॉलोनी, अपार्टमेंट, या बस्ती में कुछ मूलभूत व्यवस्थाएं अनिवार्य होनी चाहिए:
सीसीटीवी कैमरे: हर गेट, मुख्य सड़क, पार्क और छतों की निगरानी होनी चाहिए। क्या टेल्को कॉलोनी में ये मौजूद थे? अगर थे, तो उनका विश्लेषण क्यों नहीं हुआ?
सामुदायिक वॉच ग्रुप: हर ब्लॉक/गली में स्थानीय निवासी मिलकर एक सुरक्षा टीम बना सकते हैं जो शाम के समय गश्त करे, अजनबियों पर नजर रखे।

व्हाट्सएप अलर्ट ग्रुप: बच्चा गुम हो जाए तो कॉलोनी का एक डिजिटल अलर्ट सिस्टम सेकंडों में पूरे समाज को सतर्क कर सकता है।
हालांकि इस पूरे प्रकरण में भाजपा के पूर्व प्रवक्ता अंकत आनंद की भूमिका सराहनीय रही सबसे बड़ा सवाल है कि ये सिर्फ अंकित या पुलिस की जिम्मेदारी थी

माता-पिता की भूमिका: भरोसे के साथ निगरानी
अक्सर माता-पिता बच्चों की स्वतंत्रता और आधुनिकता के नाम पर उन्हें ट्यूशन या बाहर अकेले भेज देते हैं, लेकिन यह आधा भरोसा और आधी अनदेखी कभी-कभी भारी पड़ती है।
बच्चों को ट्रैक करने वाले ऐप्स, पहचान कार्ड, और स्थानीय दुकानदारों से संवाद जैसी छोटी चीजें बड़ी सुरक्षा दे सकती हैं।

सबसे बड़ा खतरा: “चुप्पी”
समाज का सबसे घातक रवैया है – “हमने कुछ देखा, लेकिन बोले नहीं।”
टेल्को जैसी घटना तभी होती है जब आस-पास के लोग अनजान बने रहते हैं या डर के मारे कुछ नहीं कहते। हमें यह मानसिकता तोड़नी होगी।
अगर हम अपने पड़ोसी के बच्चे के लिए चिंतित नहीं हैं, तो यकीन मानिए हमारा बच्चा भी एक दिन खतरे में होगा।
अब सिर्फ पुलिस से उम्मीद नहीं
सामूहिक सुरक्षा समिति कॉलोनी के सभी परिवार मिलकर एक निगरानी समूह बनाएं
महिला और बुजुर्ग निगरानी दिन के समय महिलाएं व बुजुर्ग कॉलोनी में सुरक्षा दृष्टि रखें
गार्ड की जिम्मेदारी तय हो सिर्फ गेट खोलना बंद करना नहीं, संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्टिंग आवश्यक हो
बच्चों की ट्रेनिंग उन्हें “गुड टच-बैड टच”, गुम होने पर क्या करें, किसे आवाज दें – जैसी जानकारी दी जाए
अंशिका की वापसी सुखद है, पर यह सोचकर डर लगता है कि अगर वह नहीं मिलती तो? क्या तब भी हम चुप रहते?
इसलिए यह वक्त केवल राहत का नहीं, आत्म-मंथन का है। अब हमें सजग, संगठित और संवेदनशील कॉलोनी-संस्कृति की जरूरत है।
सिर्फ दीवारों से बने घर हमें नहीं बचा सकते, जागरूक पड़ोसी और सतर्क समाज ही बच्चों के लिए असली सुरक्षा कवच बन सकता है।
गायब होने और मिलने की कहानी कुछ भी हो सकती हैं ऐ जाँच का विषय हैं, पर माँ, बाप की कुछ भी जिम्मेदारी नहीं हैं,? टूशन टीचर की जिम्मेदारी क्या सिर्फ फीस तक ही सीमित हैं, अगर बच्ची से कोई शिकायत थी तो पेरेंट्स से शिकायत करनी थी ना की बच्ची को अकेले घर भेज देने से जिम्मेदारी से मुक्त? सबसे बड़ी दोषी अभिवावक और टीचर्स दोनों


