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    Home » कहानी : गोदना ( टैटू )
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    कहानी : गोदना ( टैटू )

    News DeskBy News DeskJune 3, 2025No Comments5 Mins Read
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    ( सत्य घटना पर आधारित )

    डॉ .क्षमा पाटले “अनंत ”
    अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार एवं
    समाज सेवी, छत्तीसगढ़

    कविता एक पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई महिला थी । गांव में उसकी अच्छाई और गुणों की खूब चर्चा रहती थी । सिंपल और सादगी पूर्ण जीवन जीने वाली कविता हमेशा दूसरों की मदद करती थी । खास कर महिलाओं की । गांव में कुछ महिलाएं कविता के पास अपनी समस्या लेकर आ जाती थीं । कविता जिसका बखूबी निदान किया करती थी । कुछ महिलाएं अपने सास- ससुर से घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की शिकायतें लेकर आ जाती थीं । तो कुछ अपने बेटा बहु का ही रोना रोती थी । कविता संवैधानिक रूप से दोनों पक्षों को सलाह मशवरा देकर घर पर ही सुलह करवा दिया करती थी । न कोर्ट कचहरी का चक्कर न वकीलों को मोटी फीस देना का झंझट । कविता हर तरह की समस्या को घर पर ही सुलझा देती थी । कुछ लोगों को इमरजेंसी रूपये पैसों की भी जरूरत पड़ जाती थी। तो कविता अपने पति को बोलकर उन्हें पैसे भी दिलवा देती थी । इसी तरह कविता लोगों की नेकी भलाई में लगी रहती थी । कविता को लडाई झगडे पसंद नहीं थे । वह शांति प्रिय महिला थी । लोगों को भी आपस में प्रेम पूर्वक रहने की सलाह दिया करती थी । एक दिन कविता अपने दुकान में बैठी थी । पड़ोस की एक अधेड़ उम्र की महिला उसके दुकान पर आई । कविता ने उसे प्रणाम किया । बैठने के लिए कुर्सी दी । रिश्ते में वह महिला कविता की बुआ सास लगती थी । बुआ सास ने पूंछा तुमने घर का काम कर लिया बेटी ? कविता ने उत्तर दिया । हां बुआ जी । मेरे घर में सब्जी नहीं है । खाना बना लिया होगा , तो थोड़ी सब्जी मुझे भी दे देना । बुआ ने कहा । कविता बोली ‘ हां बुआ जी ! सब्जी बन चुकी है । मैं लाती हूं आप जरा बैठिए । कविता जैसे ही भीतर जाने के लिए कुर्सी से उठी है । बुआ ने अचानक उसे रोकते हुए कहा । रुक तो – रूक तो । हाथ पैर देखते हुए । क्या तुमने गोदना नहीं गुदवाया है अब तक ? तुम्हारे हाथ पैर में कहीं पर भी गोदने का निशान नहीं है । चेहरे पर भी एक मुठकी (बिंदु)तक नहीं गुदवाई । कविता ने उत्तर दिया । नहीं बुआ जी मेरे शरीर में कहीं पर भी गोदने का निशान नहीं है । मैंने गुदवाई ही नहीं है । बुआ ने कहा क्यों नहीं गुदवाई ? बेटी जरूर गुदवा लेना । मरने के बाद जो लोग गोदना नहीं गुदवाये रहते । ऊपर स्वर्गलोक में भगवान और यमराज खुद उन्हे शाबर से ( जमीन खोदने वाले लोहे के औजार से ) बड़ा – बड़ा गोदना गोदते हैं । तभी स्वर्ग में जगह मिलती है । गोदने का निशान न मिलने पर तरह – तरह के कष्ट देते हैं । खौलते तेल मे डुबाते हैं । आग में नंगे पैर चलाते हैं । कांटों में सुलाते हैं । तुम बहुत नेक दिल हो , सबकी मदद करती हो । बूरी मौत न मिले इसलिए बोल रही हूं । गुदना गुदवा ही लेना । उपर से तुम इतनी गोरी हो । कि चक से दिख जायेगा , कि शरीर में कहीं गोदने का निशान नहीं है । गोदना गुदवा ही लेना । मरते समय जल्दी मुक्ति मिल जायेगी । जीव को कहीं भटकना नहीं पड़ेगा । कविता मुस्कुराते हुए बोली । क्या बुआ जी ,,,, आप भी । समझाते हुए बोली । ऐसा कुछ नहीं होता । आप सभी की दुआएं मेरे साथ है । मैं इज्जत की मौत मरूंगी । स्वर्ग नरक को किसने देखा है ?? किसी ने नहीं ! जिंदा व्यक्ति स्वर्ग जा नहीं सकता ! और मरा हुआ व्यक्ति स्वर्ग से आकर कुछ बता नहीं सकता । फिर मैं कैसे मान लूं । कि कोई स्वर्ग – नरक भी है ।‌ जो लोग गोदना गुदवाते हैं । या तो वो सुन्दर दिखने के लिए गुदवाते हैं । या स्वर्ग नरक के डर से । न तो मुझे सुन्दर दिखने का शौक है । न ही मुझे स्वर्ग नरक का डर है । फिर मैं गोदना क्यों गुदवाऊं ? मैं इन सब चीजों पर विश्वास नहीं करती । जो भी है इसी धरती पर है । ऊपर तो सिर्फ सूर्य , चंद्रमा, तारे और विभिन्न ग्रह मात्र हैं । आपको किसने कह दिया । कि गोदना गुदवाने से जीव को स्वर्ग मिलता है ? मां के मुंह से सुनना था । बुआ ने उत्तर दिया ‌ । और मां को किसने बताया था ? कविता ने फिर से मुस्कुराते हुए बुआ से सवाल पूछा । बुआ ने उत्तर दिया मां को एक बहुत बड़े पंडित ने बताया था । कि शास्त्रों में ऐसा लिखा है। शास्त्र तो स्वयं भगवान ने लिखा है बोलकर । कविता ने फिर मुस्कुराते हुए कहां । मां ने शास्त्र उठाकर खुद पढ़कर देखा या नहीं ? बुआ बोली । उस समय कहां बेटी,,,, सिर्फ पंडित लोग ही पढ़ें लिखे थे । बाकी सब तो अनपढ़ ही थे । अभी – अभी तो लोग इतना पढ़ लिख रहे हैं । कविता ने हंसकर कहा । इस बार अगर कोई पंडित ऐसा बोले गोदना वाली बात । तो सीधा मेरे पास भेजिये । अब विज्ञान इतनी तरक्की कर चुका है । कि हम स्वयं अंतरिक्ष यान से ऊपर जाकर देख सकते हैं । कि ऊपर क्या है और क्या नहीं । मैं देख परख कर पूरी तसल्ली करने के बाद ही गोदना गुदवाऊंगी बुआ जी । अगर मेरा मन हुआ तो । इतना बोलकर कविता हंसते हुए अंदर चली गई । कविता भीतर से कटोरी भर सब्जी लाई और बुआ को दे दिया । बुआ सब्जी लेकर अपने घर चली गई । कविता को उस पंडित के आने का इंतजार था । जिसने बुआ की मां से यह बात कही थी । सालों साल बीत गए । लेकिन न कोई पंडित उसके दरवाजे पर आया न कविता का इंतजार खत्म हुआ।

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