लेखक: देवानंद सिंह
लापता महिलाओं और बच्चों की तलाश एक गंभीर सामाजिक चुनौती है जिस पर ओडिशा पुलिस ने उल्लेखनीय कार्य किया है।
लापता महिलाओं और बच्चों की तलाश
ओडिशा पुलिस द्वारा वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में 17,590 लापता महिलाओं और बच्चों का पता लगाकर उन्हें उनके परिवारों से मिलाना निस्संदेह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। इनमें 12,177 महिलाएं और 5,413 बच्चे शामिल हैं। यह आंकड़ा केवल पुलिस की सक्रियता का प्रमाण नहीं, बल्कि यह भी दर्शाता है कि यदि प्रशासन इच्छाशक्ति, तकनीक और समन्वित प्रयासों के साथ काम करे तो हजारों बिछड़े परिवारों में फिर से खुशियां लौटाई जा सकती हैं।
हालांकि, इस उपलब्धि के साथ एक गंभीर प्रश्न भी सामने आता है। जनवरी से जून के बीच ही राज्य में 10,605 महिलाओं और 4,873 बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होना अपने आप में चिंता का विषय है। यह बताता है कि समाज में ऐसी परिस्थितियां मौजूद हैं, जिनके कारण महिलाएं और बच्चे लगातार गुमशुदा हो रहे हैं। इसलिए केवल बरामदगी की सफलता पर संतोष करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन कारणों की भी गहराई से पड़ताल करनी होगी जो इन घटनाओं को जन्म देते हैं।
महिलाओं और बच्चों के लापता होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। मानव तस्करी, बाल श्रम, घरेलू हिंसा, पारिवारिक विवाद, आर्थिक मजबूरी, प्रेम प्रसंग, सोशल मीडिया के माध्यम से बहलाकर ले जाने की घटनाएं और अपराधी गिरोहों की सक्रियता जैसी समस्याएं इस चुनौती को और गंभीर बना देती हैं। कई मामलों में बच्चों को रोजगार या बेहतर जीवन का झांसा देकर दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है, जबकि महिलाओं को भी धोखाधड़ी और शोषण का शिकार बनाया जाता है।
ओडिशा पुलिस का यह अभियान इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि इसमें केवल हाल के मामलों पर ही नहीं, बल्कि पुराने लंबित मामलों और उन लोगों को भी खोजा गया जिनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं थी। यह पुलिसिंग के मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण को दर्शाता है। विशेष रूप से पुरी, जाजपुर, गंजाम, भुवनेश्वर और मयूरभंज जैसे जिलों में बड़ी संख्या में लोगों की बरामदगी बताती है कि यदि स्थानीय स्तर पर विशेष अभियान चलाए जाएं तो अच्छे परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
लेकिन इस सफलता के बावजूद सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। सबसे पहली आवश्यकता है कि गुमशुदगी की हर शिकायत को तत्काल गंभीरता से लिया जाए। अक्सर देखा जाता है कि शुरुआती घंटों में ही सबसे महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं। इसलिए पुलिस की त्वरित कार्रवाई, आधुनिक तकनीक, सीसीटीवी नेटवर्क, डिजिटल डाटाबेस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पहचान प्रणाली और विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच बेहतर समन्वय को और मजबूत करना होगा।
इसके साथ ही समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने, उन्हें सुरक्षा संबंधी जानकारी देने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को देने की आदत विकसित करनी होगी। विद्यालयों, पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों को भी जागरूकता अभियान चलाकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनाना चाहिए।
मानव तस्करी जैसे संगठित अपराधों पर कठोर कार्रवाई भी समय की मांग है। केवल पीड़ितों की बरामदगी पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसे अपराधों के पीछे सक्रिय गिरोहों की पहचान कर उनके विरुद्ध प्रभावी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। जब तक अपराधियों को सख्त और त्वरित दंड नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर स्थायी रोक लगाना कठिन रहेगा।
ओडिशा पुलिस का यह अभियान देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक मॉडल बन सकता है। यदि इसी प्रकार नियमित विशेष अभियान, तकनीकी सहयोग और जनसहभागिता को प्राथमिकता दी जाए तो हजारों और परिवारों को अपनों से मिलाया जा सकता है।
किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसके विकास से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और संवेदनशील नागरिकों महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा कितनी प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करता है। ओडिशा पुलिस ने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया है। अब आवश्यकता है कि इस प्रयास को और व्यापक बनाया जाए, ताकि कोई भी महिला या बच्चा लापता होने के बाद व्यवस्था की उदासीनता का शिकार न बने और हर परिवार को न्याय तथा सुरक्षा का भरोसा मिल सके। ओडिशा पुलिस आधिकारिक वेबसाइट पर अधिक जानकारी प्राप्त करें।

