तीन से 403 तक: अखिलेश के सामने असली सवाल
देवानंद सिंह
राजनीति में संख्याएं कभी झूठ नहीं बोलतीं। बयान बदल सकते हैं, रणनीतियां बदली जा सकती हैं और राजनीतिक नैरेटिव भी बदले जा सकते हैं, लेकिन सदन का गणित अपनी जगह कायम रहता है। उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के तीसरे उम्मीदवार को लेकर जिस तरह कई दिनों तक सियासी माहौल बनाया गया और फिर अंतिम समय में कदम पीछे खींच लिए गए, उसने अखिलेश यादव की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब कहा जा रहा है “निगाह तीन पर नहीं, 403 पर है।”
बेशक 2027 का विधानसभा चुनाव राज्यसभा की एक सीट से कहीं बड़ा राजनीतिक लक्ष्य है। सत्ता की असली लड़ाई विधानसभा की 403 सीटों पर ही होगी। लेकिन राजनीति में सवाल केवल यह नहीं होता कि आगे का लक्ष्य कितना बड़ा है; सवाल यह भी होता है कि पिछले मोर्चे पर जो दावा किया गया था, उसका हश्र क्या हुआ।
तीसरी सीट को लेकर सपा ने ऐसा माहौल बनाया कि मानो उसके पास भाजपा को चुनौती देने के लिए कोई बड़ा राजनीतिक गणित मौजूद है। पार्टी के नेताओं के दावे, संभावित उम्मीदवार और नामांकन की तैयारियों की चर्चाओं ने इस धारणा को मजबूत किया। लेकिन जब निर्णायक क्षण आया तो तीसरा उम्मीदवार सामने नहीं आया।
यहीं से राजनीति का असली सवाल शुरू होता है।
यदि संख्या बल पर्याप्त नहीं था तो शुरुआत से ही यह बात साफ क्यों नहीं की गई? और यदि तीसरे उम्मीदवार के जरिए भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति थी, तो क्या उस रणनीति की कीमत पार्टी की राजनीतिक विश्वसनीयता नहीं है?
अखिलेश यादव का पीछे हटना पूरी तरह गलत फैसला था, ऐसा कहना भी जल्दबाजी होगी। चुनावी राजनीति में ऐसी लड़ाई से बचना, जिसमें जीत की संभावना कम और संगठन को नुकसान की आशंका अधिक हो, समझदारी हो सकती है। क्रॉस वोटिंग का खतरा हो, विधायकों में असंतोष पैदा होने की आशंका हो और चुनाव परिणाम पहले से लगभग स्पष्ट हो, तो राजनीतिक दल अपने संसाधन बचाने का फैसला कर सकता है।
लेकिन समझदारी तभी रणनीति बनती है, जब उसका राजनीतिक संचार भी उतना ही स्पष्ट हो।
तीन से सीधे 403 पर पहुंचने की घोषणा इसलिए थोड़ी असहज करती है, क्योंकि जनता के सामने दोनों के बीच का पुल दिखाई नहीं देता। राज्यसभा का चुनाव भले छोटा पड़ाव हो, लेकिन उसी में नेतृत्व की निर्णय क्षमता, संगठन पर पकड़ और राजनीतिक गणित की समझ की झलक मिलती है।
और यही बात 2027 को लेकर सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को चुनौती देना केवल सत्ता विरोधी भावना पर निर्भर नहीं करेगा। सपा को संगठन मजबूत करना होगा, बूथ स्तर तक अपनी मौजूदगी बढ़ानी होगी, सामाजिक समीकरणों को साधना होगा और सहयोगी दलों के साथ तालमेल बनाए रखना होगा। सबसे महत्वपूर्ण यह कि उसे अपने समर्थक वर्ग से आगे निकलकर उन मतदाताओं तक पहुंचना होगा जो अभी उसके साथ नहीं हैं।
403 सीटों की बात करना आसान है, 403 सीटों की जमीन तैयार करना कठिन।
अखिलेश यादव के सामने अब यही असली परीक्षा है। राज्यसभा की तीसरी सीट से पीछे हटना इतिहास नहीं बनेगा, लेकिन यदि 2027 की तैयारी में संगठन कमजोर रहा तो यही घटना उनकी राजनीतिक शैली की एक बड़ी मिसाल बन सकती है—दावा बड़ा, लेकिन जमीन पर गणित कमजोर।
इसलिए अखिलेश को आलोचना से घबराने की जरूरत नहीं, बल्कि उससे सीखने की जरूरत है। भाजपा के खिलाफ लड़ाई केवल आरोपों और नारों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए लगातार संगठनात्मक मेहनत, सही उम्मीदवार, व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और स्पष्ट राजनीतिक रणनीति चाहिए।
राजनीति में रण छोड़ना अपराध नहीं है, लेकिन रण छोड़ने के बाद अगली लड़ाई जीतने की तैयारी न करना जरूर राजनीतिक भूल है।
अब गेंद अखिलेश यादव के पाले में है।
राज्यसभा का तीन का अंक पीछे छूट गया।
403 का सपना अब घोषणा नहीं, परीक्षा है और इस परीक्षा में फैसला राजनीतिक बयान नहीं, उत्तर प्रदेश की जनता करेगी।

