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    Home » दवाओं की गिरती गुणवत्ता और भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की नैतिक चुनौती
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    दवाओं की गिरती गुणवत्ता और भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की नैतिक चुनौती

    News DeskBy News DeskJuly 28, 2025No Comments6 Mins Read
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    दवाओं की गिरती गुणवत्ता और भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की नैतिक चुनौती
    देवानंद सिंह
    जिस भारत को विश्व की फार्मेसी के रूप में जाना जाता है, आज दवाओं की गुणवत्ता के संकट के रूप में एक गंभीर नैतिक और संरचनात्मक संकट से जूझ रहा है । बीते तीन वर्षों में भारत सरकार द्वारा परीक्षण किए गए 3 लाख से अधिक दवा सैंपलों में से 9,000 से अधिक घटिया गुणवत्ता की पाई गईं, और 951 नकली या मिलावटी निकलीं। वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा और अधिक गंभीर हो गया जब 3,104 दवाएं मानकों पर खरा नहीं उतर पाईं। यह समस्या मात्र एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति, नियामक ढांचे और नैतिक प्रतिबद्धता पर बड़ा सवालिया निशान है।

     

    दवाएं स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ होती हैं। यदि, कोई प्रणाली ही ऐसी दवाएं उपलब्ध कराए जो जीवनदायिनी के बजाय जीवन के लिए खतरा बन जाएं, तो वह स्वास्थ्य व्यवस्था विफल मानी जाएगी। राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि देश में दवा निगरानी प्रणाली या तो काफी कमजोर है या फिर उसमें जानबूझकर लापरवाही बरती जा रही है। नकली, मिलावटी या मानक से कमतर दवाएं किसी महामारी से कम नहीं हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, निम्न और मध्य आय वाले देशों में 10% से अधिक दवाएं घटिया या नकली होती हैं। भारत की स्थिति अब इस वैश्विक औसत से भी नीचे गिरती प्रतीत होती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत से कई देशों को दवाओं का निर्यात होता है। इस प्रकार, यहां की दवाओं की गुणवत्ता पर वैश्विक भरोसा भी दांव पर लग सकता है।

     

    साल 2024 में गृह मंत्रालय द्वारा दिल्ली सरकार के अस्पतालों में आपूर्ति की गई घटिया दवाओं की जांच सीबीआई को सौंपना इस संकट की संवेदनशीलता को दर्शाता है। उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने 2023 में जो सिफारिश की थी, वह केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं थी, बल्कि उसमें वास्तविकता की गहराई थी। मोहल्ला क्लीनिक, जिसे दिल्ली मॉडल की उपलब्धि के तौर पर प्रचारित किया गया, अब इसी संकट की जद में है। यदि, सचमुच इन संस्थानों के माध्यम से घटिया दवाएं वितरित की गईं, तो यह केवल धोखाधड़ी नहीं बल्कि एक तरह का जनस्वास्थ्य अपराध है।

     

    यह मामला यह भी इंगित करता है कि राज्य और केंद्र सरकारों के बीच राजनीतिक खींचतान का खामियाजा नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। दवा गुणवत्ता की समस्या को यदि राजनीतिक हथियार बनाकर पेश किया जाएगा, तो समाधान की दिशा और भी धुंधली हो जाएगी।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा दिसंबर 2022 से जोखिम आधारित निरीक्षण प्रणाली की शुरुआत एक सराहनीय कदम था, लेकिन इसके निष्कर्ष और भी चौंकाने वाले हैं। अब तक 905 दवा निर्माण इकाइयों का निरीक्षण किया गया, जिनमें से 694 के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी। यह आकंड़ा बताता है कि लगभग 77% दवा निर्माता किसी न किसी तरह से मानकों का उल्लंघन कर रहे थे। इस तरह की व्यापक लापरवाही केवल उद्योग के लालच का परिणाम नहीं हो सकती, बल्कि यह नियामक निकायों की अक्षमता और मिलीभगत की भी द्योतक है।

     

    ड्रग कंट्रोल अथॉरिटीज़ की जवाबदेही और निरीक्षण प्रक्रिया पर नए सिरे से पुनर्विचार आवश्यक है। भारत में दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली सबसे प्रमुख संस्था केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) का ढांचा अब पुराना और असमान हो गया है। स्टाफ की कमी, संसाधनों की अनुपलब्धता और भ्रष्टाचार इस संस्था की कार्यक्षमता को सीमित करते हैं।
    भारत में दवाओं का उत्पादन एक विशाल उद्योग है, जिसकी सालाना कमाई अरबों डॉलर में होती है, लेकिन इस लाभ की दौड़ में यदि कंपनियां गुणवत्ता से समझौता करें, तो इसका सीधा असर आम जनता के जीवन पर पड़ता है। निम्न गुणवत्ता वाली दवाएं या तो असर नहीं करतीं या फिर गंभीर दुष्प्रभाव उत्पन्न करती हैं। खासकर, ग्रामीण क्षेत्रों, झुग्गियों और निम्न आय वर्ग के मरीजों को इसका सबसे ज़्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है, क्योंकि वे सस्ती सरकारी दवाओं पर ही निर्भर होते हैं।

     

    यह भी देखा गया है कि कुछ मामलों में फार्मा कंपनियां जानबूझकर घटिया दवाएं बनाकर उन्हें सरकारी अस्पतालों के लिए सस्ते दरों पर बेचती हैं, ताकि टेंडर जीत सकें। ये कंपनियां यह मानती हैं कि गरीबों के जीवन का मूल्य कम होता है, और यही सोच इस संकट की जड़ है। भारत में नकली या घटिया दवाओं को लेकर दंड का प्रावधान है, लेकिन यह अक्सर इतना लचर होता है कि
    औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अंतर्गत अपराध सिद्ध होने पर अधिकतम दंड पांच साल की सजा या जुर्माना है, लेकिन दोष सिद्धि की दर बहुत कम है। इसके अलावा, जांच और अभियोजन की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि आरोपी अक्सर बच निकलते हैं। ऐसे में, यह जरूरी हो गया है कि सरकार इन कानूनों में संशोधन करे और उन्हें समयानुकूल बनाए। दवा गुणवत्ता से जुड़े मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना, लाइसेंस रद्द करने की अधिक शक्तिशाली प्रक्रिया और दोषी कंपनियों के निदेशकों को आपराधिक रूप से उत्तरदायी ठहराने जैसे कदम आवश्यक हो चुके हैं।

     

    प्रत्येक दवा की निर्माण से वितरण तक की प्रक्रिया को ब्लॉकचेन या अन्य डिजिटल तकनीक के ज़रिए ट्रैक किया जाना चाहिए ताकि मिलावट या गुणवत्ता में गड़बड़ी आसानी से चिन्हित की जा सके। सुप्रीम ऑडिट को बढ़ावा दिया जाए ताकि कंपनियां निरीक्षण की पूर्व-तैयारी नहीं कर सकें। आम लोगों के लिए शिकायत दर्ज करने की आसान प्रणाली होनी चाहिए जहाँ वे दवा की गुणवत्ता पर संदेह होने पर रिपोर्ट कर सकें। फार्मासिस्टों को भी इसके लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। फार्मा क्षेत्र से जुड़े कर्मियों, वैज्ञानिकों और प्रबंधकों के लिए मेडिकल एथिक्स की शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
    सीडीएससीओ जैसी संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करते हुए उन्हें स्वतंत्र और पेशेवर नेतृत्व सौंपा जाना चाहिए।

    कुल मिलाकर, दवाएं केवल उत्पाद नहीं होतीं, वे जीवन का दूसरा नाम हैं। यदि, देश की स्वास्थ्य प्रणाली में दवाओं की गुणवत्ता ही संदिग्ध हो जाए, तो यह न केवल नैतिक विफलता है, बल्कि एक गहरा सामाजिक अन्याय भी है। भारत जैसे देश, जो वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में नेतृत्व का दावा करता है, के लिए यह संकट न केवल आंतरिक बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख की चुनौती बन गया है। समय आ गया है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को चुनावी बयानबाजी से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखें। सरकार, नियामक संस्थाएं, दवा कंपनियां और नागरिक समाज, सभी को मिलकर यह तय करना होगा कि दवाओं की गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं होगा। वरना देश को न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य का नुकसान होगा, बल्कि उसकी वैश्विक पहचान भी दागदार होगी।

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