सत्ता पक्ष और विपक्ष को करनी होगी रचनात्मक राजनीति, तभी संभव होगा झारखंड का विकास – देवानंद सिंह
हाल ही में एक समागम में झारखंड की राजनीति का जो दृश्य सामने आया, जहां सत्ता पक्ष के सीपी सिंह और विपक्ष के बंधु तर्की की ‘जुगलबंदी’ दिखी, वह केवल एक मंचीय घटना नहीं थी। यह झारखंड की राजनीति के उस स्थायी विरोधाभास को उजागर करती है, जिसमें एक ओर व्यक्तिगत या सामयिक सामंजस्य दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर सदन, सड़कों और सोशल मीडिया पर आरोप–प्रत्यारोप की अंतहीन राजनीति चलती रहती है। सवाल यह नहीं है कि कौन किससे मंच साझा कर रहा है, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या सत्ता और विपक्ष मिलकर झारखंड के विकास के लिए रचनात्मक राजनीति कर रहे हैं?
दरअसल, झारखंड भारत के सबसे संसाधन-संपन्न राज्यों में से एक है। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम, जंगल, जल और जमीन का यहां अथाह भंडार है, लेकिन विडंबना यह है कि यही राज्य विकास के अधिकांश सूचकों में पीछे है। गरीबी, कुपोषण, पलायन, बेरोजगारी, आदिवासी असंतोष और बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी झारखंड की पहचान बनी हुई है। इसके बावजूद राजनीतिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा एक-दूसरे को नीचा दिखाने, पिछली सरकारों को कोसने और आगामी चुनावों की जोड़-तोड़ में खर्च हो जाता है।
लोकतंत्र में सत्ता का काम केवल शासन करना नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन करना होता है। वहीं, विपक्ष का धर्म केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक आलोचना और वैकल्पिक नीति प्रस्तुत करना होता है। झारखंड में दुर्भाग्य से दोनों ही भूमिकाएं अक्सर अपने मूल उद्देश्य से भटकती नजर आती हैं। सत्ता पक्ष हर सवाल को राजनीतिक साजिश बताकर टाल देता है, और विपक्ष हर नीति को बिना गहराई में गए ‘जनविरोधी’ घोषित कर देता है। नतीजा, नीति का विमर्श पीछे छूट जाता है, और राजनीतिक बयानबाज़ी आगे आ जाती है।
सीपी सिंह और बंधु तर्की जैसे नेताओं की मंचीय सौहार्दता यह दिखाती है कि व्यक्तिगत स्तर पर संवाद संभव है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संवाद नीति-निर्माण, विधान सभा की बहसों और जमीनी विकास तक भी पहुंच रहा है? अगर, मंच पर मुस्कान है और सदन में कटुता, तो यह केवल राजनीतिक दिखावा है। झारखंड को आज ऐसे नेताओं की ज़रूरत है, जो व्यक्तिगत संबंधों से आगे बढ़कर संस्थागत सहयोग को मजबूत करें।
झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है, लेकिन राजनीति में आदिवासी सवाल अक्सर नारेबाज़ी तक सीमित रह जाते हैं। पेसा कानून, सरना धर्म कोड, भूमि अधिग्रहण, खनन से विस्थापन और वनाधिकार, इन मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष दोनों की राजनीति अवसरवादी रही है। अगर, सत्ता और विपक्ष मिलकर इन मुद्दों पर साझा न्यूनतम एजेंडा तय करें, तो झारखंड न केवल राजनीतिक स्थिरता बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है।
आज विकास भी झारखंड की राजनीति में एक हथियार बन गया है। कोई कहता है हमने किया, कोई कहता है इन्होंने लूटा, लेकिन विकास कोई ट्रॉफी नहीं, बल्कि सतत प्रक्रिया है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार, इन पर श्रेय की लड़ाई नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी की जरूरत है। विपक्ष अगर हर योजना को केवल इसीलिए खारिज करता है कि वह सत्ता की है, और सत्ता अगर हर आलोचना को देशद्रोह या साजिश बताती है, तो नुकसान झारखंड की जनता का ही होगा। झारखंड विधानसभा अक्सर हंगामे, वॉकआउट और नारेबाज़ी की भेंट चढ़ जाती है। प्रश्नकाल बाधित होता है, महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के पारित हो जाते हैं और जनता के सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। सत्ता और विपक्ष, दोनों को यह समझना होगा कि विधानसभा कोई युद्धक्षेत्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मंदिर है। अगर यहाँ गंभीर बहस नहीं होगी, तो नीति सड़क पर बनेगी और लोकतंत्र कमजोर होगा।
झारखंड को आज जिस चीज़ की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है दीर्घकालिक दृष्टि। सरकारें आएंगी-जाएंगी, गठबंधन बदलेंगे, लेकिन राज्य की स्वयं वहीं रहेंगी, अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं बदली। सत्ता को यह स्वीकार करना होगा कि विपक्ष के पास भी अच्छे सुझाव हो सकते हैं, और विपक्ष को यह मानना होगा कि हर सरकारी कदम गलत नहीं होता। रचनात्मक राजनीति का मतलब सत्ता-विपक्ष का विलय नहीं, बल्कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा है। इसका अर्थ है सवाल पूछना, लेकिन समाधान के साथ; आलोचना करना, लेकिन विकल्प देकर; और समर्थन करना, लेकिन शर्तों के साथ। अगर झारखंड की राजनीति इस रास्ते पर चलती है, तो यह राज्य अपने संसाधनों का सही उपयोग कर सकता है।
कुल मिलाकर, सीपी सिंह और बंधु तर्की की जुगलबंदी
संवाद की संभावना का एक प्रतीक हो सकती है, लेकिन प्रतीकों से आगे बढ़कर अब झारखंड को ठोस राजनीतिक परिपक्वता चाहिए। सत्ता और विपक्ष अगर यह समझ लें कि उनका असली मुकाबला एक-दूसरे से नहीं, बल्कि गरीबी, पिछड़ेपन और अविश्वास से है, तभी झारखंड का वास्तविक विकास संभव है। वरना इतिहास गवाह है, राजनीतिक जंग में हमेशा राज्य हारता है और जनता भुगतती है।

