बिष्टुपुर में सियासी टकराव: लोकतंत्र में विरोध का अधिकार, हिंसा का नहीं!
जमशेदपुर में भाजपा-कांग्रेस का आमना-सामना बना चिंता का विषय, राजनीतिक दलों को आत्ममंथन की जरूरत
देवानंद सिंह
जमशेदपुर। शहर के बिष्टुपुर स्थित कांग्रेस मुख्यालय तिलक पुस्तकालय में सोमवार को भाजपा महिला मोर्चा के पूर्व घोषित प्रदर्शन के दौरान जो घटनाक्रम सामने आया, वह लोकतांत्रिक राजनीति और राजनीतिक कार्यसंस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन जब राजनीतिक असहमति टकराव, पत्थरबाजी, मारपीट और खून-खराबे तक पहुंच जाए, तो यह किसी भी राजनीतिक दल और समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इस प्रदर्शन की घोषणा पहले से की गई थी। ऐसे में प्रशासन और संबंधित राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा थी कि विरोध-प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए पर्याप्त तैयारी की जाती। पूर्व में भाजपा कार्यालय के सामने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के उग्र प्रदर्शन की पृष्ठभूमि में आज की घटना ने राजनीतिक तनाव को और उजागर कर दिया।
प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस की ओर से कार्यकारी अध्यक्ष अवधेश सिंह ने मोर्चा संभाला, जबकि भाजपा की ओर से पूर्व जिला अध्यक्ष दिनेश कुमार, सुधांशु ओझा और संजीव सिंह सहित अन्य नेता सक्रिय रहे। भाजपा विधायक पूर्णिमा साहू के पहुंचने के बाद माहौल और गरमा गया। दोनों पक्षों के कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ते तनाव ने देखते ही देखते गंभीर रूप ले लिया।
इस दौरान भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष दिनेश कुमार के सिर में चोट लगी और खून बहने की घटना सामने आई। कांग्रेस के पदाधिकारियों के भी घायल होने की सूचना है। दोनों पक्षों के नेताओं को अपने कार्यकर्ताओं को समझाते और स्थिति नियंत्रित करने की कोशिश करते देखा गया। अंततः जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को हस्तक्षेप कर स्थिति संभालनी पड़ी।
राजनीति में शक्ति प्रदर्शन या लोकतांत्रिक मर्यादा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध का उद्देश्य अपनी बात जनता तक पहुंचाना है या विरोधी पक्ष को दबाव में लाना? यदि महिला मोर्चा का प्रदर्शन महिलाओं से जुड़े मुद्दों और राजनीतिक विरोध को सामने रखने के लिए था, तो उसकी ताकत शांतिपूर्ण प्रदर्शन, तथ्यों और तर्कों में दिखाई देनी चाहिए थी। इसी तरह कांग्रेस को भी अपने कार्यालय और कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोकतांत्रिक तरीके से विरोध का जवाब देने का रास्ता अपनाना चाहिए था।
राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं की जिम्मेदारी केवल कार्यकर्ताओं का नेतृत्व करना नहीं, बल्कि उन्हें संयमित रखना भी है। भीड़ में नारेबाजी और आक्रोश तेजी से बढ़ सकता है, लेकिन अनुभवी नेतृत्व का मूल्य इसी बात से तय होता है कि वह तनावपूर्ण परिस्थिति में अपने समर्थकों को कितना नियंत्रित रखता है।
प्रशासन की भूमिका और निष्पक्ष जांच की जरूरत
घटना के दौरान एसडीओ, सिटी एसपी, सीसीआर डीएसपी मनोज ठाकुर और थाना प्रभारी निरंजन सहित पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों ने मोर्चा संभालकर स्थिति शांत कराने का प्रयास किया। हालांकि, ऐसी घटनाओं में केवल मौके पर स्थिति नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो, हिंसा की शुरुआत कैसे हुई, किसकी क्या भूमिका रही और किस परिस्थिति में लोग घायल हुए इन सभी पहलुओं को तथ्यों के आधार पर स्पष्ट किया जाए।
किसी भी पक्ष को राजनीतिक पहचान के आधार पर दोषी या निर्दोष घोषित करने के बजाय कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता क्या संदेश लेगी?
जमशेदपुर औद्योगिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना वाला शहर है। यहां की जनता राजनीतिक दलों से विकास, रोजगार, सुरक्षा और जनसमस्याओं पर गंभीर बहस की अपेक्षा करती है। यदि राजनीतिक दल एक-दूसरे के कार्यालयों के सामने विरोध करते हुए मर्यादा भूल जाएंगे, तो आम नागरिकों के बीच राजनीति की छवि प्रभावित होना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन हिंसा का अधिकार किसी को नहीं। भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों को यह समझना होगा कि राजनीतिक मतभेद दुश्मनी में नहीं बदलने चाहिए। विचारों की लड़ाई विचारों से होनी चाहिए, न कि लाठी, पत्थर और खून से।
बिष्टुपुर की घटना केवल दो राजनीतिक दलों के बीच टकराव नहीं, बल्कि राजनीतिक संयम और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की परीक्षा भी है। अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर आत्ममंथन करने, घायलों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की है।
संपादकीय निष्कर्ष: लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं कि कौन कितना आक्रामक विरोध करता है, बल्कि इस बात में है कि असहमति के बावजूद कौन संविधान, कानून और मानवीय मर्यादाओं का सम्मान करता है। राजनीति में जीत-हार होती रहती है, लेकिन हिंसा में लोकतंत्र हमेशा हारता है।

