देवानंद सिंह
शशि थरूर और कांग्रेस पार्टी के बीच उभरते मतभेद अब सार्वजनिक विमर्श का विषय बन चुके हैं। कभी कांग्रेस के सबसे प्रगतिशील और वैश्विक दृष्टिकोण वाले चेहरों में गिने जाने वाले थरूर अब पार्टी के लिए असहज सच बनते जा रहे हैं। न तो उन्हें पूरी तरह खारिज किया जा सकता है, न ही पूरी तरह अपनाया जा रहा है। थरूर की शिकायत कि उन्हें निलांबुर उपचुनाव में प्रचार के लिए आमंत्रित नहीं किया गया, केवल एक व्यक्तिगत उपेक्षा की बात नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर उनकी स्थिति को लेकर गहरे संकेत देती है। जिस राज्य से वे लगातार पांच बार सांसद रह चुके हैं, वहां चुनाव प्रचार से उनकी अनुपस्थिति को राजनीतिक संकेतन के तौर पर पढ़ा जाना लाजिमी है।
केंद्र द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विदेशों में भारत की स्थिति स्पष्ट करने के लिए बनाए गए प्रतिनिधिमंडलों में शशि थरूर को अगुआ बनाना एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक कदम था। एक ओर, यह उनकी वैश्विक साख और संप्रेषण की शक्ति को रेखांकित करता है, वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस द्वारा नामित न किए जाने के बावजूद उनका प्रतिनिधिमंडल नेतृत्व करना पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। यहां शशि थरूर ने अपने राष्ट्रवादी दायित्व को प्राथमिकता दी, लेकिन कांग्रेस के भीतर इसे पार्टी अनुशासन से विचलन के रूप में देखा गया।
कांग्रेस के पूर्व सांसद उदित राज द्वारा थरूर को “बीजेपी का सुपर प्रवक्ता” कहे जाने के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी आश्चर्यजनक रही। न तो थरूर के बचाव में कोई ठोस बयान आया, न ही उनके विरोध में। यह अनिर्णय की स्थिति कांग्रेस के अंदर छिपे अंतर्विरोधों और नेतृत्व की असहजता को उजागर करता है। थरूर कोई ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने पहली बार पार्टी नेतृत्व से मतभेद जताए हों। वे कांग्रेस में संगठनात्मक सुधारों की मांग करने वाले G-23 समूह का हिस्सा रहे हैं। 2022 में अध्यक्ष पद की दौड़ में उन्होंने मल्लिकार्जुन खड़गे को टक्कर दी, यह जानते हुए भी कि गांधी परिवार खड़गे के साथ है।
उनका यह कदम केवल साहसिक नहीं था, बल्कि संकेत था कि वे स्थापित राजनीति के भीतर रहकर भी एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र बनना चाहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि थरूर की नाराज़गी असल में राहुल गांधी से है, न कि खड़गे से। जब राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बने, तो थरूर को उपनेता तक नहीं बनाया गया। इसके विपरीत, केसी वेणुगोपाल जैसे नेताओं की ताक़त में वृद्धि हुई, जो पूरी तरह राहुल गांधी के नज़दीकी माने जाते हैं। थरूर की महत्वाकांक्षा केरल की मुख्यमंत्री पद की ओर इशारा करती है, और यहीं से उनका टकराव पार्टी के अंदर के सत्ता केंद्रों से शुरू होता है।
थरूर ने बार-बार कहा है कि वे कांग्रेस छोड़ने नहीं जा रहे हैं। लेकिन उनके भाषणों और टिप्पणियों से यह स्पष्ट है कि वे खुद को कांग्रेस के भीतर एक ‘स्वतंत्र स्वायत्त इकाई’ के रूप में देखते हैं। यह स्थिति पार्टी अनुशासन की दृष्टि से कठिन है। पार्टी को यह तय करना होगा कि क्या थरूर जैसे “स्वतंत्र विचारधारा वाले नेता” को सहने की लोकतांत्रिक क्षमता उसमें बची है या नहीं। थरूर आज भी कांग्रेस के सबसे आकर्षक और संवाद-क्षम चेहरों में हैं। अंग्रेज़ी मीडिया, विदेश नीति और युवाओं के बीच उनकी छवि अब भी प्रासंगिक और प्रभावशाली है। ऐसे में कांग्रेस यदि उन्हें दरकिनार करती है तो यह पार्टी की “बौद्धिक रिक्तता” को उजागर करेगा।
कुल मिलाकर, शशि थरूर जैसे नेता उस पार्टी के लिए एक परीक्षा हैं जो भीतर से दिशा-रहित और असमंजस में दिख रही है। वे खुद को रचनात्मक असंतोष के रूप में प्रस्तुत करते हैं, एक ऐसा असंतुष्ट जो पार्टी के बाहर नहीं, भीतर से सुधार चाहता है। पर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ऐसी असहमति को आत्मसात करने के लिए तैयार है? कांग्रेस नेतृत्व को यह समझना होगा कि शशि थरूर की तरह के नेता अगर पार्टी से अलग होते हैं, तो उसका लाभ केवल बीजेपी जैसी पार्टियां ही उठाएंगी। वहीं, थरूर को भी तय करना होगा कि वे राष्ट्रहित और पार्टी प्रतिबद्धता के बीच सामंजस्य बना सकते हैं या नहीं।
यह टकराव केवल दो व्यक्तित्वों का नहीं, बल्कि दो राजनीतिक दृष्टिकोणों का है। इसमें कौन विजयी होगा, यह समय ही बताएगा। पर एक बात तय है कि शशि थरूर की नाराज़गी, कांग्रेस के लिए एक चेतावनी है। यदि, इसे सुना नहीं गया, तो पार्टी और ज़्यादा सन्नाटे में डूब सकती है।

