
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्रा ने वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। यूएई से लेकर इटली तक फैली इस कूटनीतिक सक्रियता ने यह संकेत दिया है कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक ढांचे का निर्णायक भागीदार बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। खासकर रोम में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता और इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को लेकर बढ़ती सहमति ने चीन और पाकिस्तान दोनों की बेचैनी बढ़ा दी है।
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम केवल एक व्यापारिक कॉरिडोर का मामला नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के पुनर्गठन का संकेत भी है। चीन वर्षों से अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए दुनिया में आर्थिक प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम करता रहा है। एशिया, अफ्रीका और यूरोप में अरबों डॉलर के निवेश के माध्यम से उसने अपनी आर्थिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन अब भारत ने IMEC के रूप में ऐसा विकल्प सामने रखा है, जो पारदर्शिता, बहुपक्षीय साझेदारी और संतुलित आर्थिक सहयोग का दावा करता है। यही कारण है कि बीजिंग की बेचैनी अब उसके सरकारी मीडिया और थिंक टैंकों के बयानों में साफ दिखाई देने लगी है।
चीन को सबसे बड़ा झटका इटली के बदलते रुख से लगा है। कभी BRI से जुड़ने वाला पहला G7 देश अब भारत और यूरोप-केंद्रित आर्थिक ढांचे की ओर झुकाव दिखा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की रोम यात्रा ने यह संदेश दिया कि नई दिल्ली अब यूरोप के साथ केवल व्यापारिक संबंध नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी विकसित कर रही है। चीन के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि दुनिया अब “चाइना प्लस वन” नीति की ओर बढ़ रही है और भारत इस विकल्प के केंद्र में उभरता दिखाई दे रहा है।
दूसरी ओर पाकिस्तान की बेचैनी भी स्वाभाविक मानी जा सकती है। वर्षों तक अपनी भौगोलिक स्थिति को रणनीतिक ताकत बताने वाला पाकिस्तान अब यह महसूस कर रहा है कि IMEC जैसे नए कॉरिडोर उसकी अहमियत को कम कर सकते हैं।
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) पहले ही सुरक्षा संकट, भ्रष्टाचार और कर्ज के बोझ से जूझ रहा है। ऐसे में यदि भारत खाड़ी देशों और यूरोप के साथ नया व्यापारिक नेटवर्क स्थापित करने में सफल होता है, तो पाकिस्तान क्षेत्रीय व्यापार मानचित्र में हाशिये पर जा सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी मीडिया में भी अब भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को स्वीकार करने की मजबूरी दिखाई दे रही है। वहां के कई विश्लेषक खुलकर मान रहे हैं कि भारत ने आर्थिक कूटनीति, निवेश और वैश्विक साझेदारी के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की है, जबकि पाकिस्तान आज भी आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से बाहर नहीं निकल पाया है। खाड़ी देशों का झुकाव भी अब स्पष्ट रूप से भारत की ओर दिखाई देता है, जो कभी पाकिस्तान के सबसे करीबी साझेदार माने जाते थे।
वास्तव में भारत की यह नई विदेश नीति केवल सामरिक विस्तार नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मविश्वास का प्रतीक भी है। नई दिल्ली अब वैश्विक सप्लाई चेन, इंफ्रास्ट्रक्चर और रणनीतिक व्यापार मार्गों में अपनी केंद्रीय भूमिका तय करने की कोशिश कर रही है। यही कारण है कि चीन इसे अपने आर्थिक प्रभाव के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है और पाकिस्तान खुद को बदलते भू-राजनीतिक नक्शे में असहज महसूस कर रहा है।
रोम से उठी यह नई रणनीतिक धुरी आने वाले समय में विश्व व्यापार और कूटनीति की दिशा तय कर सकती है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपनी आर्थिक क्षमता, राजनीतिक स्थिरता और कूटनीतिक संतुलन के दम पर वैश्विक मंच पर स्थायी प्रभाव स्थापित करे। वहीं चीन और पाकिस्तान के लिए यह संकेत भी है कि बदलती दुनिया में केवल भूगोल नहीं, बल्कि भरोसा, आर्थिक शक्ति और साझेदारी की विश्वसनीयता ही सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।

