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    स्वदेशी एवं स्वावलम्बन ही नये भारत का आधार

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीOctober 4, 2025No Comments7 Mins Read
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    – ललित गर्ग –
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना महोत्सव यानी प्रत्येक वर्ष विजयदशमी के अवसर पर संघ प्रमुख का उद्बोधन एक नए संदेश और नये दृष्टिकोण के साथ सामने आता है, इस उद्बोधन का पूरा राष्ट्र इंतजार करता है। इस बार संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कई ऐसी बातें कहीं, जो सरकार के साथ समाज के लोगों का ध्यान खींचने वाली हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि उन्होंने अपने संबोधन में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से भारत पर थोपे गए टैरिफ की चर्चा की। 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारत के समक्ष जो कठिन चुनौती खड़ी कर दी है, उसका प्रभावी ढंग से सामना स्वदेशी और स्वावलंबन की राह पर चलकर ही किया जा सकता है। भागवत ने संबोधन में स्वदेशी और स्वावलंबन को नए भारत का आधार बताया है। उन्होंने कहा कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में परस्पर निर्भरता एक स्वाभाविक स्थिति है, लेकिन यह निर्भरता कभी भी बंधन या मजबूरी में परिवर्तित नहीं होनी चाहिए। भारत को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा ताकि विदेशी निर्णयों और नीतियों पर हमारी नियंत्रण क्षमता सीमित न हो जाए। उनका कहना था कि स्वदेशी का अर्थ यह नहीं है कि हम दुनिया से कट जाएं, बल्कि यह है कि हम अपनी शर्तों पर और अपनी आवश्यकताओं के अनुसार संबंध बनाएं।

     

    संघ की स्थापना का यह अवसर केवल एक उत्सव मात्र नहीं था, बल्कि यह आयोजन भारत की आत्मा और उसके भविष्य की एक गहन घोषणा थी। भागवत ने स्पष्टता और गंभीरता से अपने विचार रखे, भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में एक नया क्षितिज भी उद्घाटित किया। यह आयोजन संघ के सौ वर्ष सम्पूर्णता की साधना का मूल्यांकन ही नहीं, बल्कि आने वाले सौ वर्षों की दिशा का भी उद्घोष था। नई इबारत लिखते हुए भागवत ने स्पष्ट कहा कि संघ की कार्यप्रणाली का सार है, नए मनुष्य एवं सशक्त-स्वावलम्बी भारत का निर्माण। यह विचार सुनने में सरल लग सकता है, किंतु इसके निहितार्थ अत्यंत गहरे हैं। समाज और राष्ट्र की सारी समस्याओं का मूल व्यक्ति के भीतर छिपा है। इसीलिये देश के सभी वर्गों को एकसूत्र में जोड़ने के संकल्प के साथ संघ आगे बढ़ेगा क्योंकि जब तक व्यक्ति का चरित्र, दृष्टि और आचरण नहीं बदलते, तब तक कोई भी व्यवस्था स्थायी रूप से परिवर्तित नहीं हो सकती। संघ व्यक्ति-निर्माण के माध्यम से समाज और राष्ट्र को बदलने की दीर्घकालिक साधना कर रहा है। यही कारण है कि संघ के कार्य का परिणाम केवल शाखाओं या कार्यक्रमों में नहीं मापा जा सकता, बल्कि उस अदृश्य लेकिन ठोस नैतिक शक्ति एवं सशक्त राष्ट्रीय भावना में देखा जा सकता है, जो धीरे-धीरे समाज की दिशा बदल रही है।

     

    भागवत ने स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवन मूल्यों से भी जुड़ी हुई है। उन्होंने विविधता को भारत की विशेषता बताया और समाज में विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर चेताया। उन्होंने पंच परिवर्तन की संकल्पना भी प्रस्तुत की जिसमें आत्मजागरूकता, पारिवारिक मूल्य, नागरिक अनुशासन और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता को जोड़ा गया है। इस संदेश के सकारात्मक पक्ष अनेक हैं। यदि इसे गंभीरता से अपनाया जाए तो यह देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को नई दिशा दे सकता है। स्थानीय उद्योगों, हस्तशिल्प और कृषि को बढ़ावा देने से रोजगार का सृजन होगा और आर्थिक आत्मसम्मान मजबूत होगा। स्वदेशी पर बल देने से विदेशी निर्भरता घटेगी और देश की सुरक्षा व नीति संबंधी स्वतंत्रता बढ़ेगी। यदि समाज के स्तर पर भी इस सोच को अपनाया जाए तो उपभोक्तावाद के स्थान पर संवेदनशीलता और सेवा भाव विकसित होगा। विविधता के सम्मान और सामाजिक सद्भाव के आग्रह से राष्ट्र अधिक एकजुट और शक्तिशाली बन सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जिस आत्मनिर्भर भारत का आह्वान कर रहे हैं, उसका मूल उद्देश्य केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। यह संदेश देश की घरेलू क्षमताओं को सशक्त बनाने, आयात पर निर्भरता घटाने और स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ विकास की दिशा को व्यापक सामाजिक सरोकारों से भी जोड़ता है, जिसमें महात्मा गांधी की ‘स्वदेशी अपनाओ’ और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ की परिकल्पना स्पष्ट तौर पर समाहित है।

     

    स्वदेशी और स्वावलंबन की राह पर चलकर ही नया भारत-सशक्त भारत का निर्माण किया जा सकता है। इस बात को सरकार भी रेखांकित कर चुकी है और अब संघ प्रमुख ने भी दोहरा दिया। यह समय की मांग है कि स्वदेशी और स्वावलंबन पर तब तक बल दिया जाए, जब तक वांछित सफलता न मिल जाए। जहां सरकार को स्वदेशी की राह को आसान करना होगा, वहीं समाज को सहयोग देने के लिए तत्पर रहना होगा। इस उम्मीद में नहीं रहा जाना चाहिए कि अमेरिका के साथ शीघ्र ही आपसी व्यापार समझौता हो जाएगा। एक तो जब तक ऐसा हो न जाए तब तक चैन से नहीं बैठा जा सकता और दूसरे, यदि ऐसा हो जाए तो भी भारत को स्वदेशी और स्वावलंबन की राह पर चलना छोड़ना नहीं चाहिए। व्यापारिक साझेदारों पर निर्भरता लाचारी में नहीं बदलनी चाहिए। वास्तव में इस स्थिति से बचने का ही उपाय है स्वदेशी उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना। परंतु इस संदेश के साथ कई चुनौतियां और सीमाएं भी जुड़ी हुई हैं। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था इतनी आपस में गुँथी हुई है कि किसी भी देश का पूर्ण स्वावलंबन व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। अनेक तकनीकें और कच्चे माल अब भी हमें विदेशों से ही प्राप्त करने होते हैं। यदि स्वदेशी को बढ़ावा देने के नाम पर विदेशी व्यापार पर प्रतिबंध या अधिक शुल्क लगाए जाते हैं तो यह व्यापार युद्ध और आर्थिक तनाव को जन्म दे सकता है। इस संदेश की सफलता केवल भाषणों और भावनात्मक नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि ठोस नीतियों, बजट, शोध और योजनाओं के आधार पर इसे अमल में लाना होगा।
    सामाजिक दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि स्वदेशी और स्वावलंबन का नारा केवल एक सांस्कृतिक या राजनीतिक रंग में न ढल जाए। यह तभी कारगर होगा जब इसे हर वर्ग, हर धर्म और हर क्षेत्र का साझा लक्ष्य बनाया जाएगा। नागरिकों की आदतों और व्यवहार में बदलाव लाना आसान नहीं है, लेकिन यदि यह बदलाव शिक्षा, प्रोत्साहन और जनचेतना के माध्यम से लाया जाए तो यह नारा समाज में गहरी जड़ें जमा सकता है। संघ प्रमुख का यह संदेश नए भारत की दिशा में प्रेरणा का स्रोत है। यह हमें बताता है कि हमें अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति पर गर्व करना चाहिए, वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से सशक्त होना चाहिए और विश्व के साथ संवाद स्थापित करते हुए भी अपनी स्वायत्तता को बनाए रखना चाहिए। किंतु इसके लिए आलोचनात्मक विवेक, व्यावहारिक सोच और निरंतर समीक्षा की आवश्यकता है। आज विभिन्न देशों की परस्पर मित्रता का आधार अपने-अपने आर्थिक-कूटनीतिक हित हैं। इन स्थितियों में सर्वोत्तम उपाय स्वदेशी को बल देते हुए देश को आत्मनिर्भर बनाना है।

     

    आज की वैश्विक परिस्थितियों पर दृष्टि डालें तो भागवत के विचार और भी प्रासंगिक हो उठते हैं। दुनिया हिंसा, आतंकवाद, युद्ध और उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ से त्रस्त है। पर्यावरण संकट दिन-प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। मानसिक तनाव और आत्मकेंद्रित जीवन-शैली ने मानव को भीतर से खोखला कर दिया है। इन परिस्थितियों में भारत ही वह देश है, जो एक वैकल्पिक जीवन-दर्शन दे सकता है। भारत के पास भौतिक विकास के साथ-साथ आध्यात्मिक समृद्धि की धरोहर है। यही धरोहर भारत को विश्वगुरु बनने की पात्रता प्रदान करती है। संघ की शताब्दी वर्ष की सम्पूर्णता का उद्घोष केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश और विश्व के लिए एक संदेश है। यह संदेश है- स्वावलम्बी एवं स्वदेशी भावना को बदल देना, नए मनुष्य का निर्माण करना, गरीब को उठाना, धर्मों को जोड़ना, समाज में समरसता स्थापित करना और हिंदुत्व की व्यापक जीवन दृष्टि के आधार पर विश्व को दिशा देना। यह केवल भाषण नहीं, बल्कि एक संकल्प है

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