राकेश कुमार के कार्यशैली यूसिल के लिए हो रहा है घातक साबित
राष्ट्र संवाद संवाददाता
झारखंड से लेकर देशभर में रणनीतिक महत्व रखने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई यूसीआईएल इन दिनों अपने ही प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। डिपार्टमेंट ऑफ़ एटॉमिक एनर्जी के अधीन संचालित इस अहम उपक्रम में हाल के महीनों में लिए गए निर्णयों ने संगठन के भीतर असंतोष और चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। सूत्रों और अंदरूनी चर्चाओं के अनुसार, सीएमडी डॉ . कंचम आनंदा राव के कार्यभार संभालने के बाद कई ऐसे फैसले सामने आए हैं, जिनसे प्रशासनिक पारदर्शिता, संतुलन और नीति अनुपालन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
तकनीकी पदों पर गैर तकनीकी तैनाती, नीति पर सवाल
सबसे बड़ा मुद्दा खनन इंजीनियर राकेश कुमार की आईआर (कार्मिक एवं औद्योगिक संबंध) विभाग में तैनाती को लेकर उठ रहा है। जबकि यूसीआईएल पहले से ही रोहिल (राजस्थान), जादूगोड़ा विस्तार, तुम्मलापल्ले और गोगी जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में तकनीकी विशेषज्ञों की कमी से जूझ रही है, ऐसे में एक अनुभवी खनन इंजीनियर को गैर-तकनीकी विभाग में भेजना कई सवाल खड़े कर रहा है।
अंदरूनी अधिकारियों का साफ कहना है कि यह निर्णय कंपनी की एचआर नीति और विशेषज्ञता-आधारित तैनाती के सिद्धांतों के विपरीत नजर आता है। इसी तरह डॉ. पी. के. ताम्राकर को विभागाध्यक्ष ( सी आर एन्ड डी ) के साथ-साथ सीएमडी के तकनीकी सलाहकार की अतिरिक्त जिम्मेदारी देना भी चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। संगठन के अंदर यह सवाल उठ रहा है कि क्या एक ही अधिकारी को इतनी अहम दोहरी भूमिका देना जवाबदेही और पारदर्शिता के मानकों के अनुरूप है?
उच्च पदों पर चयन प्रक्रिया भी घेरे में
महाप्रबंधक (सिविल) आर. के. मिश्रा के आवेदन को निदेशक (तकनीकी) पद के लिए आगे बढ़ाए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इस प्रक्रिया में पात्रता और मानकों की अनदेखी की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सूत्रों के अनुसार, कार्यकाल के शुरुआती महीनों में बगजाता, नरवापहाड़, तुरामडीह, मोहुलडीह और रोहिल जैसी महत्वपूर्ण इकाइयों का दौरा सीमित रहा है। जबकि ये सभी यूनिट यूसीआईएल की रीढ़ मानी जाती हैं, ऐसे में शीर्ष नेतृत्व की फील्ड स्तर पर कम मौजूदगी को लेकर कर्मचारियों के बीच असंतोष बढ़ रहा है।कर्मचारियों और संयुक्त यूनियन का कहना है कि जमीनी स्तर की समस्याओं को समझे बिना लिए गए फैसले लंबे समय में परियोजनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। यह भी सामने आ रहा है कि कई अहम प्रशासनिक फैसले सीमित स्तर पर लिए जा रहे हैं, जबकि महाप्रबंधकों और कार्यकारी निदेशकों जैसे अनुभवी अधिकारियों से पर्याप्त परामर्श नहीं किया जा रहा। इससे संगठन के भीतर समन्वय और विश्वास दोनों पर असर पड़ रहा है।
इन सभी घटनाओं के बाद संगठन के अंदर से ही यह मांग उठने लगी है कि डिपार्टमेंट ऑफ़ एटॉमिक एनर्जी के सतर्कता तंत्र के तहत इन मामलों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। कर्मचारियों संयुक्त यूनियन और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका सीधा असर यूसीआईएल की रणनीतिक परियोजनाओं और देश के परमाणु ईंधन कार्यक्रम पर पड़ सकता है। यूसीआईएल जैसे संवेदनशील और रणनीतिक संस्थान में प्रशासनिक फैसलों पर उठते सवाल केवल आंतरिक मामला नहीं रह जाते यह देश की ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा विषय बन जाता है। ऐसे में अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शीर्ष स्तर पर इन संकेतों को गंभीरता से लिया जाएगा या हालात और बिगड़ेंगे।

