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    Home » नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की दायर चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करना कई मायनों में अहम
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    नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की दायर चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करना कई मायनों में अहम

    News DeskBy News DeskDecember 19, 2025No Comments6 Mins Read
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    नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की दायर चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करना कई मायनों में अहम
    देवानंद सिंह
    गत मंगलवार, 16 दिसंबर को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट का एक आदेश भारतीय राजनीति और क़ानूनी विमर्श के केंद्र में आ खड़ा हुआ। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा नेशनल हेराल्ड मामले में दायर की गई चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। तकनीकी रूप से यह एक प्रक्रिया संबंधी आदेश था, लेकिन क़ानून की व्याख्या से लेकर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक,
    इसके निहितार्थ दूरगामी हैं। इस आदेश के तुरंत बाद राजनीति के दोनों छोर सक्रिय हो गए। कांग्रेस पार्टी ने इसे एजेंसी के दुरुपयोग पर न्यायिक मुहर बताया, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने इसे महज़ एक तकनीकी बाधा करार देते हुए यह स्पष्ट किया कि इससे किसी को ‘क्लीन चिट’ नहीं मिली है, लेकिन इस शोर-शराबे के बीच असली सवाल कहीं और है, क्या मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराध में जांच शुरू करने की न्यूनतम कानूनी शर्तों का पालन किया गया था या नहीं?

     

     

    नेशनल हेराल्ड मामला औपचारिक रूप से 2013 में शुरू हुआ, जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली की एक निचली अदालत में शिकायत दर्ज की। उनका आरोप था कि कांग्रेस की शीर्ष नेतृत्व सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य ने एक सुनियोजित साज़िश के तहत ‘एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड’ (एजेएल) की लगभग 2000 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियों को महज़ 50 लाख रुपये में ‘यंग इंडियन’ नामक कंपनी को स्थानांतरित करवा दिया।

    एजेएल वही कंपनी है, जो कभी नेशनल हेराल्ड अख़बार का प्रकाशन करती थी। एक ऐसा अख़बार, जिसकी स्थापना देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने मामले को और अधिक राजनीतिक संवेदनशील बना दिया। डॉ. स्वामी ने अपनी शिकायत में धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र और विश्वासघात जैसे आरोप लगाए। अदालत ने 2014 में इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य आरोपियों को पेश होने का आदेश दिया। यह आपराधिक शिकायत आज भी अदालत में लंबित है।

     

     

    इस आपराधिक शिकायत के समानांतर, 2021 में प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले में एनफ़ोर्समेंट केस इन्फ़ॉर्मेशन रिपोर्ट दर्ज की। ईसीआईआर, पुलिस की एफआईआर के समान होती है, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया जाता।
    ईडी का तर्क था कि एजेएल-यंग इंडियन सौदे से अवैध तरीके से संपत्ति अर्जित की गई, जो मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के तहत अपराध की श्रेणी में आती है। इस जांच के बाद अप्रैल 2024 में ईडी ने राउज़ एवेन्यू कोर्ट में चार्जशीट दाख़िल की, जिसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, यंग इंडियन कंपनी, और उसके निदेशक सुमन दूबे व सैम पित्रोदा सहित कुल सात अभियुक्त बनाए गए। चार्जशीट दाख़िल होना और उस पर अदालत का संज्ञान लेना, ये दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। चार्जशीट जांच एजेंसी का निष्कर्ष होती है, जबकि संज्ञान अदालत का वह औपचारिक क़दम है, जिससे मुकदमे की सुनवाई शुरू होती है। यदि, अदालत संज्ञान लेने से मना कर दे, तो उस चार्जशीट के आधार पर मुकदमा आगे नहीं बढ़ सकता। राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने ठीक यही किया।

     

     

    अदालत के सामने सबसे अहम प्रश्न यह था कि क्या ईडी बिना किसी एफआईआर के मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू कर सकती है? अभियुक्तों की ओर से दलील दी गई कि पीएमएलए के तहत मनी लॉन्ड्रिंग की जांच तभी संभव है, जब पहले कोई ‘प्रेडिकेट ऑफ़ेंस’ यानी मूल अपराध एफआईआर के रूप में दर्ज हो और उसकी पुलिस जांच चल रही हो। इसके विपरीत, ईडी की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि चूंकि 2014 में अदालत ने डॉ. स्वामी की शिकायत का संज्ञान ले लिया था, इसलिए अलग से एफआईआर की आवश्यकता नहीं है।

     

    कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से ख़ारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि निजी शिकायत और पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में मौलिक अंतर होता है। पुलिस के पास जांच के अधिक व्यापक अधिकार और संसाधन होते हैं।
    पीएमएलए के तहत ईडी तभी कार्रवाई कर सकती है, जब किसी एजेंसी द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर जांच से अवैध आय का स्रोत सामने आए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि स्वयं ईडी की वार्षिक रिपोर्टें यह स्वीकार करती हैं कि एजेंसी आमतौर पर अन्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बाद ही मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू करती है।

     

     

    इस फैसले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अदालत ने ईडी के अपने आंतरिक पत्राचार और नोटिंग्स का हवाला दिया। कोर्ट के अनुसार, 2014 से 2021 के बीच कई स्तरों पर ईडी अधिकारियों की राय थी कि केवल डॉ. स्वामी की शिकायत के आधार पर पीएमएलए केस नहीं बनता। ईडी ने 2014 में सीबीआई को लिखे पत्र में भी यह माना था कि इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही संभव नहीं है। सीबीआई ने 11 वर्षों में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की। इसी ‘हिचकिचाहट’ के कारण ईडी ने भी 2021 तक ईसीआईआर दर्ज नहीं की। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जब स्वयं ईडी लंबे समय तक इस मामले में पीएमएलए लागू न होने की बात मानती रही, तो बाद में उसी आधार पर चार्जशीट दाख़िल करना प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

    ऐसे में, यह समझना बेहद ज़रूरी है कि अदालत ने यह नहीं कहा कि नेशनल हेराल्ड मामले में कोई घोटाला नहीं हुआ। अदालत ने आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की। कोर्ट का फैसला केवल इस सीमित प्रश्न पर था कि क्या मनी लॉन्ड्रिंग का मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया? उत्तर था—नहीं। दिलचस्प बात यह है कि अक्टूबर 2024 में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने इस मामले में एक एफआईआर दर्ज की है। इससे ईडी को सैद्धांतिक रूप से नया आधार मिल सकता है। हालांकि, अदालत में एसवी राजू ने साफ़ किया कि यह नई एफआईआर मौजूदा चार्जशीट से जुड़ी नहीं है। कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ईडी इस नई एफआईआर के आधार पर फिर से ईसीआईआर दर्ज करती है, तो अदालत को यह तय करना होगा कि क्या यह डबल जियोपर्डी का मामला बनेगा, यानी एक ही अपराध के लिए बार-बार मुकदमा।

     

     

    कांग्रेस इसे नैतिक और राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर रही है, जबकि बीजेपी इसे अस्थायी राहत बता रही है, लेकिन इन दावों के बीच असली सवाल संस्थागत है कि क्या जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव से मुक्त हैं?
    क्या कानून का इस्तेमाल प्रक्रिया के भीतर रहकर हो रहा है? और क्या अदालतें अब एजेंसियों से अधिक सख़्त प्रक्रिया-पालन की अपेक्षा कर रही हैं? राउज़ एवेन्यू कोर्ट का यह आदेश संकेत देता है कि न्यायपालिका अब ‘नियत’ नहीं, बल्कि ‘प्रक्रिया’ को निर्णायक मान रही है।
    कुल मिलाकर, नेशनल हेराल्ड मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की मूल शिकायत पर मुकदमा जारी है। ईडी हाईकोर्ट जा सकती है। नई एफआईआर पर नई जांच संभव है, लेकिन इस फैसले ने एक बुनियादी सिद्धांत स्थापित कर दिया है कि क़ानून की लड़ाई में शॉर्टकट नहीं चलेंगे, चाहे मामला कितना ही राजनीतिक क्यों न हो। यही इस फैसले की सबसे बड़ी विरासत है।

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