सिर्फ बड़ा कारोबार नहीं, मजबूत संस्थान और मजबूत समाज भी जरूरी
देवानंद सिंह
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय उद्योग जगत से केवल कारोबार का विस्तार करने के बजाय मजबूत, टिकाऊ, बेहतर संचालन और उच्च गुणवत्ता वाली कंपनियां बनाने पर जोर दिया है। विकसित भारत के लक्ष्य की चर्चा के बीच उनका यह संदेश केवल कॉरपोरेट सेक्टर के लिए नहीं, बल्कि उन औद्योगिक घरानों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिनकी मौजूदगी किसी शहर या पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है।
भारत में टाटा स्टील, जिंदल समूह और मित्तल समूह जैसे बड़े औद्योगिक नामों ने देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनके सामने अब सवाल केवल उत्पादन बढ़ाने या वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने का नहीं है। सवाल यह भी है कि जिस समाज और क्षेत्र से उन्हें जमीन, श्रम, संसाधन और बाजार मिलता है, वहां उनके विकास का कितना प्रत्यक्ष और स्थायी असर दिखाई देता है।
यहीं कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी CSR की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
CSR को केवल स्कूल में कुछ सामग्री बांट देने, स्वास्थ्य शिविर लगाने या किसी आयोजन को प्रायोजित करने तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, रोजगार, पर्यावरण, स्वच्छता, पेयजल, महिला सशक्तीकरण और स्थानीय समुदायों के जीवन स्तर में दीर्घकालिक सुधार लाना होना चाहिए।
टाटा स्टील का उदाहरण इस संदर्भ में लंबे समय से चर्चा में रहा है। जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर में कंपनी और उससे जुड़े सामाजिक संस्थानों की गतिविधियां शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, पर्यावरण, सामुदायिक विकास और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों तक फैली हुई हैं। इसी तरह जिंदल और मित्तल समूहों से जुड़े विभिन्न उपक्रम भी अपने-अपने क्षेत्रों में CSR और सामुदायिक विकास कार्यक्रम चलाते हैं। हालांकि अलग-अलग कंपनियों की गतिविधियों, खर्च और प्रभाव का आकलन उनके संबंधित आधिकारिक CSR रिपोर्ट और परियोजनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए।
यही वह जगह है जहां वित्त मंत्री की बात को व्यापक अर्थ में समझने की जरूरत है। एक मजबूत कंपनी केवल अपनी बैलेंस शीट से मजबूत नहीं होती; उसके साथ जुड़े समुदाय का विश्वास भी उसकी वास्तविक पूंजी होता है।
अगर कोई औद्योगिक इकाई किसी क्षेत्र में हजारों लोगों को रोजगार देती है, तो उसके आसपास के गांवों और बस्तियों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी, कौशल विकास और पर्यावरण की स्थिति भी उसके सामाजिक दायित्व का हिस्सा बनती है। CSR की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितना पैसा खर्च हुआ, बल्कि यह होना चाहिए कि उस खर्च से कितने लोगों के जीवन में स्थायी बदलाव आया।
जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर के लिए यह सवाल और भी प्रासंगिक है। यहां उद्योग और समाज का संबंध दशकों पुराना है। उद्योगों ने रोजगार, आधारभूत ढांचे और शहर की आर्थिक पहचान को मजबूत किया है। अब बदलते समय में अपेक्षा यह है कि औद्योगिक विकास के साथ आसपास के ग्रामीण और शहरी समुदायों के विकास की गति भी तेज हो।
इसीलिए CSR में स्थानीय जरूरतों की पहचान सबसे महत्वपूर्ण होनी चाहिए। जिस इलाके में पेयजल की समस्या है, वहां वास्तविक समाधान; जहां युवाओं में रोजगार की जरूरत है, वहां बाजार से जुड़ा कौशल प्रशिक्षण; जहां सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव है, वहां गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सहयोग; और जहां पर्यावरण पर औद्योगिक गतिविधियों का प्रभाव पड़ता है, वहां वैज्ञानिक और दीर्घकालिक पर्यावरणीय पहल—यही CSR को सार्थक बना सकते हैं।
इसके साथ पारदर्शिता भी जरूरी है। कंपनियों को यह बताना चाहिए कि CSR के तहत कितनी राशि खर्च हुई, किन क्षेत्रों में हुई, कितने लोग लाभान्वित हुए और परियोजनाओं का वास्तविक परिणाम क्या रहा। इससे उद्योग और समाज के बीच भरोसा और मजबूत होगा।
वित्त मंत्री ने अनुसंधान एवं विकास पर अधिक खर्च करने की बात भी कही है। यहां भी बड़े औद्योगिक घरानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। टाटा, जिंदल, मित्तल जैसे समूह यदि अपनी तकनीकी क्षमता, अनुसंधान और नवाचार को भारतीय समस्याओं के समाधान से जोड़ते हैं, तो इसका लाभ केवल कंपनियों को नहीं बल्कि पूरे देश को मिल सकता है।
भारत को अब केवल ‘भारत में निर्मित’ उत्पादों से आगे बढ़कर ‘भारत में विकसित’ तकनीक और उत्पादों की दिशा में बढ़ना है। इसके लिए उद्योग, विश्वविद्यालय और शोध संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना होगा।
अंततः उद्योग और समाज का रिश्ता एकतरफा नहीं हो सकता। उद्योग को मजबूत बाजार, कुशल मानव संसाधन और सामाजिक स्थिरता चाहिए, जबकि समाज को रोजगार, बेहतर जीवन और विकास के अवसर। CSR इस रिश्ते को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
इसलिए आने वाले वर्षों में बड़े औद्योगिक घरानों के मूल्यांकन का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि उन्होंने कितना उत्पादन बढ़ाया और कितना मुनाफा कमाया। यह भी पूछा जाना चाहिए—उन्होंने अपने आसपास के समाज को कितना मजबूत बनाया? कितने युवाओं को अवसर मिला? कितने परिवारों का जीवन बेहतर हुआ? पर्यावरण के संरक्षण में कितना योगदान हुआ और CSR की योजनाओं का वास्तविक असर कितना रहा?
विकसित भारत का सपना मजबूत उद्योगों के बिना पूरा नहीं होगा, लेकिन मजबूत उद्योगों की असली पहचान तभी बनेगी जब उनके विकास के साथ समाज का विकास भी दिखाई दे।

