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    सत्ता का दमन, विपक्ष की खामोशी और संघर्षरत युवाओं की हुंकार

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 13, 2026No Comments4 Mins Read
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    सत्ता का दमन, विपक्ष की खामोशी और संघर्षरत युवाओं की हुंकार

    देवानंद सिंह
    10 अक्टूबर को दिल्ली की सड़कों पर जो कुछ घटित हुआ, उसने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बार फिर कई असहज सवाल खड़े कर दिए। सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने वाले संघर्षशील बेटे-बेटियों पर कथित दमनात्मक कार्रवाई और उसके बाद उभरे प्रतिरोध ने यह सोचने को मजबूर किया कि आखिर लोकतंत्र में जनता की आवाज सुनने के लिए उसे सड़कों पर उतरने और टकराव का जोखिम उठाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ता है? क्या सत्ता का काम सवालों को दबाना है या उनका जवाब देना?
    लोकतंत्र में विरोध कोई अपराध नहीं, बल्कि नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। जब युवा अपने भविष्य, अधिकारों और व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर सवाल उठाते हैं, तो सरकार को उन सवालों का सामना करना चाहिए। यदि असहमति को दबाने के लिए पुलिसिया ताकत का सहारा लिया जाता है, तो यह केवल प्रदर्शनकारियों का नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों का भी अपमान है। सरकारें बहुमत से बनती हैं, लेकिन बहुमत का अर्थ निरंकुशता का लाइसेंस नहीं होता। सत्ता स्थायी नहीं है, मगर उसके फैसलों का असर पीढ़ियों तक रहता है।
    सलाम उन संघर्षशील युवाओं को, जिन्होंने डर के आगे झुकने से इनकार किया। नेहा बोरा जैसी साहसी आवाजों का उल्लेख इसलिए जरूरी है कि आंदोलन केवल नारों से नहीं, बल्कि जोखिम उठाने वाले लोगों के संकल्प से आगे बढ़ते हैं। इतिहास गवाह है कि बदलाव की शुरुआत अक्सर उन्हीं लोगों से होती है, जिन्हें शुरुआत में व्यवस्था असुविधाजनक, अव्यावहारिक या विद्रोही बताती है। हालांकि किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके साहस के साथ-साथ उसकी लोकतांत्रिक मर्यादा, स्पष्ट मांगों और शांतिपूर्ण संघर्ष में निहित होती है।
    लेकिन सवाल केवल सत्ता पक्ष से नहीं है। विपक्ष भी कठघरे में है। जब युवा सड़कों पर संघर्ष कर रहे हों, तब विपक्ष के बड़े नेताओं की भूमिका क्या होनी चाहिए? क्या उनका दायित्व केवल बयान जारी करना, सोशल मीडिया पर समर्थन जताना और आंदोलन की तस्वीरों के साथ अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराना है? या उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए मैदान में उतरकर जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए? यदि विपक्ष जनता के आक्रोश को राजनीतिक भाषणों में बदलने तक सीमित रहता है, तो वह सत्ता का विकल्प बनने का नैतिक अधिकार कैसे अर्जित करेगा?
    यह भी विचारणीय है कि जब संघर्ष का समय आता है, तब कुछ नेता पीछे क्यों हट जाते हैं और जब आंदोलन का परिणाम दिखाई देने लगता है, तब श्रेय लेने के लिए आगे क्यों आ जाते हैं? राजनीति यदि केवल पद, प्रतिष्ठा और फूल-मालाओं का माध्यम बन जाए, तो जनसेवा का दावा खोखला हो जाता है। उम्रदराज नेताओं और नेत्रियों का संघर्ष में उतरना यह याद दिलाता है कि नेतृत्व का मूल्य पद से नहीं, जोखिम उठाने और जनता के साथ खड़े होने से तय होता है।
    हालांकि हर आंदोलन की तुलना अन्ना हजारे के आंदोलन या किसी दूसरे ऐतिहासिक संघर्ष से करना भी उचित नहीं। हर आंदोलन की अपनी परिस्थितियां, उद्देश्य और सीमाएं होती हैं। किसी आंदोलन को बिना पर्याप्त प्रमाण के किसी का एजेंट घोषित करना जितना अनुचित है, उतना ही किसी नए संघर्ष को बिना समय की कसौटी पर परखे युग-परिवर्तनकारी घोषित करना भी जल्दबाजी होगी। आंदोलनों का मूल्यांकन नारों से नहीं, उनके उद्देश्यों, तरीकों और परिणामों से होना चाहिए।
    आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सत्ता पक्ष अपनी आलोचना सुनने का साहस दिखाएगा और क्या विपक्ष संघर्षरत नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएगा? क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने तक सीमित रह गया है, या उसमें असहमति, संवाद और जवाबदेही के लिए भी पर्याप्त जगह है?
    लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता की ताकत में नहीं, उसकी सहनशीलता में होती है। जो सरकार सवालों से डरती है, वह जनता का विश्वास खोती है; और जो विपक्ष जनता के संघर्ष में साथ नहीं देता, वह अपनी विश्वसनीयता गंवाता है। युवाओं की आवाज को कुचलने के बजाय सुना जाना चाहिए और उनके संघर्ष को राजनीतिक स्वार्थ का औजार बनाने के बजाय उसके मूल सवालों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
    10 अक्टूबर की दिल्ली से उठे सवाल केवल दिल्ली के नहीं हैं। वे पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य से जुड़े हैं। संघर्षरत बेटे-बेटियों को सलाम, लेकिन सत्ता और विपक्ष—दोनों से एक ही सवाल: जब जनता अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरती है, तब आप उसके साथ खड़े होते हैं या अपनी-अपनी राजनीतिक सुविधाओं के पीछे छिप जाते हैं?
    यही सवाल लोकतंत्र का आईना है, और इसी आईने में आज सत्ता तथा विपक्ष, दोनों को अपना चेहरा देखना चाहिए।

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