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    Home » आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में छोटे उद्योग और आम उपभोक्ता अहम
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    आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में छोटे उद्योग और आम उपभोक्ता अहम

    News DeskBy News DeskAugust 28, 2025No Comments7 Mins Read
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    आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में छोटे उद्योग और आम उपभोक्ता अहम
    देवानंद सिंह
    इस महीने की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा वादा किया, जिसने देश के करोड़ों छोटे कारोबारियों, दुकानदारों और उद्यमियों में नई उम्मीदें जगा दीं। प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि आने वाले समय में छोटे कारोबारियों को बड़े पैमाने पर कर छूट (टैक्स रिलीफ) दी जाएगी। इसे उन्होंने दीपावली का तोहफ़ा बताते हुए यह संदेश दिया कि देश की अर्थव्यवस्था का असली आधार छोटे उद्योग और आम उपभोक्ता हैं, जिन्हें मजबूत बनाए बिना भारत की विकास यात्रा अधूरी है।

     

    लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री का यह आह्वान केवल प्रतीकात्मक भाषण नहीं था। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत अभियान से जोड़ा और व्यापारियों, दुकानदारों व उद्यमियों से अपील की कि वे गर्व के साथ स्वदेशी और मेड इन इंडिया को अपनाएं। प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें आत्मनिर्भर बनना है, लेकिन हताशा से नहीं, बल्कि गर्व से। दुनिया भर में आर्थिक स्वार्थ बढ़ रहे हैं, ऐसे में हमें अपनी मुश्किलों का रोना नहीं रोना चाहिए, बल्कि दूसरों की पकड़ से बचकर खुद को सशक्त बनाना चाहिए।

     

    प्रधानमंत्री मोदी ने बीते सप्ताह में कम से कम दो सार्वजनिक मंचों पर यही विचार दोहराए। विश्लेषकों का मानना है कि यह रुख सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 50 प्रतिशत टैरिफ़ निर्णय का जवाब है। अमेरिका ने हाल ही में भारतीय निर्यात पर भारी शुल्क लगाया है, जिससे वस्त्र, झींगा मछली और हीरा जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले लाखों लोगों की नौकरियां खतरे में हैं। ऐसे हालात में मोदी का संदेश बिल्कुल साफ़ है कि भारत में उत्पादन करो और यहीं उपभोग करो।

    भारत की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी लंबे समय से लगभग 15 प्रतिशत पर स्थिर है। दशकों से सब्सिडी और उत्पादन प्रोत्साहन (प्रोडक्शन इंसेंटिव) की नीति अपनाई गई, लेकिन इसके बावजूद इस हिस्सेदारी को बढ़ाना मुश्किल रहा है। मेक इन इंडिया जैसे अभियानों के बावजूद यह लक्ष्य अपेक्षित गति से पूरा नहीं हो पा रहा।

     

    विशेषज्ञों का तर्क है कि मैन्युफैक्चरिंग को गति देने के लिए केवल उत्पादन सब्सिडी पर्याप्त नहीं है। उपभोक्ताओं की मांग मजबूत करनी होगी और इसके लिए सबसे बड़ा उपाय है टैक्स सुधार। जब लोगों के हाथों में अधिक पैसा होगा तो उनकी खपत बढ़ेगी और उसी अनुपात में मैन्युफैक्चरिंग को बल मिलेगा। इस साल की शुरुआत में केंद्र सरकार ने बजट में लगभग एक लाख करोड़ रुपये की आयकर छूट दी थी। इससे उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता में कुछ सुधार देखने को मिला। अब मोदी सरकार अप्रत्यक्ष कर ढांचे यानी जीएसटी में आमूलचूल सुधार की तैयारी में है।

    आठ साल पहले लागू हुए जीएसटी ने विभिन्न प्रकार के अप्रत्यक्ष करों को समाप्त कर दिया था ताकि टैक्स अनुपालन आसान हो और व्यापार की लागत कम हो, लेकिन समय के साथ यह प्रणाली जटिल होती गई। कारोबारियों, कर विशेषज्ञों और उद्योग मंडलों की लगातार यह शिकायत रही है कि जीएसटी संरचना अत्यधिक पेचीदा है। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी ने वादा किया है कि जीएसटी को सरल और प्रभावी बनाया जाएगा। वित्त मंत्रालय अब दो स्लैब वाले जीएसटी ढांचे पर विचार कर रहा है।

     

    अमेरिकी ब्रोकरेज हाउस जेफ़रीज के विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह सुधार लागू होता है तो उपभोक्ताओं के हाथ में लगभग दो लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त आ सकते हैं। भारत की जीडीपी में निजी उपभोग का योगदान 60 प्रतिशत है। ऐसे में, यह सुधार सीधे अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करेगा। कोविड-19 महामारी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था में असमानताएं गहराती गई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी फसल और सरकारी सहायता योजनाओं के चलते मांग अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है, लेकिन शहरी इलाकों में परिदृश्य उलट है। कम वेतन वृद्धि, आईटी सेक्टर में नौकरियों की कटौती और सेवाक्षेत्र में सुस्ती ने शहरी उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को कमजोर किया है।

    यही वजह है कि टैक्स सुधार और आयकर छूट शहरी मांग को पुनर्जीवित करने का सबसे कारगर तरीका माना जा रहा है। दीवाली के आसपास उपभोक्ता मांग परंपरागत रूप से बढ़ती है। यदि टैक्स सुधार समय पर लागू हो जाते हैं तो छोटी कारों, स्कूटर, कपड़े और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में बिक्री तेज़ हो सकती है। अमेरिकी निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली का आकलन है कि भारत सरकार के राजकोषीय प्रोत्साहन और टैक्स कटौती निश्चित रूप से उपभोग को बढ़ावा देंगे, जिससे जीडीपी वृद्धि में सुधार होगा और महंगाई पर काबू पाया जा सकेगा। उनका मानना है कि मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और परस्पर व्यापारिक प्रतिबंधों के बीच बाहरी मांग घट सकती है। ऐसे में घरेलू खपत को प्रोत्साहित करना ही सबसे ठोस रणनीति है। ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ़ भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अप्रत्याशित झटका है। विशेषज्ञ इसे दुनिया की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर व्यापार प्रतिबंध लगाने जैसा मानते हैं। कुछ महीने पहले तक ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की गई थी।

     

    जीएसटी में कमी और टैक्स सुधार से सरकार की कर राजस्व में अस्थायी गिरावट आ सकती है, लेकिन ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि इसकी भरपाई अधिशेष लेवी संग्रहण और भारतीय रिज़र्व बैंक के डिविडेंड से की जा सकती है। स्विस निवेश बैंक यूबीएस का कहना है कि पिछली जीएसटी कटौती और कॉरपोरेट टैक्स में कमी का असर पहले से अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक पड़ रहा है। टैक्स छूट उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को सीधा प्रभावित करती है। जब जेब में पैसा बचता है तो उपभोग बढ़ता ही है। यही नहीं, टैक्स छूट के बाद आरबीआई भी ब्याज दरों में और कटौती कर सकता है। बीते महीनों में रेपो रेट में लगभग एक प्रतिशत की कटौती हो चुकी है। ब्याज दरों में गिरावट से बैंकों के लिए कर्ज़ वितरण आसान होगा और निवेश व उपभोग दोनों को बल मिलेगा।

     

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार अगले साल की शुरुआत में लगभग 50 लाख सरकारी कर्मचारियों के वेतन और 68 लाख पेंशनभोगियों की पेंशन बढ़ाई जाएगी। यूबीएस का अनुमान है कि इसका असर टैक्स सुधार के साथ मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को और गति देगा। इसका सीधा असर त्योहारी सीज़न में उपभोग और निवेश पर पड़ेगा।
    प्रधानमंत्री मोदी की घोषणाओं का भारतीय शेयर बाज़ारों ने स्वागत किया है। व्यापारिक अनिश्चितताओं और टैरिफ़ विवादों से उत्पन्न घबराहट के बावजूद निवेशकों ने इसे सकारात्मक संकेत के रूप में लिया है। इसी महीने रेटिंग एजेंसी एस एंड पी ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को 18 साल बाद बढ़ा दिया। सॉवरेन रेटिंग किसी देश में निवेश के जोखिम का पैमाना है। रेटिंग सुधरने का मतलब है कि सरकार की कर्ज़ लागत घटेगी और देश में विदेशी निवेश बढ़ेगा। यह भारत के लिए दीर्घकालिक लाभकारी है, हालांकि इन तमाम प्रयासों और लंबे समय से अटके सुधारों को आगे बढ़ाने के बावजूद भारत आठ प्रतिशत की विकास दर हासिल नहीं कर पा रहा है। मौजूदा समय में जीडीपी वृद्धि दर छह प्रतिशत से थोड़ा अधिक है।
    स्पष्ट है कि वैश्विक व्यापारिक माहौल, अमेरिकी टैरिफ़, रूस से तेल खरीद को लेकर भारत-अमेरिका विवाद और अंतरराष्ट्रीय निवेश पर दबाव जैसे कारक भारत की राह आसान नहीं होने देंगे, लेकिन टैक्स सुधार, जीएसटी सरलीकरण और घरेलू खपत को प्रोत्साहन देकर इन झटकों को काफी हद तक संतुलित किया जा सकता है।

    कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टैक्स छूट और जीएसटी सरलीकरण की घोषणा केवल चुनावी रणनीति या राजनीतिक वादा नहीं है। यह उस व्यापक आर्थिक सोच का हिस्सा है, जिसके तहत भारत बाहरी दबावों और वैश्विक व्यापारिक झटकों के बावजूद आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना चाहता है। अमेरिकी टैरिफ़ निस्संदेह भारत के लिए एक बड़ा झटका हैं, लेकिन अगर सरकार उपभोक्ता-केंद्रित सुधार लागू करती है, लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाती है और घरेलू मांग को मजबूत करती है, तो यह संकट अवसर में बदल सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य अब दो मोर्चों पर निर्भर करता है। एक ओर सरकार की सुधारवादी इच्छाशक्ति और दूसरी ओर उपभोक्ताओं का आत्मविश्वास। अगर, दोनों का संतुलन बना रहा, तो यह टैक्स छूट और सुधारों का पैकेज केवल दीवाली का उपहार नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है।

    आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में छोटे उद्योग और आम उपभोक्ता अहम
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