नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें उसने दिल्ली हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में एक बाल यौन शोषण पीड़िता की पहचान बताने वाली जानकारी दिखाकर उसकी निजता का उल्लंघन करने के लिए टीवी टुडे नेटवर्क के खिलाफ 5 लाख रुपये के हर्जाने को बरकरार रखा था.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने मामले में सुनवाई की. सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने कहा, प्रेस (मीडिया) अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) में योगदान देने के अलावा और क्या करता है? जब आपका इंटरनेट बंद कर दिया जाएगा, तो आप यह कहते हुए आएंगे कि लोगों के अनुच्छेद 19(1)(a) के मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है. प्रेस का गला घोंटा जा रहा है और जब आप ऐसा प्रकाशन करते हैं जिसके लिए आपके गैर-जिम्मेदाराना और संवैधानिक कृत्य का हर्जाना तय किया जाता है, तो यह तर्क दिया जाता है कि यह कोई सार्वजनिक कार्य नहीं है. न्यायाधीश ने आगे कहा कि संप्रभु और सार्वजनिक कार्य के बीच अंतर होता है.
सुप्रीम कोर्ट ने प्रसारक की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि मीडिया सार्वजनिक कार्य करता है और इसलिए उसे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के अधीन किया जा सकता है. प्रसारक के वकील ने दलील दी, एक बड़ा सवाल यह है कि क्या एक प्रेस के रूप में यह कहा जा सकता है कि मैंने एक सार्वजनिक कार्य किया है, ताकि रिट याचिका पर विचार किया जा सके…? वकील ने जोर देकर कहा कि अब मुझे अनुच्छेद 226 की कठिन प्रक्रिया से गुजरना होगा.
सीजेआई ने कहा, आपको इसके बजाय गर्व से यह कहना चाहिए कि आप सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक कर्तव्य निभाते हैं, वह है इस देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार की गारंटी और उसे लागू करना. फिर आपको क्यों संकोच करना चाहिए और इसके विपरीत केवल बचाव के रूप में यह तर्क देना चाहिए कि आप ऐसा नहीं करते.
वकील ने कहा कि अन्य मीडिया कंपनियों को पहले ही बरी किया जा चुका है. जस्टिस बागची ने टिप्पणी की, हमारे दिमाग में केवल यही बात थी कि उसने आपके खिलाफ मामला आगे बढ़ाया है. कारण यह है कि जब उसने अनुरोध किया था, तो वह प्रकाशन में शामिल नहीं होना चाहती थी… आपने आगे बढ़कर प्रकाशन कर दिया. पीठ ने वकील से कहा, अगर आप चाहते हैं कि आपकी तरफ से कोई प्रार्थना की जाए, तो हम बस इतना कह सकते हैं कि इस राशि को आपकी ओर से एक छोटा सा स्वैच्छिक दान माना जाना चाहिए. वकील ने कहा कि वह दान के पहलू पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे थे और इस बात पर जोर दिया कि एक बड़ा मुद्दा है और इससे ऐसे मामलों की बाढ़ सी आ जाएगी. पीठ ने कहा, ऐसा होना चाहिए. हम इसे बढ़ावा देते हैं… (हाई कोर्ट के आदेश में) दखल देने का कोई आधार नहीं दिखता.

