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    Home » सेवा, समरसता और मानवता ही संघ की पहचान : मोहन भागवत
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    सेवा, समरसता और मानवता ही संघ की पहचान : मोहन भागवत

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 29, 2026No Comments3 Mins Read
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    सेवा, समरसता और मानवता ही संघ की पहचान
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    लेखक: एजेंसी

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि सेवा, समरसता और मानवता ही संघ की पहचान है।

    सेवा, समरसता और मानवता ही संघ की पहचान: मोहन भागवत का संदेश

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ के विचार, धर्म, भारतीय परंपरा और मानवता के प्रति उसकी सोच पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आरएसएस का मकसद सिर्फ और सिर्फ निस्वार्थ सेवा है। जो लोग समाज और देश की सेवा के इरादे से संघ से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए यहां जगह है।

    भागवत ने कहा कि उनसे अक्सर पूछा जाता है कि आरएसएस से जुड़ने पर क्या मिलेगा। इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, “अगर आप कुछ पाने की नीयत से संघ से जुड़ना चाहते हैं, तो मत आइए। अगर आप समाज और देश की सेवा करने के इरादे से आना चाहते हैं, तो आपके लिए यहां जगह है।” उन्होंने कहा कि यदि हर नागरिक इस भावना को अपना ले, तो समाज का स्वरूप बदल सकता है।

    विविधता में एकता और मानवता का संदेश

    मोहन भागवत ने कहा कि वे कोई धार्मिक विद्वान नहीं हैं, लेकिन ऐसे समाज का हिस्सा हैं, जो मानता है कि रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। उन्होंने वैज्ञानिक उदाहरण देते हुए कहा कि कुत्ते की आंखें मुख्य रूप से दो रंगों को देख पाती हैं। यदि उसे रंगों की पूरी दुनिया समझाने की कोशिश की जाए, तो वह नहीं समझ पाएगा, क्योंकि उसकी समझ उसके अनुभव तक सीमित है। इसी प्रकार मनुष्य की समझ भी उसके अनुभवों के आधार पर विकसित होती है।

    उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा अलग-अलग मार्गों को स्वीकार करती है और सभी को सत्य की ओर बढ़ने का अवसर देती है। श्लोक “रुचीनां वैचित्र्याद् ऋजु कुटिल नानापथजुषां, नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार आसमान से गिरने वाली हर बूंद अंततः समुद्र में मिलती है, उसी तरह सभी धार्मिक मार्ग एक ही ईश्वर और सत्य की ओर ले जाते हैं।

    “जिन्हें दुनिया में कहीं पनाह नहीं मिली, भारत ने उन्हें गले लगाया”

    भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि जब दुनिया में लोगों को कहीं पनाह नहीं मिली, तब भारत ने उन्हें अपनाया। उन्होंने कहा कि यही भारत का इतिहास रहा है। हालांकि समय के साथ विदेशी आक्रमणों और शिक्षा के अभाव के कारण समाज में कुछ विकृतियां आईं।

    उन्होंने कहा कि खुद को हिंदू कहने वाले व्यक्ति को यह समझना होगा कि सभी रास्ते एक ही सत्य की ओर जाते हैं और हर इंसान की गरिमा समान है। भागवत ने “विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि…” श्लोक का संदर्भ देते हुए कहा कि सच्चा ज्ञानी सभी जीवों को समान दृष्टि से देखता है।

    उन्होंने कहा कि आरएसएस का उद्देश्य इसी प्राचीन ज्ञान और मानवता की भावना को फिर से समाज में जागृत करना है।

    अधिक जानकारी के लिए RSS आधिकारिक वेबसाइट देखें।

    आरएसएस न्यूयॉर्क मानवता मोहन भागवत
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