महिला वोट, कल्याण योजनाएं और सत्ता की लड़ाई: बंगाल में ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत
देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। 2026 के विधानसभा चुनाव में अभी भले ही एक साल से अधिक का वक्त हो, लेकिन राजनीतिक दलों की सक्रियता बता रही है कि मुकाबला बेहद कड़ा होने वाला है। खासकर तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर तय मानी जा रही है। इस पूरे परिदृश्य में यदि किसी एक कारक ने ममता बनर्जी को लगातार सत्ता में बनाए रखा है, तो वह है—महिला मतदाताओं पर उनकी मजबूत पकड़।
ममता बनर्जी ने सत्ता में रहते हुए यह भली-भांति समझ लिया कि बंगाल की राजनीति में महिला वोट निर्णायक भूमिका निभा सकता है। कन्याश्री, रूपश्री, लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने सीधे महिलाओं के खातों तक सरकार की मौजूदगी दर्ज कराई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब तीन करोड़ महिलाएं किसी न किसी योजना की लाभुक हैं, जो अपने आप में एक बड़ा वोट बैंक है। यही वजह है कि भ्रष्टाचार, संगठनात्मक कमजोरी और सत्ता-विरोधी माहौल के बावजूद टीएमसी चुनाव जीतने में कामयाब होती रही है।
नए साल में यदि ममता बनर्जी महिलाओं के लिए कुछ और आकर्षक योजनाओं की घोषणा करें, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बिहार में महिलाओं के खातों में सीधे 10 हजार रुपये भेजने जैसी घोषणाओं का राजनीतिक असर वे देख चुकी हैं। चुनावी साल में ‘डायरेक्ट बेनिफिट’ राजनीति का आजमाया हुआ फार्मूला बन चुका है।
हालांकि, इस बार ममता की राह पहले जैसी आसान नहीं है। भाजपा का बंगाल में बढ़ता कद उनकी सबसे बड़ी चिंता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का 77 सीटों तक पहुंचना यह संकेत था कि बंगाल की राजनीति अब एकध्रुवीय नहीं रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लगातार दौरे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भाजपा बंगाल को लेकर बेहद गंभीर है। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में मिली चुनावी सफलताओं से भाजपा का मनोबल ऊंचा है और वह उसी लय को बंगाल में भी कायम रखना चाहती है।
दूसरी ओर, वाम दल और कांग्रेस लगभग हाशिये पर चले गए हैं। कभी तीन दशक तक बंगाल पर राज करने वाला वाम मोर्चा आज राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होता दिख रहा है। कांग्रेस की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। AIMIM, ISF या नई क्षेत्रीय पार्टियां जरूर मैदान में होंगी, लेकिन फिलहाल उनमें टीएमसी या भाजपा को सीधी चुनौती देने की क्षमता नहीं दिखती।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कल्याणकारी राजनीति और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। सरकारी पैसों की कथित लूट, घोटालों और तुष्टिकरण के आरोपों ने टीएमसी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। बावजूद इसके, महिला मतदाताओं का भरोसा अब भी ममता के साथ बना हुआ है—ठीक उसी तरह, जैसे बिहार में नीतीश कुमार ने महिलाओं के बीच अपनी मजबूत पैठ बनाई थी।
2026 का बंगाल चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि महिला वोट बनाम उभरती भाजपा का मुकाबला होगा। यदि ममता बनर्जी महिलाओं के भरोसे को और मजबूत करने में सफल रहीं, तो टीएमसी एक बार फिर सत्ता की हैट्रिक लगा सकती है। लेकिन यदि भाजपा महिला वोट में सेंध लगाने में कामयाब हो गई, तो बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर भी संभव है।

